के. रामचंद्रमूर्ति की कलम से

तेलंगाना विधानसभा चुनाव 2018 एक तरफा चुनावी संग्राम रहा। इस संग्राम में लोगों ने चुनावी सुनामी महसूस की। एक्जिट पोल में तेलंगाना राष्ट्र समिति के जीतने की ही संभावना व्यक्त की थी। तेलंगाना के चुनावी प्रचार में कई दिग्गजों ने स्टार प्रचारक की भूमिका निभाई। तेरास ने कांग्रेस के नेतृत्व में बनाई गई प्रजा कूटमी के घटक दलों और भाजपा को चुनावी मैदान में मात दे दी। प्रधानमंत्री मोदी और सीपीएम ने सोचा था कि उनकी जादुई भाषणों की छड़ी काम कर जाएगी, लेकिन ऐसा नहीं हुआ।

उधर, चंद्रबाबू और कोदंडराम ने भी राजनीतिक हथकंडे अपनाए, लेकिन तेरास की जमीनी हकीकत के आगे उनका हथकंडा कारगर साबित नहीं हुआ। तेरास ने मौलिकता की बुनियाद पर जोर देते हुए चुनावी समर में जीत का परचम लहराया है। कांग्रेस अध्यक्ष राहुल ने तेलंगाना में अपने नेताओं और कार्यकर्ताओं में आत्मविश्वास पैदा करने में सफल नहीं हुये।

मिजोरम काफी छोटा राज्य होने के बावजूद वहां पर मिजो नेशनल फ्रंट ने बाजी मार दी। कांग्रेस ने भाजपा शासित प्रदेशों राजस्थान, मध्य प्रदेश और छत्तीसगढ़ में जीत का परचम लहरा कर भाजपा की उम्मीदों पर पानी फेर दिया। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने चुनावी प्रचार के दौरान अपना अधिकतम समय राजस्थान में ही बिताया, लेकिन कांग्रेस ने बाजी मार दी। इस चुनावी समर का प्रभाव आगामी वर्ष 2019 के चुनाव पर दिखाई देगा।

चंद्रबाबू से गठबंधन की कीमत

कांग्रेस तेलंगाना में गलतियों पर गलतियां करती चली गई। रेवंत रेड्डी का विश्वास था कि चंद्रबाबू तेलंगाना में अपना लोहा मनवाएंगे, लेकिन ऐसा नहीं हुआ। नेता और कार्यकर्ताओं में आत्मविश्वास का अभाव रहा। रेवंत रेड्डी ने KCR को चुनावी अखाड़े में घेरने का प्रयास किया, लेकिन KCR ने राजनीतिक चक्रव्यूह को तोड़ कर चुनावी समर में जीत का परचम लहराया और नेता तथा कार्यकर्ताओं का उत्साह दोगुना कर दिया। राहुल गांधी ने सोचा था कि चंद्रबाबू के साथ मिल कर तेलंगाना के चुनावी अखाड़े में बाजी मार जाएंगे, लेकिन ऐसा नहीं हुआ। चंद्रबाबू चुनावी समर में हाथ बांधे पीछे की ओर ही खड़े रहे।

तेलंगाना राज्य के संघर्ष के दौरान प्रो. कोदंडराम और लोक कवि गद्दर ने अहम भूमिका निभाई, लेकिन उनकी विचारधारा लोगों को नहीं भायी। कांग्रेस को चुनावी मैदान में अपनी गलतियों के चलते बड़े पैमाने पर कीमती चुकानी पड़ी। तेलंगाना राज्य की स्थापना के बाद चंद्रबाबू ने तेलंगाना में सिंचाई योजना के निर्माण कार्यों में अड़चने पैदा करते हुए केंद्र को पत्र लिखा था।

कांग्रेस को सबक

तेलंगाना विधानसभा चुनाव 2018 में कांग्रेस के अध्यक्ष राहुल गांधी को राजनीतिक सबक मिले हैं। राष्ट्रीय स्तर की पार्टी को चाहिए कि वह राज्य स्तरीय बनी स्वार्थपरक पार्टियों के साथ गठबंधन न बनाए। उन्हें गठबंधन से पहले स्थानीय नेताओं के साथ चर्चा करनी चाहिए। तेदेपा ने कांग्रेस के खिलाफ कार्य किया और केंद्र में सत्तारूढ़ पार्टी भाजपा के साथ के खिलाफ भी कार्य किया।

राहुल गांधी को चाहिए कि वह दिल्ली से वरिष्ठ नेताओं को राज्य स्तरीय नेताओं के संपर्क में भेजें। उन्हें समय समय पर लोगों की समस्याओं के समाधान के लिए जागरुक करते रहें। चुनाव के नजदीक आते ही नेता और कार्यकर्ताओं को लोगों से रू-ब-रू होने के लिए भेजने की बजाय हर समय लोगों से रू-ब-रू होने पर जोर दें। पार्टी मुखिया को चाहिए कि वह समय समय पर लोगों के साथ मुलाकात करते रहें और उनकी समस्याओं की जानकारी लेते हुए उसे सुलझाते रहें। चुनावी घोषणापत्र में दिए गए आश्वासनों को पूरा करना काफी नहीं है, बल्कि निधि की भी जरूरत होती है। इस पर भी ध्यान दिया जाना चाहिए। इस निधि को लोगों तक पहुंचाना भी चाहिए।

चुनावी बिगुल के दौरान निर्धारित समय में उम्मीदवारों का चयन भी जरूरी है। इस बात को भी ध्यान में रखना चाहिए कि चुनावी प्रचार के दौरान जरूरत से ज्यादा राज्य या केंद्र में सत्तारूढ़ पार्टी के खिलाफ बयान नहीं देने चाहिए। पार्टी को चाहिए कि वह लोगों की समस्याओं को सुलझाने के लिए मार्ग ढूंढे।

तेलंगाना विधानसभा चुनाव 2018 से प्रो. कोदंडराम को भी सीख लेनी चाहिए कि वह कक्षाओं में छात्रों को राजनीति पढ़ाते रहें, उसे राजनीति की सरजमीं पर उतारने का प्रयास न करें। क्यों कि कक्षा में किताबों तक सीमित राजनीति और लोगों के बीच खुली राजनीति की सरजमीं में अंतर होता है। उन्हें राजनीतिक पार्टी बनाने की जरूरत नहीं थी। उन्होंने पार्टी के माध्यम से लोगों के कल्याण एवं विकास का विचार किया। कांग्रेस ने चुनावी प्रचार के दौरान वरिष्ठ नेताओं के नामों का जिक्र नहीं किया।

चंद्रबाबू को झटका

तेलंगाना चुनाव 2018 में चंद्रबाबू को बड़ा जोर का झटका लगा है। उन्हें बहुत बड़ी कीमत चुकानी पड़ी। उन्होंने राजनीति की बुनियाद पर लोगों के साथ छलावा करने का प्रयास किया, लेकिन लोगों ने उनकी नीति का जवाब मतों (वोटों) से दिया। लोग ये बात कतई बदार्श्त नहीं करेंगे कि आप उनके साथ अवसरवादी बनने का प्रयास करें। उन्हें गुमराह करें या उनके साथ धोखाधड़ी करें। गैर भाजपा का माहौल किया गया था। इसके लिए प्रतिपक्ष कांग्रेस से दिल्ली में मुलाकात की गई। कांग्रेस का विचार रहा कि वह चंद्रबाबू के साथ मिल कर तेलंगाना में राजनीतिक हथकंडा अपनाए। तेलंगाना में यदि प्रजा कूटमी (जन मोर्चा) की जीत होती है तो चंद्रबाबू आंध्र प्रदेश और दिल्ली के बारे में सोचते, लेकिन ऐसा नहीं हुआ। उनकी योजना पर लोगों ने मतों के माध्यम से पानी फेर दिया।

तेलंगाना विधानसभा चुनाव 2018 के आइने में KCR ने खुले दिमाग से चुनावी रणनीति को अपनाया। उन्होंने इस नीति को अपने नेताओं और कार्यकर्ताओं के सामने रखा। उन्होंने राज्य के 80 निर्वाचन क्षेत्रों में लोगों को संबोधित किया। उन्होंने पब्लिसिटी को तवज्जो नहीं दी। उन्होंने लोगों के बीच रहते हुए उनके कल्याण एवं विकास की बातें कही। उन्होंने हर व्यक्ति को योजनाओं का लाभ पहुंचाने का प्रयास किया। उन्होंने किसी पार्टी के खिलाफ तब तक बयान नहीं दिया, जब तक उनके खिलाफ निजी तौर पर कोई टिप्पणी नहीं करता।

KCR ने चुनाव प्रचार के दौरान मृदू भाषा का उपयोग किया। उन्होंने व्यक्तिगत तौर पर किसी का मन दुखाने वाली बात नहीं कही। जो कुछ भी उन्होंने प्रचार सभाओं में कहा, खुल कर मृदू भाषा में ही कहा। KCR अपनी मृदू भाषा के लिए जाने जाते हैं। अपने प्रतिद्वंद्वी को जो भी बात कहनी हो, उसे हंसी में ही कह देते हैं। लोगों को कांग्रेस के नेताओँ की अभद्र भाषा नहीं भायी। उन्होंने तेलंगाना में कांग्रेस को भाषा के सटीक उपयोग का तरीका बता दिया।