हैदराबाद : इस्लामी कलेंडर के शाबान माह की 15वीं रात को शब-ए-बरात मनाई जाती है। इस साल शनिवार (20 अप्रैल) को मनाई जाएगी। शब-ए-बारात दो शब्दों, शब और बारात से मिलकर बना है, जहां शब का अर्थ रात होता है वहीं बारात का मतलब बरी होना होता है। इस रात लोग पिछले एक साल में जाने-अनजाने हुए गुनाहों के लिए अल्लाह से माफी मांगते है। इस्लामी कैलेंडर के अनुसार यह रात साल में एक बार शाबान महीने की 14 तारीख को सूर्यास्त के बाद शुरू होती है।

मुसलमानों के लिए यह रात बेहद फजीलत (महिमा) की रात मानीजाती है, इस दिन विश्व के सारे मुसलमान अल्लाह की इबादत करते हैं। वे दुआएं मांगते हैं और अपने गुनाहों की तौबा करते हैं। शब-ए-बारता अरब में लैलतुल बराह या लैलतुन निसफे मीन शाबान के नाम से जाना जाता है। भारत, पाकिस्तान, बांग्लादेश, ईरान, अफगानिस्तान और नेपाल में शब-ए-बारात के नाम से जाना जाता है।

इस रात जो भी सच्चे दिल से अपने गुनाहों की तौबा करता है, उसके सभी गुनाह माफ हो जाते हैं। इसलिए ज्यादातर मुसलमान इस रात इबादत-ए-इलाही में मशगूल रहते हैं। शब-ए-बरात के मौके पर अगले एक साल का बजट तैयार किया जाता है। साथ ही इस मौके पर लोग कब्रिस्तानों में जाकर वहां दफन पूर्वोजों और अपनों के लिए दुआ मांगते हैं।

पैगम्बर-ए-इस्लाम ने फरमाया कि इस रात जो मोमीन दो राकत नमाज़ अदा करें उसे अल्लाह ताआला बनी कल्ब की बकरीयों के बालों के समान सवाब अता फरमाएगा। और अल्लाह शाबान की 15वीं रात अस्तगफार (तोबा) करने वालों को बख्श देता है। और रहमत के तलबगार पर रहम (दया) फरमाता है। मगर शराबी, रिस्ता तोड़ने वाले और माता पिता को दुख पहुंचाने वालों को इस रात माफ नहीं किया जाता है।

इस रात कुरआने पाक की तिलावत करनी चाहिए एवं दुरूद शरीफ का विरद करनी चाहिए। साथ ही अस्तगफार तोबा में मशगुल रहना चाहिए।

शब-ए-बरात के दिन रोजा रखना

शब-ए-बरात के दिन रोजा भी रखा जाता है। हालंकि रोजा रखने को लेकर उलेमाओं की अलग-अलग राय है। कई का मानना है कि 15 तारीख के रखे रोजे का बहुत सवाब मिलता है। लेकिन कुछ उलेमाओं का कहना है कि यह जरूरी नहीं कि 15 तारीख को ही रोजा रखा जाए। शबान महीन में रोजा रखने का खास महत्व है इसलिए महीने में कभी भी रोजा रखा सकता है।

आतिशबाजी करना हराम

कुछ लोग ऐसे भी होते हैं, जो इस रात को जश्न की रात समझते हैं। खूब आतिशबाजी करते हैं या जश्न मनाने के दूसरे तरीकों से हंगामा करते हैं लेकिन उलेमा ऐसा करना हराम मानते हैं। उनका कहना है कि यह जश्न की रात नहीं, सिर्फ इबादत की रात है।