नई दिल्ली : इतिहासकार ज्ञान प्रकाश ने आज के भारत की तुलना इमरजेंसी के समय के भारत से करते हुए कहा है कि अगर विपक्षी पार्टियां जन असंतोष को अभिव्यक्त करने में कामयाब हुईं तो 1977 की कांग्रेस की करारी हार की ही तरह इस बार आम चुनाव में सत्ताधारी पार्टियों को शिकस्त का सामना करना पड़ सकता है।

प्रिंस्टन युनिवर्सिटी में इतिहास के प्रोफेसर प्रकाश ने हाल ही में प्रकाशित अपनी किताब ‘इमरजेंसी क्रानिकल्स' के बारे में पीटीआई-भाषा के साथ चर्चा में कहा कि इंदिरा गांधी की ही तरह प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी में भी किसी निरंकुश नेता के गुण हैं। उन्होंने कहा कि 1975 में जब इंदिरा गांधी ने देश में इमरजेंसी लगाई थी तब के मुकाबले आज के हालात ज्यादा भयावह हैं। मोदी का आज वही रुतबा है जो इमरजेंसी के दौर में इंदिरा गांधी का था।

इमरजेंसी के अंत में, 1977 में विभिन्न पार्टियों के आनन-फानन तैयार एक गठबंधन के रूप में सामने आई जनता पार्टी ने सत्तारूढ़ कांग्रेस को धूल चटाई थी। जनता पार्टी को 298 सीटें मिली थीं जबकि कांग्रेस की सीटें 350 से सिमट कर 153 पर आ गई थी। उन्होंने कहा कि इंदिरा गांधी और मोदी के बीच में बहुत सी समानताएं हैं। प्रकाश ने कहा, हाल में मैं एक खबर पढ़ रहा था जिसमें मोदी कह रहे थे कि 'देश के हर बूथ को उन्हें जानना चाहिए।'

उन्होंने मेरी पार्टी नहीं कहा, बल्कि 'मैं' कहा, जैसे लोकतंत्र की समूची नियति उनकी 56 इंच की छाती पर ही टिकी हो।'' इतिहासकार ने कहा, "इस तरह यह एक बहुत बड़ा, बहुत ही बड़ा दावा है। यही चीज किसी तानाशाह को उभरने का अवसर देती है। आप इसी का एक रंग इंदिरा गांधी में देख सकते हैं। वह उसी तरह भारतीय राजनीति में छाए हैं जिस तरह एक वक्त इंदिरा गांधी छाई थीं। उनकी तस्वीरें, नारे...उसी तरह हर जगह छाए हैं जिस तरह एक वक्त में इंदिरा गांधी के छाए रहते थे।''

प्रकाश ने कहा कि आज सत्ता के पास अभूतपूर्व शक्तियां हैं और किसी इमरजेंसी की घोषणा करने की वास्तव में कोई जरूरत नहीं है। उन्होंने कहा ,'मोदी' को ''जमीनी सेना - बजरंग दल और उसी तरह के बल - का समर्थन'' हासिल है जो ''इंदिरा की इमरजेंसी को कभी नहीं हासिल था। अभी उनके पास ''अधिकाधिक आज्ञाकारी या कारपोरेट इलेक्ट्रोनिक मीडिया है जो 1975-77 में वजूद में नहीं था...इस सरकार के पास अभूतपूर्व शक्तियां हैं।''

उन्होंने कहा, ''आज इमरजेंसी की कोई औपचारिक घोषणा नहीं है, कोई प्रेस सेंसरशिप नहीं है, कानून का कोई वैध निलंबन नहीं है। लेकिन हिंदू राष्ट्रवाद की लहर पर सवार हो कर नरेन्द्र मोदी कुछ इस तरह के रुतबे तक पहुंच गए हैं जहां इंदिरा सिर्फ इमरजेंसी के सहारे पहुंची थी। प्रकाश ने मौजूदा हालात का जिक्र करते हुए कहा, ''यह साफ है कि हर जगह कृषि क्षेत्र में संकट है। कृषक संकट वास्तविक है। युवाओं तक के लिए भी रोजगार में वृद्धि नहीं हो पाई है। इस लिए अगर राजनीतिक पार्टियां जमीन पर मौजूद जन असंतोष को सही तरीके से अभिव्यक्त करती हैं तो 1977 दोहराया जा सकता है।'

(माणिक गुप्ता)