हैदरारबाद : उर्दू अदब की एक अज़ीम शायर कैफी आजमी की आज पुण्यतिथि है। 14 जनवरी 1918 को कैफी आजमी का जन्म उत्तर प्रदेश के आजमगढ़ के पास एक छोटे से गांव मिजवां में हुआ। उनका असली नाम अतहर हुसैन रिजवी था। कैफ़ी का खानदान एक जमींदार खुशहाल खानदान था। घर में शिक्षा व साहित्य और शेर-ओ-शायरी का माहौल था। ऐसे माहौल में जब उन्होंने आंखें खोलीं तो उन्हें भी शेर-ओ-अदब से दिलचस्पी हो गयी। अपने समय के रिवाज के अनुसार अरबी, फारसी खी शिक्षा हासिल की और शेर कहने सगे।

बाताया जाता है कि कैफी के पिता उन्हें मजहबी तालीम दिलाना चाहते थे। इसके लिए कैफी को लखनऊ में सुल्तान उल-मदारिस में दाखिल करा दिया। यही वह जगह थी जहां कैफी एक प्रगतिवादी और इन्कलाबी शख्स के रूप में सामने आए।

कैफी आजमी को बचपन से ही शायरी में शौक था। कैफी जब 11 साल के थे, तब उन्होंने एक गजल लिखी और एक महफिल में सुना आए। कहते हैं कि कानाफूसी शुरू हो गई कि कैफी ने ये गजल किसी और से लिखवाई है। बाद में घरवालों की गवाही पर लोगों को मालूम हुआ कि वो गजल वाकई कैफी आजमी की ही लिखी हुई थी। बाद में इस गजल को बेगम अख्तर ने आवाज दी।

कैफी की शायरी में उनके व्यक्तित्व के कई अक्स नजर आते हैं। कभी वह रूमानियत में डूबे आशिक नजर आते हैं, तो कभी बागी। कहते हैं कि जिसने भी उन्हें पहली बार सुना, अपना दिल कैफी को दे बैठा। ऐसा ही एक किस्सा उनके बारे में उनके समकालीन शायर निदा फाजली ने साझा किया था।

बकौल निदा फाजली, ''कैफी आज़मी सिर्फ शायर ही नहीं थे। वह शायर के साथ स्टेज के अच्छे ‘परफार्मर’ भी थे। इस ‘परफार्मेंस’ की ताकत उनकी आवाज़ और आवाज के उतार चढ़ाव के साथ मर्दाना कदोकामत और फिल्मी अदाकारों जैसी सूरत भी थी।

कैफी साहब की मोहब्बत :

मोहब्बत लिखने वाले कैफी साहब की खुद की मोहब्बत की कहानी भी उनके शेर की तरह बेहद दिल को छू लेने वाली है। दरअसल, उनकी सबसे मशहूर नज़्मों में एक 'औरत' से जुड़ा है। वह हैदराबाद के एक मुशायरे में हिस्सा लेने गए। मंच पर जाते ही अपनी मशहूर नज़्म 'औरत' सुनाने लगे।

"उठ मेरी जान मेरे साथ ही चलना है तुझे,

क़द्र अब तक तेरी तारीख़ ने जानी ही नहीं,

तुझमें शोले भी हैं बस अश्क़ फिशानी ही नहीं,

तू हक़ीकत भी है दिलचस्प कहानी ही नहीं,

तेरी हस्ती भी है इक चीज़ जवानी ही नहीं,

अपनी तारीख़ का उन्वान बदलना है तुझे,

उठ मेरी जान मेरे साथ ही चलना है तुझे,"

उनकी यह नज़्म सुनकर श्रोताओं में बैठी एक लड़की नाराज हो गई। उसने कहा, "कैसा बदतमीज़ शायर है, वह 'उठ' कह रहा है। 'उठिए' नहीं कह सकता क्या? इसे तो अदब के बारे में कुछ नहीं आता। कौन इसके साथ उठकर जाने को तैयार होगा?" लेकिन जब कैफ़ी साहाब ने अपनी पूरी नज्म सुनाई तो महफिल में बस वाहवाही और तालियों की आवाज सुनाई दे रही थी।

इस नज़्म का असर यह हुआ कि बाद में वही लड़की जिसे कैफी साहाब के 'उठ मेरी जान' कहने से आपत्ति थी वह उनकी पत्नी शौकत आजमी बनी।

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दरअसल, उस मुशायरे में अपने भाई के साथ पहली पंक्ति में बैठीं शौकत नज़्म खत्म होते-होते कैफी पर अपना दिल हार बैठीं। इसके बाद अपनी मोहब्बत में उन्होंने हर इम्तेहान पास किया और शौकत से शौकत आजमी बन गईं।

अखबार में काम

शादी के बाद बढ़ते खर्चो को देखकर कैफी आजमी ने एक उर्दू अखबार के लिए लिखना शुरू कर दिया जहां से उन्हें 150 रुपये माहवार वेतन मिला करता था। उनकी पहली नज्म 'सरफराज' लखनऊ में छपी। शादी के बाद उनके घर का खर्च बहुत मुश्किल से चल पाता था।

कई फिल्मों के लिए लिखे गीत

कैफी आजमी ने 1951 में पहला गीत 'बुजदिल फिल्म' के लिए लिखा- 'रोते-रोते बदल गई रात'। उन्होंने अनेक फ़िल्मों में गीत लिखें जिनमें कुछ प्रमुख हैं- 'कागज के फूल' 'हकीकत', हिन्दुस्तान की कसम', हंसते जख़्म 'आख़री खत' और हीर रांझा' जैसे कई मशहूर गीत लिखे। 'हुस्न और इश्क दोनों को रुस्वा करे वो जवानी जो खूं में नहाती नहीं' कैफी आजमी की यह पंक्ति उनके जीवन की सबसे बड़ी पंक्ति है और इसी लाइन के आस-पास उन्होंने पूरा जीवन जिया है।

कैफी को मिले कई अवॉर्ड

1975 कैफी आजमी को आवारा सिज्दे पर साहित्य अकादमी पुरस्कार और सोवियत लैंड नेहरू अवार्ड से सम्मानित किये गये। 1970 सात हिन्दुस्तानी फिल्म के लिए सर्वश्रेष्ठ राष्ट्रीय फिल्म पुरस्कार मिला। इसके बाद 1975 गरम हवा फिल्म के लिए सर्वश्रेष्ठ वार्ता फिल्मफेयर पुरस्कार मिला। 10 मई 2002 को दिल का दौरा के कारण मुम्बई में उनका हुआ।