हैदराबाद: मूसी नदी पर हैदराबाद में बना पुराना पुल किसी पहचान का मोहताज नहीं है। महानगर में किसी से भी पूछें वो इस पुल का लोकेशन झट से आपको बता देगा। वहीं इस पुल के इतिहास के बारे में कम ही लोग बता पाएंगे। इस पुल का मूल नाम 'पुल-ए-नर्वा' है।

जी हां, 441 साल पुराने इस पुल का निर्माण 1578 ईसवी में कराया गया था। जबकि हैदराबाद शहर की नींव सन् 1592 ईसवी में रखा गया था। यानी पुराना पुल हैदराबाद शहर से 14 साल पुराना है। पुल का वास्तुशिल्प और इसकी मजबूती अपने आप में अनूठी है। आधुनिक काल में शासन व्यवस्था और सरकार इस पुल की अनदेखी कर रही है।

हैदराबाद का पुराना पुल: आर्काइव तस्वीर 
हैदराबाद का पुराना पुल: आर्काइव तस्वीर 

पुराना पुल सुल्तान इब्राहिम कुतुब शाह IV के शासन काल में प्रमुख इमारतों में शुमार था। तब शहर में कंक्रीट का जंगल नहीं हुआ करता था। दूर से ही पुराना पुल इलाके की भव्यता में चार चांद लगाता था। पुराना पुल की मजबूती की आज भी लोग मिसालें देते हैं, कुल 381 मजबूत ब्लॉक्स के जरिए इसका निर्माण हुआ है। पुराना पुल की लंबाई 600 फिट और इसकी चौड़ाई 36 फिट है। 42 से 56 फिट ऊंची ये पुल आज भी अपनी भव्यता की कहानी कहती है। इस पुल को 23 उम्दा आर्क्स के जरिए सहारा दिया गया है।

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'पुल-ए-नरवा' या फिर 'पुराना पुल' को बनाने के पीछे कई कहानियां हैं। उस जमाने में प्रस्तावित हैदराबाद शहर को गोलकुंडा से जोड़ने के लिए इस पुल का निर्माण कराया गया था।

हैदराबाद का पुराना पुल: आर्काइव तस्वीर 
हैदराबाद का पुराना पुल: आर्काइव तस्वीर 

ऐतिहासिक साक्ष्यों के मुताबिक 1578 ईसवी में इस पुल का निर्माण पूरा हुआ था। इतिहासकार सैयद अली बिलग्रामी ने 1927 में प्रकाशित अपनी किताब में इस पुल के बारे में विस्तार से जिक्र किया है। किताब के मुताबिक पुल को बनाने में महज 8 महीने का वक्त लगा था। उस जमाने में पुल के निर्माण में एक लाख का खर्चा आया था। तब के शासक ने प्रमुखता से पुल को जल्दी पूरा करने का हुक्म दिया था।

हैदराबाद का पुराना पुल: आर्काइव तस्वीर 
हैदराबाद का पुराना पुल: आर्काइव तस्वीर 

हैदराबाद में सन् 1820 ईसवी में आए बाढ़ के बाद पुल की स्थिति

आसफ जाह IV नवाब सिकंदर जाह के शासन काल में हैदराबाद में सन् 1820 में भीषण बाढ़ आई थी। बाढ़ की त्रासदी के बाद 1908 में पुल का जीर्णोद्धार कराया गया था। सर मीर महबूब अली खान के आदेश पर पुल की मरम्मत कराई गई थी। इसकी रेलिंग्स को बदला गया था।

कुतुबशाही वंश की शानदार शाही परंपरा की गवाही देने वाले इस पुल को लेकर मौजूदा शासन गंभीर नहीं है। आज के दौर में ये पुल सब्जी मंडी के इर्द गिर्द तक ही सीमित है। इसके अलावा पुराना पुल का आस पास का इलाका गंदगी से भरा हुआ है। यहां तक कि इस पुल के पास भी जाना मुहाल है।

-विजय कुमार