नई दिल्ली: दिल्ली समेत देशभर में रविवार को रमजान का चांद नजर नहीं आया। लिहाजा पहला रोजा मंगलवार को होगा। रमजान का महीना हर मुसलमान के लिए बहुत महत्वपूर्ण होता है, जिसमें 30 दिनों तक रोजे रखे जाते हैं। हर सेहतमंद इंसान का रमजान में रोजे रखना फर्ज है।

रमजान के अशरे

रमजान को तीन हिस्सों में बांटा गया है, जो पहला, दूसरा और तीसरा अशरा कहलाता है। अशरा अरबी शब्द का 10 नंबर होता है। इस तरह रमजान के पहले 10 दिन (1-10) में पहला अशरा, दूसरे 10 दिन (11-20) में और तीसरा अशरा (21-30) दिन में बंटा गया है।

इस तरह रमजान के महीने में 3 अशरे होते हैं. पहला अशरा रहमत का होता है, दूसरा अशरा मगफिरत यानी गुनाहों की माफी का होता है और तीसरा अशरा जहन्नम (Hell) की आग से खुद को बचाने के लिए होता है. रमजान के महीने को लेकर पैगंबर मोहम्मद ने कहा है, रमजान की शुरुआत में रहमत है, बीच में मगफिरत यानी माफी है और इसके अंत में जहन्नम (Hell) की आग से बचाव है।

रमजान का पहला अशरा :

रमजान का पहला अशरा रहमत का होता है। पहले 10 दिन रहमत के होते हैं। रोजा नमाज करने वालों पर अल्लाह की रहमत होती है। पहले अशरे में अल्लाह की रहमत के लिए ज्यादा से ज्यादा इबादत की जानी चाहिए। इस दौरान मुसलमानों को ज्यादा से ज्यादा दान कर के गरीबों की मदद करनी चाहिए। हर एक इंसान से प्यार और नम्रता का व्यवहार करना चाहिए.

-रमजान का दूसरा अशरा

रमजान का दूसरा अशरा मगफिरत का है। यह 11वें रोजे से 20वें रोजे तक चलता है। इस अशरे में अल्लाह मरहूमों की मगफिरत फरमाते हैं। रोजेदारों को उनके गुनाहों से आजाद करते हैं। इस अशरे में लोग इबादत कर के अपने गुनाहों से माफी पा सकते हैं। अगर कोई इंसान रमजान के दूसरे अशरे में अपने गुनाहों से माफी मांगता है, तो दूसरे दिनों के मुकाबले इस समय अल्लाह अपने बंदों को जल्दी माफ करता है।

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- रमजान का तीसरा अशरा

रमजान का तीसरा अशरा जहन्नुम से आजादी का है। यह 21वें रोजे से शुरू होकर चांद के हिसाब से 29वें या 30वें रोजे तक चलता है। इस अशरे को सबसे महत्वपूर्ण माना जाता है। इस अशरे में अल्लाह अपने बंदों को जहन्नुम से निजात देते हैं। इस दौरान हर मुसलमान को जहन्नम से बचने के लिए अल्लाह से दुआ करनी चाहिए।

रमजान के आखिरी अशरे में कई मुस्लिम मर्द और औरतें एहतकाफ में बैठते हैं। आपको बता दें कि एहतकाफ में मुस्लिम पुरुष मस्जिद के कोने में 10 दिनों तक एक जगह बैठकर अल्लाह की इबादत करते हैं, जबकि महिलाएं घर में रहकर ही इबादत करती हैं। इस मुकद्दस महीने में मुसलमानों को रोजा रखने के साथ पांचों वक्त की नमाज व तरावीह पढ़नी चाहिए।