हैदराबाद : भारत के उम्दा शायरों में से एक मौलाना हसरत मोहानी का भी नाम हैं, जिन्होंने अपनी कलम से आजादी की एक लहर चलाई। भारत की आजादी में अहम योगदान देने वाले हसरत मोहानी एक महान शायर होने के साथ-साथ एक एक पत्रकार थे। उनका नाम फख्र से लिया जाता है। आज हसरत मोहानी का पुण्यतिथि है। इस मौके पर उनके कहे खूबसूरत अशआर पेशे खिदमत है....

आईने में वो देख रहे थे बहार-ए-हुस्न,

आया मेरा ख़याल तो शर्मा के रह गए।

आप को आता रहा मेरे सताने का ख़याल,

सुलह से अच्छी रही मुझ को लड़ाई आप की।

आरज़ू तेरी बरक़रार रहे,

दिल का क्या है रहा रहा न रहा।

ऐसे बिगड़े कि फिर जफ़ा भी न की,

दुश्मनी का भी हक़ अदा न हुआ।

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चोरी चोरी हम से तुम आ कर मिले थे जिस जगह

मुद्दतें गुज़रीं पर अब तक वो ठिकाना याद है।

चुपके चुपके रात दिन आंसू बहाना याद है

हम को अब तक आशिक़ी का वो ज़माना याद है।

इक़रार है कि दिल से तुम्हें चाहते हैं हम,

कुछ इस गुनाह की भी सज़ा है तुम्हारे पास।

उस ना-ख़ुदा के ज़ुल्म ओ सितम हाए क्या करूँ,

कश्ती मिरी डुबोई है साहिल के आस-पास।

छुप नहीं सकती छुपाने से मोहब्बत की नज़र,

पड़ ही जाती है रुख़-ए-यार पे हसरत की नज़र।

देखा किए वो मस्त निगाहों से बार बार,

जब तक शराब आई कई दौर हो गए,

जो और कुछ हो तिरी दीद के सिवा मंज़ूर,

तो मुझ पे ख़्वाहिश-ए-जन्नत हराम हो जाए।

फिर और तग़ाफ़ुल का सबब क्या है ख़ुदाया

मैं याद न आऊँ उन्हें मुमकिन ही नहीं है।

बरसात के आते ही तौबा न रही बाक़ी,

बादल जो नज़र आए बदली मेरी नीयत भी।

मालूम सब है पूछते हो फिर भी मुद्दआ'

अब तुम से दिल की बात कहें क्या ज़बाँ से हम।

वफ़ा तुझ से ऐ बेवफ़ा चाहता हूँ,

मिरी सादगी देख क्या चाहता हूँ।

शेर दर-अस्ल हैं वही 'हसरत',

सुनते ही दिल में जो उतर जाएँ।

शाम हो या कि सहर याद उन्हीं की रखनी,

दिन हो या रात हमें ज़िक्र उन्हीं का करना।

हम क्या करें अगर न तिरी आरज़ू करें,

दुनिया में और भी कोई तेरे सिवा है क्या,