सावन के साथ ही शुरू हो जाती है कांवड़ यात्रा। कांवड़ में गंगाजल भरकर कांवड़िये लंबी यात्रा करते हैं और फिर मंदिर पहुंचकर गंगाजल से शिव का अभिषेक करते हैं।

इस यात्रा के दौरान उन्हें कई तरह की कठिनाइयों का सामना करना पड़ता है तो कई नियमों का पालन भी वे करते हैं पर उनकी श्रद्धा और भक्ति के सामने ये नियम कहीं नहीं ठहरते और वे अपने गंतव्य तक शिवमय होकर पहुंच ही जाते हैं।

भक्त ज्योतिर्लिंग, सिद्धलिंग या प्रतिष्ठित शिवलिंग पर जाकर इस पवित्र जल से भगवान शिव का अभिषेक करते हैं।

वहीं भगवान आशुतोष की पूजा में तो आदिकाल से ही जलधारा की विधि संपन्न होती आ रही है। वहीं कांवड़ यात्रा का तो विशेष महत्व है और जो भक्त कांवड़ यात्रा पूरी श्रद्धा से करता है उस पर भगवान शिव विशेष कृपा करते हैं।

कांवड़ यात्रा 
कांवड़ यात्रा 

पौराणिक कथाओं के मुताबिक रावण पर विजय प्राप्त करने के उद्देश्य से भगवान राम ने राज्याभिषेक के बाद पत्नी सीता और तीनों भाई सहित सुल्तानगंज से जल भरकर शिव को अर्पित किया था। तभी से भक्त भी ऐसा ही करते चले आ रहे हैं।

सावन में जो मेला देवघर में लगता है उसे श्रावणी मेला कहा जाता है। इस श्रावणी मेले के दौरान कांवड़िये अपने कंधे पर कांवड़ रखकर सुल्तानगंज से जल भरकर देवघर आते हैं और बाबा बैद्यनाथ को वह जल अर्पित करते हैं।

कांवड़ को लेकर चलने में भी कई कठिन नियमों का पालन करना पड़ता है। पवित्रता का भी ध्यान रखना पड़ता है तब कहीं जाकर यह यात्रा फलित होती है।

स्कन्द पुराण के अनुसार कांवड़ यात्रा से अश्वमेघ यज्ञ करवाने जितनी फल की प्रप्ति होती है। सावन महीने में शिवलिंग पर जलाभिषेक करने का वैसे भी विशेष महत्व होता है और फिर कांवड़ यात्रा का तो महत्व अपने आपमें ज्यादा ही होता है।

कांवड़ यात्रा 
कांवड़ यात्रा 

कांवड़ यात्रा के प्रकार ....

कांवड़ यात्रा तीन प्रकार की होती है।

- पहली तरह के कांवड़िये रुक-रुक कर चलते हैं।

- दूसरे वो होते हैं जो डंडी कांवड़ लेकर आते हैं यानी दंड-प्रणाम देते हुए पहुंचते हैं।

- तीसरे और सबसे कठिन डाक कांवड़ होते हैं जो बिना रुके बिना, खाए पिए दौड़कर या तेज चाल में चलकर आते हैं।

कांवड़ यात्रा के दौरान कांवड़िये एक साधु की जीवनशैली जीते हैं। इन्हें काफी कठिन नियमों का पालन करना पड़ता है।

सबसे पहले भक्त सुल्तानगंज से जल भरकर संकल्प लेते हैं और फिर कई नियमों का पालन करते हुए बाबाधाम आते हैं। कांवड़िये अपने साथ-साथ परिजनों के नाम का भी जल भरते हैं। कांवड़ यात्रा के दौरान पूरा कांवड़िया पथ घुंघरू की आवाज से शिवमय रहता है।

कहते हैं कि इन कांवड़ियों का सबको आदर करना चाहिए और इनसे बुरा व्यवहार करने की गलती नहीं करनी चाहिए।