के. रामचंद्र मूर्ति

तेलंगाना में चुनाव प्रचार अंतिम चरण में है, मतदान और नतीजे आने में कुछ ही दिन बचे हुए हैं। तेलंगाना में कांग्रेस पार्टी की जीत की संभावनाएं उस वक्त अचानक बढ़ गई जब उसने तेलुगु देशम पार्टी (टीडीपी) के साथ गठबंधन किया।

कांग्रेस-टीडीपी गठबंधन की वजह से टीआरएस के विश्वास में कमी आ गई है। टीआरएस प्रमुख व मुख्यमंत्री के. चंद्रशेखर राव ने विधानसभा भंग कर समयपूर्व चुनाव का ऐलान किया, तब राजनीतिक विश्लेषकों ने टीआरएस के फिर से भारी बहुमत के साथ सत्ता में आने की भविष्यवाणी की थी। खुद केसीआर ने दावा किया था कि टीआरएस 100 से अधिक सीटें जरूर जीतेगी। तब तक कांग्रेस की स्थिति उतनी मजबूत नहीं थी और लग रहा था कि वह टीआरएस को टक्कर देने की स्थिति में नहीं है।

परंतु बाद में टीडीपी सुप्रीमो व आंध्र प्रदेश के मुख्यमंत्री चंद्रबाबू नायडू ने दिल्ली में कांग्रेस अध्यक्ष राहुल गांधी से मुलाकात कर चुनावी गठबंधन की दिशा में पहल शुरू की और नई दिल्ली में दोनों नेता तेलंगाना चुनाव में मिलकर चुनाव लड़ने के नतीजे पर पहुंचे। चंद्रबाबू ने सोचा कि राष्ट्रीय स्तर पर नरेंद्र मोदी को प्रधानमंत्री पद से हटाने के लिए भाजपा विरोधी गठबंधन करना जरूरी है।

उधर, राहुल गांधी भी जानते थे कि पार्टी फंड की किल्लत का सामना कर रही है और तेलंगाना चुनाव में जीत के लिए उनकी पार्टी के पास कोई खास रणनीति भी नहीं है। इसी को देखते हुए कांग्रेस अध्यक्ष ने तुरंत मौका का फायदा उठाया और दोनों पार्टियों के बीच की करीब साढ़े तीन दशक पुरानी दुश्मनी को भुलाने और मिलकर चुनाव लड़ने का फैसला किया।

बाद में राहुल गांधी और चंद्रबाबू नायडू ने कहा कि वे दोनों जानते हैं कि हम अबतक एक-दूसरे के खिलाफ लड़ते रहे, लेकिन अब हमनें नरेंद्र मोदी और अमित शाह की चंगुल में फंसे देश और लोकतंत्र को बचाने के लिए उन्हें एक-दूसरे का हाथ थामना जरूरी है। इससे पहले राहुल गांधी की मां सोनिया गांधी को इटली की गोड्से और माफिया बताते हुए आंध्र प्रदेश के मुख्यमंत्री ने कहा था किकांग्रेस पार्टी ने आंध्र प्रदेश के लोगों के साथ विश्वासघात किया है और उसे दफना देना चाहिए।

तीन M लेकर आए चंद्रबाबू

चंद्रबाबू नायडू इस प्रजाकुटमी में तीन M लेकर पहुंचे हैं। कांग्रेस पार्टी ने चुनाव में सत्तारूढ़ टीआरएस से अधिक धन खर्च करने की तैयारी नहीं की थी और उसे मीडिया का भी सपोर्ट नहीं था। तेलंगाना कांग्रेस में ऐसा कोई नेता भी नहीं था, जो केसीआर के स्किल मैनेजमेंट और जोड़-तोड़ कर सके। परंतु चंद्रबाबू नाय़डू अपने साथ गठबंधन में धन (मनी), मीडिया और मैनेजमेंट (या जोड़-तोड़) का कौशल साथ लेकर आए हैं।

परंतु कांग्रेस पार्टी के लिए चंद्रबाबू नायडू के साथ कुछ नकारात्मक मामले भी आए हैं। दशकों से कांग्रेस पार्टी के पारंपरिक वोटर रहकर चंद्रबाबू नायडू और उनकी पार्टी का विरोध करने वाले कार्यकर्ता एक-दूसरे के कट्टर दुश्मनों के बीच के अवसरवाद के गठबंधन को हजम नहीं कर पा रहे हैं।

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दोनों पार्टियों के बड़े नेता पिछली बातें भुला सकते हैं और एक-दूसरे को माफ कर सकते हैं, लेकिन जिला व ग्रामीण स्तर पर एक-दूसरे के खिलाफ लड़ने वाले और इस संबंध में अदालती मामलों का सामना कर रहे राजनीतिक नेता इस गठबंधन से खुश नहीं हैं।

इसके अलावा चंद्रबाबू नायडू पर आंध्र प्रदेश के हितों की रक्षा के लिए तेलंगाना के खिलाफ काम करने के भी आरोप है। टीआरएस प्रमुख केसीआर, उनके पुत्र के. तारक रामाराव(केटीआर) और भांजे टी. हरीश राव कांग्रेस-टीडीपी गठबंधन की इन्हीं खामियों को जमकर भुनाते हुए फायदा उठा रहे हैं।

टीडीपी प्रमुख ने अपने विश्वासी ए.रेवंत रेड्डी को केसीआर के विधानसभा भंग करने से ठीक एक महीने पहले कांग्रेस में भेज दिया, जो वोट के बदले नोट मामले के आरोपी है। तेलंगाना में रेवंत रेड्डी ऐसे नेता हैं, जो हरवक्त केसीआर और उनके परिवार पर गंभीर आरोप लगाते हुए उनकी नींद उड़ा रखे हुए हैं। इस बीच, राहुल गांधी के निर्देश मिलने के बाद राज्यस्तरीय कांग्रेस नेता चंद्रबाबू नायडू को एक साहित्यकार और गाइड के रूप में देखने लगे हैं।

ऐतिहासिक बैठक

राहुल गांधी और चंद्रबाबू नायडू ने पहली बार आंध्र प्रदेश की सीमा से लगे खम्मम जिला मुख्यालय में आयोजित एक चुनावी रैली में मंच साझा किया। टीपीसीसी के कार्यकारी अध्यक्ष भट्टी विक्रमार्क के नेतृत्व में आयोजित इस जनसभा में दोनों ने पूर्व सिंचाई मंत्री सीलम सिद्धा रेड्डी का नाम लिया गया, लेकिन पूर्व प्रधानमंत्री पी.वी. नरसिम्हाराव और पूर्व मुख्यमंत्री जलगम वेंगलराव का नाम नहीं लिया गया।

यही नहीं, दस साल बाद आंध्र प्रदेश में कांग्रेस की सरकार लौटाने वाले और 2009 के चुनाव में एकीकृत आंध्र प्रदेश की कुल 42 सीटों में से 33 सीटें जितवाने वाले स्व. डॉ. वाईएस राजशेखर रेड्डी का नाम भी नहीं लिया गया।

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आंध्र प्रदेश के मुख्यमंत्री ने एकीकृत आंध्र प्रदेश के विकास के लिए खुद को जिम्मेदार बताया और दावा किया कि उन्होंने ही हैदराबाद को आईटी डेस्टीनेशन बनाया है। उस वक्त मंच पर मौजूद राहुल गांधी मुस्कुराते अपनी तरफ से हां भरते दिखे। राहुल गांधी का यह रवैया रेड्डी समुदाय को सही नहीं लगा, जो व्यापक स्तर पर कांग्रेस का समर्थन करता रहा है। यह बैठक खत्म होने के तरंत बाद चंद्रबाबू नायडू और राहुल गांधी ने हैदराबाद में आयोजित रोड शो में भाग लेने के लिए वहां से उड़ान भरा।

हैदराबाद में तेलंगाना टीडीपी के अध्यक्ष एल. रमणा द्वारा आयोजित सभा में चंद्रबाबू ने भाग लिया और रमणा ने चंद्रबाबू की जमकर तारीफ की। टीडीपी प्रमुख ने साइबराबाद और शमशाबाद एयरपोर्ट बनाने संबंधी अपनी बात यहां भी दोहराई। इनसब से यह बात साफ हो जाता है कि दोनों पार्टियों को एक-दूसरे की जरूरत है।

राष्ट्रीय स्तर पर NDA के खिलाफ वैकल्पिक गठबंधन खड़ा करने के लिए टीडीपी को कांग्रेस की आवश्यकता है और राहुल गांधी को तेलंगाना चुनाव में पार्टी की जीत के लिए जरूरी चुनावी रणनीति बनाने और कांग्रेस नेतृत्व में बनने जा रहे महागठबंधन में मायावती जैसी अडियल नेता को साथ लाने में समर्थ और अनुभवी और अवसरवादी चंद्रबाबू नायडू की जरूरत थी।

कांग्रेस-टीडीपी के लिए यह एक अच्छा अवसर है, लेकिन क्या चंद्रबाबू तेलंगाना में कांग्रेस पार्टी को सत्ता में लेकर आएगे? दूसरी तरफ, राजनीतिक जानकारों की अगर मानें तो टीआरएस राज्य में 65 से अधिक सीट जीत सकती है।

माइंड गेम्स

चंद्रबाबू नायडू ने सही समय पर अपना चुनाव प्रचार शुरू किया है। चुनाव जीतने का उनका एक अलग अंदाज है। टीडीपी प्रमुख ने तेलंगाना में चुनाव प्रचार में उतरने के तुरंत बाद एक माइंड गेम खेलना शुरू कर दिया है।

एकीकृत आंध्र प्रदेश के विभाजन पर लोकसभा में बिल पर चर्चा के दौरान काली मिर्च का पाउडर स्प्रे कर मशहूर हुए पूर्व सांसद लगड़पाटी राजगोपाल ने गठबंधन के पक्ष में लोगों की राय (सर्वे रिपोर्ट) जानने के मामले में चंद्रबाबू नायडू से हाथ मिलाया।

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उसके अगले ही दिन चंद्रबाबू नायडू, राजगोपाल और टीपीसीसी अध्यक्ष कैप्टन उत्तम कुमार रेड्डी और मीडिया के मालिक ने मुख्यमंत्री के आवास पर एक बैठक की और चुनाव में जीतने के लिए तटस्थ मतदाताओं को प्रभावित करने के उद्देश्य से अफवाह फैलाने का फैसला किया।

राजगोपाल हर बार चुनावी नतीजों की भविष्यवाणी करने के लिए मशहूर हैं। वह वर्ष 2004 के चुनाव से सही चुनावी नतीजों की भविष्यवाणी करते आ रहे हैं। उनकी खुद की RG FLash Team' नाम से एक टीम है, जो जनमत संग्रह और एग्जिट पोल्स का आयोजन करती है। अपने व्यापार के साम्राज्य को डामोडाल होते देख परेशान राजगोपाल अपने पॉवर स्टेशनों के अधुनिकीकरण के लिए आंध्र प्रदेश सरकार के साथ PPA हासिल करना चाहते हैं।

PPA के नवीनीकरण की उम्मीद में राजगोपाल चंद्रबाबू नायडू की मदद करने की कोशिश कर रहे हैं, चंद्रबाबू के लिए तेलंगाना में जीत से ज्यादा अपनी प्रजा संकल्प यात्रा में टीडीपी सरकार के घोटालों का भंडाफोड़ करते हुए उनके अस्थित्व के लिए खतरा बने वाईएसआर कांग्रेस प्रमुख वाईएस जगन का सामना करने के लिए मनोबल की जरूरत है।

सूत्रों के मुताबिक RG Flash Team द्वारा आयोजित सर्वे में टीआरएस को 70 सीटें मिल रही हैं, लेकिन राजगोपाल ने सर्वे की रिपोर्ट को उलट कर बता रहे हैं कि महाकुटमी तेलंगाना में 70 सीट जीतने जा रही है।

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पिछले दिनों सिकंदराबाद परेड मैदान में आयोजित टीआरएस की रैली में केसीआर ने राजगोपाल की इस चुनावी भविष्यवाणी का जिक्र भी किया था।

टीआरएस प्रमुख प्रति दिन 8 जनसभाएं कर रहे हैं और हर सभा में लोगों से कह रहे हैं कि आपको तय करना होगा कि राज्य में केसीआर चाहिए या फिर चंद्रबाबू नायडू। यह रणनीनति सत्तापक्ष के समर्थकों के झुकाव को प्रभावित कर सकती है।

7 दिसंबर को तेलंगाना के साथ राजस्थान विधानसभा के चुनाव भी हो रहे हैं और 11 दिसंबर को मतगणना के साथ ही सस्पेन्स खत्म हो जाएगा। 2019 के आम चुनाव से पहले होने जा रहे चार राज्यों के विधानसभा चुनाव को तेलंगाना, आंध्र प्रदेश ही नहीं बल्कि पूरे देश के लोग चुनाव परिणामों का बेसबरी से इंतजार कर रहे हैं।