भगवान जगन्नाथ, भाई बलभद्र और बहन सुभद्रा के साथ जगन्नाथ पुरी में विराजते हैं। वर्ष में एक बार भगवान जगन्नाथ अपने भाई बलभद्र और बहन सुभद्रा के साथ मंदिर के बाहर रथ में बैठकर निकलते हैं जो रथयात्रा के नाम से प्रसिद्ध है।

इस विश्व प्रसिद्ध रथयात्रा में भक्तों की भीड़ उमड़ती है।

इस रथयात्रा से पहले स्नान पूर्णिमा को भगवान स्नान करते हैं। यह स्नान भगवान को ज्येष्ठ शुक्ल पक्ष की पूर्णिमा को कराया जाता है। भगवान की मूर्ति को 108 घड़ों में जल भरकर स्नान कराया जाता है।

भगवान जगन्नाथ 
भगवान जगन्नाथ 

यह सब पूरे विधि-विधान से मंत्रोच्चार के साथ किया जाता है। इस जल में अश्वगंधा, हल्दी, गुलाब और गंगा जल का मिश्रण मिलाया जाता है।

इस महास्नान के बाद भगवान जगन्नाथ और बलभद्र को नई पोशाकों से सुसज्जित किया जाता है, वहीं बहन सुभद्रा को भी नई पोशाक पहनाई जाती हैं।

स्नान यात्रा के दौरान भगवान के दर्शनों के लिए दुनियाभर से श्रद्धालु आते हैं। ऐसी मान्यता है कि इस पवित्र दिन भगवान के दर्शन करने से उनके सभी पाप धुल जाते हैं और कोई यह मौका छोड़ना नहीं चाहता।

इस स्नान के बाद भगवान बीमार होकर एकांतवास में चले जाते हैं और इस बार उनका यह एकांतवास 3 जुलाई तक चलेगा। राजवैद्य उनका इलाज करते हैं।

करीब 15 दिनों तक कोई पूजा नहीं होती हैं, 15 दिनों तक आराम करने के बाद भगवान और उनके भाई बहन का दिव्य श्रृंगार किया जाता है।

भगवान जगन्नाथ की भव्य रथयात्रा 
भगवान जगन्नाथ की भव्य रथयात्रा 

एकांतवास में भगवान किसी को दर्शन नहीं देते और इस दौरान भगवान को काढ़े का भोग लगाया जाता है और वही प्रसाद रूप में भक्तों में बांटा जाता है।

इसे भी पढ़ें :

जानें वृक्षों की पूजा का महत्व और आखिर रविवार को क्यों नहीं होती पीपल की पूजा

3 जुलाई को पूजा-अर्चना के बाद शाम को नेत्रदान अनुष्ठान होता है और इसके बाद महाआरती होती है। महाआरती के बाद श्रद्धालुओं के बीच प्रसाद बंटता है और तब भगवान के दर्शन सबको मिलते हैं।

वहीं इस साल 4 जुलाई को रथयात्रा है जिसमें भगवान जगन्नाथ, भाई बलभद्र और बहन सुभद्रा के साथ अपने भक्तों के बीच आएंगे, मंदिर से निकलकर भक्तों को दर्शन देंगे।