पुण्यतिथि विशेष : भारतीय सिनेमा के युगपुरूष थे पृथ्वीराज कपूर

पृथ्वीराज कपूर ( फाइल फोटो)  - Sakshi Samachar

अपनी कड़क आवाज और दमदार अभिनय के बल पर लगभग चार दशकों तक सिने प्रेमियों के दिलों पर राज करने वाले भारतीय सिनेमा के युगपुरूष पृथ्वीराज कपूर का आज पुण्यतिथि है। उन्होंने कई सुपरहिट फिल्में दीं, जिन्हें न केवल देश बल्कि सात समुन्दर पार भी सराहा गया। पृथ्वीराज कपूर को भारतीय सिनेमा का विकास पुरुष कहा जाता है।

1960 में बनी मुगल-ए-आजम में बादशाह अकबर के किरदार को कालजयी बनाने वाले पृथ्वीराज कपूर आज भी हिन्दी फिल्मों के दीवानों के दिलों पर राज करने वाले शहंशाह हैं। फिल्म मुगल-ए-आजम में जब गरजते हुए कहता है- ‘सलीम मत भूलो कि हम तुम्हारे पिता होने के साथ-साथ हिन्दुस्तान के शहंशाह भी हैं।' पृथ्वीराज कपूर निजी काम के प्रति समर्पित और नरम दिल वाले इंसान थे।

3 नवंबर 1906 को पंजाब के लायलपुर में एक जमींदार परिवार में जन्मे पृथ्वीराज कपूर को रंगमंच का शौक पेशावर के एडवर्ड कॉलेज में पढ़ते समय ही लग गया था। अब लायलपुर पाकिस्तान के पंजाब में है।

18 वर्ष की उम्र में पृथ्वीराज का विवाह कर दिया गया। अभिनय का शौक बढ़ता गया और 1928 की सर्दियों में वे अपने तीन बच्चों को पत्नी के पास छोड़कर पेशावर से मुंबई आ गए। मुंबई आकर पृथ्वीराज इम्पीरियल फिल्म कंपनी से जुड़ गए। 1931 में भारत की पहली बोलती फिल्म ‘आलम आरा’ बनी जिसमें पृथ्वीराज कपूर को सह अभिनेता का रोल मिला।

1934 में देवकी बोस की फिल्म 'सीता' की कामयाबी की बदौलत पृथ्वीराज अपनी पहचान बनाने में सफल हुए। विद्यापति (1937), सिकंदर (1941), दहेज (1950), आवारा (1951), जिंदगी (1964), आसमान महल (1965), तीन बहूरानियाँ (1968) आदि फिल्में आज भी पृथ्वीराज के अभिनय की वजह से यादगार मानी जाती हैं।

वर्ष 1944 में पृथ्वीरीज कपूर ने अपनी खुद की थियेटर कंपनी 'पृथ्वी थियेटर शुरु की। पृथ्वी थियेटर में उन्होंने आधुनिक और शहरी विचारधारा का इस्तेमाल किया जो उस समय के फारसी और परंपरागत थियेटरों से काफी अलग था।

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साल 1960 में प्रदर्शित के.आसिफ की फिल्म मुगले-आजम में इस कलाकार ने बेटे के मोह में उलझे शहंशाह जलालुद्दीन अकबर के किरदार को अमर कर दिया। मुगले-आजम में उनके सामने अभिनय सम्राट दिलीप कुमार थे। इसके बावजूद पृथ्वीराज कपूर अपने दमदार अभिनय से दर्शकों का ध्यान अपनी ओर आकर्षित करने में सफल रहे।

फिल्म इंडस्ट्री में उनके महत्वपूर्ण योगदान को देखते हुए उन्हें 1969 में पद्मभूषण से सम्मानित किया गया। फिल्म इंडस्ट्री के सर्वोच्च सम्मान दादा साहब फाल्के पुरस्कार से 1972 में सम्मानित किया गया। वह आठ वर्ष तक राज्यसभा के मनोनीत सदस्य भी रहे। इस महान अभिनेता ने 29 मई 1972 को दुनिया को अलविदा कह दिया।

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