पटना : बिहार एक बार फिर बाढ़ की चपेट में है। आपदा प्रबंधन विभाग से प्राप्त जानकारी के मुताबिक बिहार के 12 जिलों शिवहर, सीतामढी, मुजफ्फरपुर, पूर्वी चंपारण, मधुबनी, दरभंगा, सहरसा, सुपौल, किशनगंज, अररिया, पूर्णिया एवं कटिहार में अब तक 34 लोगों की मौत होने के साथ 26 लाख 79 हजार 936 लोग प्रभावित हुए है। सालों से चली आ रही इस समस्या पर सरकार के तमाम दावों के बावजूद हालात जस के तस हैं।

पिछले 40 सालों से यानी 1979 से अब तक बिहार लगातार हर साल बाढ़ से जूझ रहा है। बिहार सरकार के जल संसाधन विभाग के मुताबिक राज्य का 68,800 वर्ग किमी हर साल बाढ़ में डूब जाता है। आइए जानते हैं कि बिहार हर साल बाढ़ में क्यों डूब जाता है।

नेपाल छोड़ता है पानी

बिहार और नेपाल के सीमावर्ती क्षेत्र में पिछले कई दिनों से भारी बारिश होने के कारण नदियों के जलस्तर में भारी वृद्धि हुई है। उत्तर बिहार के अररिया, किशनगंज, फारबिसगंज, पूर्णिया, सुपौल, मधुबनी, दरभंगा और कटिहार जिले में बाढ़ का पानी घुस गया है।

लाठी के सहारे नदी को पार करते लोग
लाठी के सहारे नदी को पार करते लोग

कोसी, कमला, बागमती, गंडक, महानंदा समेत उत्तर बिहार की तमाम छोटी-बड़ी नदियों के तटबंधों के किनारे बसे सैकड़ों गांव जलमग्न हो गए हैं। नेपाल में जब भी पानी का स्तर बढ़ता है वह अपने बांधों के दरवाजे खोल देता है। इसकी वजह से नेपाल से सटे बिहार के जिलों में बाढ़ आ जाती है।

फरक्का बराज से भी आती है बाढ़

फरक्का बराज बनने के बाद बिहार में नदी का कटाव बढ़ा है। सहायक नदियों द्वारा लाई गई गाद और गंगा में घटता जलप्रवाह समस्या को गंभीर बनाते हैं। बिहार में हिमालय से आने वाली गंगा की सहायक नदियां कोसी, गंडक और घाघरा बहुत ज्यादा गाद लाती हैं। इसे वे गंगा में अपने मुहाने पर जमा करती हैं। इसकी वजह से पानी आसपास के इलाकों में फैलने लगता है। अगर नदी में गाद न हो और जलप्रवाह बना रहे तो ऐसी समस्या नहीं आएगी।

तटबंधों का कम होना

मिली जानकारी के अनुसार, 1954 में बिहार में 160 किमी तटबंध था। तब 25 लाख हेक्टेयर जमीन बाढ़ प्रभावित थी। अभी करीब 3700 किमी तटबंध हैं लेकिन बाढ़ से प्रभावित क्षेत्र बढ़कर 68.90 लाख हेक्टेयर हो गया। जिस तरीके से बाढ़ में इजाफा हो रहा है, उस हिसाब से तटबंधों की संख्या में बढ़ोतरी नहीं हो रही है।

जलग्रहण क्षेत्रों में पेड़ों की अंधाधुंध कटाई

बिहार में जलग्रहण क्षेत्र में पेड़ों की लगातार अंधाधुंध कटाई हो रही है। इसकी वजह सेजलग्रहण क्षेत्रों में पानी रुकता ही नहीं। कोसी नदी का जलग्रहण क्षेत्र 74,030 वर्ग किमी है। इसमें से 62,620 वर्ग किमी नेपाल और तिब्बत में है। सिर्फ 11,410 वर्ग किमी हिस्सा ही बिहार में है।

बाढ़ के पानी का बहाव 
बाढ़ के पानी का बहाव 

पहाड़ों पर स्थित नेपाल और तिब्बत में ज्यादा बारिश होती है तो पानी वहां के जलग्रहण क्षेत्रों से बहकर बिहार में स्थित निचले जलग्रहण क्षेत्रों में आता है। पेड़ों के नहीं होने की वजह से पानी कैचमेंट एरिया में न रुककर आबादी वाले क्षेत्रों में फैल जाता है।

भौगोलिक स्थिति है बाढ़ के लिए जिम्मेदार

बिहार में यह हर साल होता है। नदियां तबाही मचाती हैं। सैकड़ों लोगों की जानें जाती हैं और हजारों करोड़ रुपये खर्च किए जाते हैं। लेकिन हालात जस के तस बने रहते हैं। बिहार में बाढ़ के लिए नेपाल को जिम्मेदार ठहराया जाता है। दरअसल, यहां की भौगोलिक स्थिति ही ऐसी है जिसकी वजह से बारिश का पानी नदियों के जरिए नीचे आता है, जिससे तबाही मचती है।

- नेपाल में कोसी नदी पर बांध बना है। ये बांध भारत और नेपाल की सीमा पर है, जिसे 1956 में बनाया गया था। इस बांध को लेकर भारत और नेपाल के बीच संधि है। संधि के तहत अगर नेपाल में कोसी नदी में पानी ज्यादा हो जाता है तो नेपाल बांध के गेट खोल देता है और इतना पानी भारत की ओर बहा देता है, जिससे बांध को नुकसान न हो।

कोसी बैराज के सभी 56 गेट खोल दिए गए हैं और इसकी वजह से चार लाख क्यूसेक पानी बिहार में आया है। ये बाढ़ की सबसे बढ़ी वजह है। 14 जुलाई को बिहार के सीएम नीतिश कुमार ने बाढ़ का हवाई सर्वे किया है। आपदा प्रबंधन विभाग के प्रमुख सचिव प्रत्यय अमृत का कहना है कि नेशनल डिजास्टर मैनेजमेंट फोर्स और स्टेट डिजास्टर मैनेजमेंट फोर्स 13 टीमें प्रभावित इलाकों में लगाई गई हैं।

बिहार में अभी 152 रिलीफ कैंप खोले गए हैं, जिनमें करीब 50,000 लोगों को रखा गया है। इन सबके लिए 251 कम्यूनिटी किचन बनाए गए हैं। सबसे ज्यादा खराब स्थिति सीतामढ़ी की है, जहां 11 लाख लोग प्रभावित हैं, वहीं अररिया में 5 लाख लोगों पर बाढ़ का सीधा असर है।

बाढ़ में रेल की पटरियां
बाढ़ में रेल की पटरियां

बाढ़ नियंत्रण के उपाय:-

बाढ़ की विभीषिका से बचने के लिए अनेक उपाय काम मे लाये जाते हैं जिनमें ढालू भूमि पर वृक्षारोपण, नदी तटबंधों का निर्माण जल निकासी का प्रबंध, जलाशयों का निर्माण नदियों के प्रवाह क्षमता में विस्तार आदि प्रमुख है।

इसे भी पढ़ें :

बिहार में बाढ़ की चपेट में 18 लाख लोग, चार की मौत

बिहारः सीतामढ़ी में बाढ़ के चलते तीन मंजिला मकान गिरा, 12 जिले जलमग्न

- गाद नदियों की एक बड़ी समस्या बन गई है। ज्यादातर गाद अपस्ट्रीम बेसिन इलाके से आती है। इसकी वजह से नदी का जल मार्ग भरने लगता है और नदी में पानी इकट्ठा होने की क्षमता घट जाती है। जाहिर है, गाद बाढ़ की एक बड़ी वजह है जानकारों का कहना है कि अगर नदी बेसिन इलाके में पेड़ लगा कर वाटरशेड मैनेजमेंट किया जाए तो नदी में गाद जमा होने की प्रक्रिया बढ़ सकती है, जिससे अंततः बाढ़ का खतरा घटेगा।

- अब सहायक नदियों के द्वार पर तथा नदी बेसिन इलाके में छोटे जलाशय और चेक डैम बनाने को बाढ़ रोकने का प्रभावी उपाय माना जा रहा है इससे सहायक नदियों से आने वाले पानी को नियंत्रित किया जा सकता है, जिससे मुख्य नदी में बाढ़ आने का खतरा घटेगा। चेक डैम छोटे आकार के होते हैं इसलिये इनसे पर्यावरण को नुकसान नहीं पहुंचता, साथ ही इन पर लागत भी कम आती हैं।

- तटबंधों के जरिए बाढ़ रोकने की कोशिश चूंकि दुनिया भर में नाकाम हो चुकी है इसलिये अब इसके वैकल्पिक तरीके विकसित करने के प्रयास हो रहे हैं। बांग्लादेश में छोटी सिंचाई योजनाओं के जरिए हुई ऐसी कोशिश को काफी सफल बताया जा रहा है। गंगा बाढ़ नियंत्रण आयोग ने उत्तर बिहार के बागमती बेसिन के सिलसिले में ऐसे कुछ उपाय सुझाए हैं।

- अतिरिक्त पानी को नहरों से दूसरी जगहों तक पहुंचाना, नदी के अपस्ट्रीम में जलाशय बनाना, नदी बेसिन इलाके में पानी जमा कर रखने के उपाय करना, कृत्रिम रूप से जमीन से नीचे के पानी को निकालना ताकि बाढ़ से आने वाले पानी को जमीन सोख ले, वगैरह।

बिहार में बाढ़ से 1979 से अब तक का नुकसान

रिपोर्ट्स के अनुसार, 8570 लोगों की बाढ़ से संबंधित विभिन्न कारणों की वजह से मौत हुई। 25,776 मवेशी और जानवर मारे गए। 7.70 करोड़ हेक्टेयर जमीन बाढ़ के पानी में डूब गई। 3.74 करोड़ हेक्टेयर जमीन पर लगी फसल खराब हो गई। 7969 करोड़ रुपए का नुकसान हुआ है फसलों के खराब होने से। 1.15 करोड़ मकान क्षतिग्रस्त हुए हैं। सार्वजनिक इमारतों के टूटने से 4151 करोड़ रुपए का नुकसान हुआ है।

रेल के पटरियों के उपर बहता पानी 
रेल के पटरियों के उपर बहता पानी 

बिहार में अब तक की सबसे खतरनाक बाढ़

2016 : 12 ज़िले बुरी तरह बाढ़ की चपेट में रहे। 23 लाख से ज्यादा लोग प्रभावित। 250 से ज्यादा लोगों की मौत हुई।

2013: जुलाई में आई बाढ़ से 200 लोग मारे गए। बाढ़ का असर 20 जिलों में था। करीब 50 लाख लोग प्रभावित हुए।

2011 : बाढ़ का असर 25 जिलों में था। 71.43 लाख लोगों के जनजीवन पर असर पड़ा। 249 लोगों की जान गई।

2008 : बाढ़ की चपेट में 18 जिले थे। 50 लाख लोग प्रभावित हुए। 258 लोगों की मौत हुई। 34 करोड़ की फसलें खराब हुई।

2007 : बाढ़ का कहर 22 जिलों में था। 1287 लोगों की जान चली गई। 2.4 करोड़ लोग प्रभावित हुए। संयुक्त राष्ट्र ने इसे बिहार के इतिहास की सबसे खराब बाढ़ कहा था।

2004 : 20 जिलों के 9,346 गांवों के 2 करोड़ से ज्यादा लोग प्रभावित हुए. 885 लोगों की मौत हुई. 522 करोड़ की फसलों का नुकसान हुआ।

2002 : बाढ़ का असर 25 जिलों में था। 489 लोगों की मौत हुई। 511 करोड़ से ज्यादा की फसलें तबाह हुईं। 8,318 गांव जलमग्न रहे।

2000 : बाढ़ का असर 33 जिलों में रहा। 12 हजार से अधिक गांव बाढ़ की चपेट में रहे। 336 लोगों की जान गई। 83 करोड़ की फसलें तबाह हुईं।

1987 : बाढ़ का सबसे बुरा असर 1987 में देखने को मिला। 1987 में आई बाढ़ में 30 जिलों के 24518 गांव प्रभावित हुए थे। 1399 लोगों की मौत हुई। 678 करोड़ रुपए की फसलें तबाह हुईं थी।