..और जब एक दारोगा को अपने पास बुलाकर राजीव गांधी ने मांगी थी माफी  !

फाइल फोटो - Sakshi Samachar

जब भी किसी राजनेता की पुण्यतिथि या जयंती आती है तो लोग उनके बारे में चर्चित तमाम तरह के किस्से और बातों को याद किया करते हैं। इसके अलावा उनके द्वारा किए गए कार्यों को भी एक दूसरे को बताया करते हैं। आज एक बार फिर एक ऐसे ही राजनेता की जयंती है, जो दुर्घटनावश राजनीति में आया और एक दुर्घटना के बाद देश का प्रधानमंत्री बना और एक दुर्घटना में ही उसके जीवन का अंत हो गया। हम बात कर रहे हैं देश के पूर्व प्रधानमंत्री राजीव गांधी की जिनकी आज जयंती है।

राजीव गांधी हमारे देश के एक ऐसे प्रधानमंत्री के रूप में याद किए जाते हैं, जिन्होंने लोकसभा के चुनाव में अपनी राजनीतिक कुशलता और रणनीति के साथ साथ सहानुभूति की लहर में लोकसभा की अब तक के इतिहास में सर्वाधिक 414 सीटें जीती थीं जितना आज तक कोई भी दल या प्रधानमंत्री पद का उम्मीदवार अपने दल के लिए जीत कर नहीं ला सका है। इसके अलावा राजीव गांधी ने तमाम ऐसे कार्य किए हैं जिनको लोग आज भी याद करते हैं।

मां इंदिरा गांधी के साथ राजीव गांधी (फाइल फोटो)

नियति के आगे नहीं चली

राजीव गांधी राजनीति में आने के पहले इंडियन एयरलाइंस पायलट हुआ करते थे और उन्हें राजनीति के बजाय आम भारतीय जैसी जिंदगी रास आती थी। कहते हैं कि वह अपने भाई संजय गांधी से एकदम अलग थे। राजीव गांधी खुद न तो राजनीति को पसंद करते थे और ना ही इंदिरा गांधी की इच्छा थी कि राजीव गांधी राजनीति में आएं..लेकिन इसके बावजूद नियति को कुछ और ही मंजूर था। धीरे धीरे ऐसे हालात आए कि राजीव गांधी को ना चाहते हुए भी संजय गांधी की मृत्यु के बाद पहले राजनीति में आना पड़ा और उसके बाद 1984 में इंदिरा गांधी की मौत के बाद देश के प्रधानमंत्री की कुर्सी संभालनी पड़ी।

सादगी की चर्चा

राजीव गांधी की सादगी की अक्सर चर्चा होती है हिंदुस्तान अखबार के संपादक शशि शेखर राजीव गांधी से अपनी मुलाकात का जिक्र करते हुए बताते हैं कि पहली बार उनकी मुलाकात राजीव गांधी से उनके संसदीय क्षेत्र अमेठी में गौरीगंज के डाक बंगले में हुई थी और राजीव गांधी ने सुबह 7 बजे के आसपास डाइनिंग टेबल पर बैठे हुए टोस्ट पर मक्खन लगा रहे थे तभी सामने उनको देख कर पूछा था, "आप क्या पसंद करोगे''। उनके पूछने के अंदाज और उनके तरीके के शशिशेखर आज भी कायल हैं।

रैली को संबोधित करते राजीव गांधी (फाइल फोटो)

कौन भूल सकता है आगरा की यह घटना

मई 1991 में राजीव गांधी एक बार आगरा आए थे और उन्होंने खुफिया अलर्ट और तमाम तरह के खतरों की सूचनाओं को दरकिनार करते हुए अपने लोगों से मिलने-मिलाने की अक्सर कोशिशें किया करते थे। आगरा के रामलीला मैदान में कांग्रेस पार्टी की एक रैली के बाद वह मंच से नीचे उतर कर जनता के पास जा रहे थे तभी उन्होंने देखा कि एक बुजुर्ग महिला उनकी ओर आ रही है, पर पुलिस वाले उसे रोक रहे थे। उस बुजुर्ग महिला को रोकने वाले दारोगा को राजीव गांधी ने अपने स्वभाव के विपरीत जाकर डांट दिया था।

इसके बाद जब वह सर्किट हाउस लौटे तो वह अपने द्वारा उस पुलिस के दारोगा के प्रति किए गए व्यवहार का पश्चाताप करने लगे। अगली सुबह उन्होंने उस दारोगा को अपने पास बुलाने और क्षमा याचना करने का निर्णय लिया। सर्किट हाउस में दारोगा को बुलाकर बात की और निजी तौर पर क्षमा याचना की। राजीव गांधी के इस तरह के व्यवहार और बड़प्पन से दारोगा अभिभूत हो गया और बाहर आकर मीडिया के सामने आंखों से छलकते आंसू व रूंधे हुए गले से कहने लगा कि..काश हर नेता इनके जैसा ही हो जाता।

कहते हैं कि राजीव गांधी राजनीतिक विरासत वाले परिवार से होने के बावजूद राजनीति को ज्यादा पसंद नहीं करते थे। शायद इसीलिए सियासत की मूल प्रकृति का अंदाजा लगाने की कला उन्हें नहीं मालूम थी। कभी कभी राजनीतिक चालबाजियों व रणनीतियों को समझने में देर लगा करती थी। इसका लाभ उठाकर कई बार उनके राजनीतिक सलाहकारों ने उन्हें कुछ ऐसा करने पर मजबूर किया जिसे शायद वह करना भी नहीं चाहते थे।

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ऐसे थे अलग तरह के काम

वैसे राजीव गांधी ने प्रधानमंत्री बनते ही नई शिक्षा नीति की घोषणा की। देश में कई क्षेत्रों में नई पहल और शुरुआत की जिनमें संचार क्रांति और कंप्यूटर क्रांति, शिक्षा का प्रसार, 18 साल के युवाओं को मताधिकार, पंचायती राज आदि शामिल रहे। साथ ही देश के औद्योगिक विकास के लिए तरह-तरह के आयोग गठित किए। विज्ञान और प्रौद्योगिकी को नई गति और दिशा देने के लिए प्रयास तेज किये गये और देश में पहली बार ‘टेक्नोलॉजी मिशन’ एक संस्थागत प्रणाली के रूप में अस्तित्व में लाया गया। राजीव गांधी के पहल पर हुए ऐतिहासिक पंजाब, आसाम, मिजोरम समझौतों के उनकी राजनितिक सूझबूझ का परिचय दिया। देश की राजनीती में ये समझौते महत्वपूर्ण पड़ाव थे।

धीरे-धीरे अंतरराष्ट्रीय क्षितिज में भी राजीव गांधी एक सशक्त और कुशल राजनेता के रूप में उभरने लगे थे। अपने शासनकाल में उन्होंने कई देशों की यात्रा की और उनसे भारत के राजनयिक, आर्थिक व सांस्कृतिक संबंध बढाए। पर प्रधानमंत्रित्व काल में भारतीय सेना द्वारा बोफ़ोर्स तोप की खरीदारी में लिए गये किकबैक (कमीशन) का मुद्दा विरोधी दलों के द्वारा ऐसा उछाला गया कि अगले चुनाव में कांग्रेस पार्टी की हार हुई और राजीव को प्रधानमंत्री पद से हटना पड़ा। इसके बाद वह दोबारा प्रधानमंत्री की कुर्सी पर काबिज नहीं हो पाए और 21 मई 1991 को एक आत्मघाती हमले में देश को एक नई सोच देने वाले नेता को हमसे छीन लिया।

देश के युवाओं में जोश व ज्यादा से ज्यादा मौका देने के लिए पहल करने वाले इस नेता को उसकी जयंती पर नमन।

..विजय कुमार तिवारी..चीफ सब एडिटर..साक्षी समाचार

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