नई दिल्ली: सतयुग में गंगा का धरती पर अविर्भाव हुआ था। कई युग बीतने के बाद आज हम जानेंगे गंगा का सतयुग से कलयुग तक का कैसा रहा सफर।वर्तमान कलयुग में गंगा प्रदूषित हो चुकी है। पौराणिक मान्यता के मुताबिक धरती पर जब पाप का बोझ बढ़ेगा और कलयुग की समाप्ति के दस हजार साल बाकी होंगे, तब गंगा सूख जाएगी।

आज गंगा दशहरा 2019 है, इसी दिन पुण्यसलिला मां गंगा धरती पर अवतरित हुई थीं। हजारों सालों तक बहती ये कलकल धारा कई जगह अब कई जगहों पर संकरी नालियां बन चुकी है। शहरों की गंदगी और कचरे ने इसे पूरी तरह प्रदूषित कर दिया है।

कलयुग में गंगा का हाल

उत्तर प्रदेश में कई स्थानों पर गंगा का जल दोहन होने से पानी का संकट गहराता जा रहा है। बनारस, इलाहाबाद, कानपुर व अन्य स्थानों में लगातार घटते जलस्तर को 'न्यूनतम चेतावनी बिंदु' की ओर जाते देख जलकल विभाग ने अलर्ट जारी किया है।

गंगा का जलस्तर दो सौ फीट रहने तक ही जल की आपूर्ति सामान्य रहती है। अभी तक गंगा का जलस्तर 192 फीट दर्ज किया गया। हालांकि यह पिछले साल जून में गंगा के जलस्तर 187 फीट से अधिक है, लेकिन इसका असर पेयजल आपूर्ति पर पड़ने लगा है। यहां लगाए गए पंप पानी कम देने लगे हैं। इसे लेकर लोग चिंतिंत दिखाई दे रहे हैं।

वहीं, कानपुर में पीने के पानी के लिए लोगों को गंगा पर ही निर्भर रहना पड़ता है। भीषण गर्मी के चलते यहां पर गंगा की धारा के बीच में रेत के बड़े-बड़े टीले दिखाई देने लगे हैं। यहां तक कि पेयजल की आपूर्ति के लिए भैरोंघाट पपिंग स्टेशन पर बालू की बोरियों का बांध बनाकर पानी की दिशा को परिवर्तित करना पड़ा, ताकि लोगों को सहूलियत हो सके।

यह भी पढ़ें:

Ganga Dussehra 2019 : गंगा दशहरा पर दान-पुण्य का है विशेष महत्व, जानिए पूजा विधि एवं मुहूर्त

नरौरा बैराज के अधिकारियों का कहना है कि फिलहाल हर दिन 7822 क्यूसेक पानी प्रतिदिन गंगा में छोड़ा जा रहा है। नहरों, सिंचाई और अन्य कुदरती कारणों से कानपुर पहुंचते-पहुंचते पानी मात्र 5000 क्यूसेक ही बच रहा है। आगे पहुंचने वाले पानी की मात्रा और कम होती जाती है। इसी कारण जल स्तर में कुछ घटाव हो रहा है।

गंगा पर 30 वर्षो से कार्य कर रहे इलाहाबाद विश्वविद्यालय के प्रोफेसर दीनानाथ शुक्ल ने बताया कि प्रयागराज में हुए कुंभ के दौरान पर्याप्त जल मौजूद था। लेकिन गर्मी शुरू होते ही यहां जलस्तर लगातार कम होता जा रहा है। यहां पानी इतना कम हो गया है कि लोग डुबकी भी नहीं लगा पा रहे हैं। बरसाती पाने न आने के कारण यह समस्या उत्पन्न हुई है। बांधों के पानी को रोका गया है, जिससे यह संकट बढ़ रहा है।

उन्होंने कहा कि नरौरा, टिहरी का पानी भी गंगा तक नहीं पहुंच पा रहा है। सहायक नदियां सूख गई हैं। बचा-खुचा पानी वाष्पीकरण के कारण नहीं बच पा रहा है। जब तक बांधों का पानी नहीं छोड़ा जाएगा, तब यह समस्या बनी रहेगी। प्रवाह कम होने के साथ ही शहर का सीवेज नालों के जरिए सीधे नदी में जाने से गंगा का प्रदूषण खतरनाक स्तर तक पहुंच गया है।

गंगा पर कार्य करने वाले स्वामी हरि चैतन्य ब्राम्हचारी महराज का मानना है कि बताया कि पश्चिमी उप्र से पानी का दोहन जरूरत से ज्यादा हो रहा है। गर्मी में ज्यादा पानी वाली कृषि करने से सारा पानी वहीं पर प्रयोग हो जाता है। यहां पर पानी पहुंच नहीं पाता है। यहां पर सीवर लाइन और टेनरी के पानी ही गंगा में पहुंचता है। कोई यह नहीं सोच रहा कि गंगा को कैसे बचाया जाए?

उन्होंने कहा कि पहले प्रदूषण पर रोक लगाना भी बहुत जरूरी है। अगर कोई दोहन कर रहा है, तो सरकार को चाहिए कि पानी ज्यादा बढ़ाकर छोड़ दे, जिससे जीव-जंतु और पक्षीयों की जान बच सकती है।

स्वामी ने कहा कि सहायक नदियों और नालों के बल पर अपने वजूद के लिए लड़ रही हैं। इस कारण रेत के टीले उभरते जा रहे हैं। ऐसे में गंगा में पानी छोड़ने को प्रमुखता पर लिया जाना चाहिए। वर्तमान स्थिति चिंताजनक है और तत्काल कदम नहीं उठाए गए तो आगे और भयावह तस्वीर सामने आ सकती है।

विषेषज्ञों की मानें तो गंगा का जलस्तर एक सप्ताह में करीब दो फीट कम हुआ है। तीन दिनों में रोजाना दो इंच पानी घटा है। बीते तीन जून को गंगा का जलस्तर 193 फीट था जो नौ जून को 191 फीट चार इंच रह गया। सात जून को जलस्तर 191 फीट 8 इंच था।

सिंचाई विभाग के मुख्य अभियंता आर.पी. तिवारी के अनुसार, "कानपुर बैराज से साढ़े तीन हजार क्यूसेक पानी छोड़ दिया गया है। इलाहाबाद होते हुए यह पानी जब बनारस पहुंचेगा तो इसकी मात्रा साढ़े चार हजार क्यूसेक से ज्यादा हो जाएगी। यमुना का पानी भी इसमें मिलने के कारण बनारस में ज्यादा मात्रा में पानी पहुंचेगा। इससे हालत में सुधार होगा। लोगों के लिए पानी का संकट भी कम हो जाएगा।"

सतयुग में गंगा के अवतरण की कहानी

पौराणिक कहानी के मुताबिक महाराज सगर ने एक बार बड़ा यज्ञ आयोजित किया था। इस दौरान उनके पोते अंशुमान यज्ञ की रक्षा कर रहे थे। कहते हैं भगवान इंद्र ने यज्ञ के घोड़े का अपहरण कर लिया। लिहाजा परेशान अंशुमान ने पूरी धरती पर घोड़े की खोज शुरू की।

आखिरकार पाताल लोक में भगवान 'महर्षि कपिल' के पास घोड़ा मिला। जिसे देखकर अंशुमान के साथ आए लोगों ने महर्षि को चोर चोर कहना शुरू कर दिया। इससे कुपित ऋषि ने वहां उपस्थित लोगों को भस्म कर दिया।

इस घटना में मृत लोगों के उद्धार के लिए ही महाराज दिलीप के बेटे भगीरथ ने कठोर तपस्या की। भगीरथ की तपस्या से खुश होकर ब्रह्मा ने उन्हें वर मांगने को कहा। भगीरथ ने भगवान ब्रह्मा से धरती पर गंगा की मांग की। ब्रह्मा जी ने भगीरथ को समझाया कि धरती गंगा की तेज धारा को सहन नहीं कर पाएगी। उपाय ये है कि शिव की तपस्या करो, वही तुम्हारी मदद करेंगे।

इसके बाद भगीरथ के प्रयासों से भगवान शिव गंगा की धाराओं को अपनी जटाओं में लेने के लिए तैयार हुए। ब्रह्माजी के कमंडल से निकली गंगा सीधे शिवजी की जटाओं तक पहुंची और फिर धरती पर इसकी कलकल धारा अठखेलियां करती गई। मान्यता है कि जिस दिन धरती पर गंगा का अवतरण हुआ था उसे सतयुग से आज तक गंगादशहरा के तौर पर मनाया जाता है।

सतयुग से लेकर कलयुग तक गंगा से जुड़ी तमाम कहानियां हैं। महाभारत काल में महात्मा भीष्म की मां बनने का गंगा को सौभाग्य प्राप्त हुआ। पौराणिक कहानियों में गंगा से जुड़ी कई चम्तकारिक कहानियां भी दर्ज हैं।