टी.एस. सुधीर

पिछले दस दिनों में चेन्नई के कावेरी हॉस्पिटल के बाहर खड़े लोगों के लिए यह सबसे भावुक क्षण रहा। लोग सर्वशक्तिमान को बुला रहे हैं, दीप जला रहे हैं और ईश्वर के पास अपनी प्रार्थनाएं भेज रहे हैं, जिससे उनके प्रिय कवि-राजेनता का जीवन बढ़ सके। विडंबना देखिए यह सब उस मुथुवेल करुणानिधि के लिए किया जा रहा है, जिन्होंने नास्तिकता की आस्तीन पहन रखी थी।

मंगलवार की शाम को 6 बजकर 10 मिनट पर करुणानिधि अपनी जिंदगी की जंग हार जाते हैं। जैसे ही न्यूज चैनलों पर 94 साल के नेता के निधन की खबर प्रसारित होती है चारों तरफ शांति छा जाती है। यह अप्रत्याशित नहीं था। बीती शाम में न्यूज चैनलों पर प्रसारित हुए बुलेटिन में उनके लगातार गिरती सेहत के बारे में बताया गया था, जिससे इस बात के साफ संकेत मिलने शुरू हो गए थे, अंत निकट है।

खबरों में बताया गया था कि ''उनकी उम्र से जुड़ी बीमारियों के कारण उनके शरीर के जरूरी अंग ठीक से काम नहीं कर रहे थे, जिसे स्थिर रख पाना चिकित्सकों के लिए चुनौतीपूर्ण साबित हो रहा था।'' मंगलवार की शाम में 4:30 बजे प्रसारित हुए एक और न्यूज बुलेटिन में यह बताया गया कि करुणानिधि की हालत काफी नाजुक और अस्थिर है। न्यूज बुलेटिन में बताया गया कि ''अधिकतम चिकित्सा सहायता के बावजूद, उनके महत्वपूर्ण अंगों के कार्यों में गिरावट जारी है''।

इसे भाग्य कहें, जीवन का मोड़ या फिर कुछ और, करुणानिधि के स्वास्थ्य में गिरावट दिसम्बर 2016 में उसी दिन से शुरू हुई थी, जिस दिन जयललिता की मृत्यु हुई थी। ऐसा लगता है कि यह करुणानिधि के लिए संकेत था कि उनका मुख्य विरोधी चला गया है और अब उनके पास लड़ने के लिए कोई बड़ी लड़ाई नहीं बची है। करुणानिधि के राजनीतिक करियर को पहचान एमजी रामचंद्रन से दोस्ती के बाद मिली थी। जो जयललिता से कड़वाहट के बाद खट्टी हो गई थी।

करुणानिधि एक अच्छे पटकथा लेखक थे, लेकिन वह अपने जीवन की कहानी और उसमें आने वाले मोड़ के बारे में बहुत अच्छा नहीं लिख पाए थे। पीछे मुड़कर देखें तो 1947 में उनके द्वारा लिखी गई तमिल फिल्म 'राजकुमारी' और मंत्रीकुमारी कहानी एमजीआर और करुणानिधि के लिए ब्लॉकबस्टर साबित हुई थी और बॉक्स ऑफिस पर भी अच्छा प्रदर्शन किया। राजकुमारी की सफलता के तीन साल बाद फिल्म मंत्री कुमारी आई थी, जिसके लिए एमजीआर का नाम करुणानिधि ने ही सुझाया था।

करुणानिधि ने 75 से अधिक फिल्में लिखी, उन्होंने विचारों से कभी समझौता नहीं किया और अपने कार्यकर्ताओं में लगातार विश्वास बनाए रखा, जिसकी वजह वह एक दिन डीएमके स्टार प्रचारक बनकर उभरे। यही कारण रहा कि बेहद निराशाजनक दौर में करुणानिधि ने तमिल फिल्म उद्योग में एमजीआर के प्रतिद्वंद्वी के रूप में अपने सबसे बड़े बेटे एमके मुथू को बढ़ावा देने की कोशिश की।

यहां तक की एमजीआर के रहन-सहन की भी नकल करना भी सिखाया। लेकिन करुणानिधि एमजीआर की बढ़ती लोकप्रियता के मामले में नहीं आ सके और बाद में एक विवाद के बाद एमजीआर को पार्टी से बाहर का रास्ता दिखा दिया गया।

एमजीआर ने राजनीतिक करियर में अपने ऑन-स्क्रीन व्यक्तित्व का उपयोग करना शुरू कर दिया। जिससे करुणानिधि काफी नाराज भी हुए, क्योंकि इस व्यक्तित्व को आकार देने में उन्होंने महत्वपूर्ण भूमिका निभाई थी। जब एमजीआर ने अन्ना द्रविड़ मुनेत्र कडगम पार्टी (एडीएमके) बनाई, तो करुणानिधि ने उनकी पार्टी को ''नाडिगर कची'' (फिल्मी पार्टी) बताया। एक मौके पर करुणानिधि ने लोगों से कहा कि एमजीआर का फिल्मी व्यक्तित्व और उनका राजनीतिक व्यक्तित्व दोनों अलग है। अभिनेता अच्छे नेता नहीं होते हैं। यही नहीं करुणानिधि ने ''सिनेमा सोरू पॉडुमा?'' (क्या सिनेमा हमें खिलाएगा?) नाम से गीतों की एक पुस्तिका निकाली। इसके गीत ऐसे थे, जिसने लोगों को गुमराह कर दिया।

जिसके बाद एमजीआर ने करुणनिधि से बदला लेने के लिए उनकी सरकार के खिलाफ भ्रष्टाचार के आरोपों का पुलिंदा तैयार किया और ज्ञापन दिया। जनवरी 1976 में, भ्रष्टाचार को आरोपों को चलते डीएमके सरकार को बर्खास्त कर दिया गया और आरोपों की जांच के लिए न्यायमूर्ति सरकारिया आयोग की स्थापना की गई।

साल 1976 और 1989 के बीच का समय करुणानिधि के लिए सबसे कठिन समय था। उन्हें सत्ता से बाहर रहकर अपने कार्यकर्ताओं में विश्वास जगाते हुए अपनी पार्टी डीएमके पर पकड़ बनाए रखनी थी। वहीं एमजीआर अपने राजनीतिक दुश्मन के लिए कोई रास्ता नहीं छोड़ना चाहते थे। जब साल करुणानिधि 1984 में एमएलसी चुने गए तो, एमजीआर ने विधान परिषद को समाप्त करने के लिए तमिलनाडु विधानसभा में एक प्रस्ताव पेश किया और कहा कि इसकी खास आवश्यक्ता नहीं है। जिस पर डीएमके के लोगों का कहना था कि एमजीआर ऐसा कोई मंच नहीं देना चाहते हैं, जहां से करुणानिधि उनके खिलाफ बोल सकें।

चुनावी उपलब्धियों के संदर्भ में देखा जाए तो करुणानिधि का कद तमिलनाडु में ही नहीं पूर देश में बहुत ऊंचा था। करुणानिधि 1957 से अपने अंत समय तक सभी चुनाव जीतते आए, सिर्फ साल 1984 को छोड़कर, जब उन्होंने खुद ही चुनाव नहीं लड़ा था। वह 13 बार विधायक रहे तो पांच बार राज्य का मुख्यमंत्री पद संभाला। भारतीय राजनीति में करुणानिधि के समानांतर दो ही नेता था, जिसमें दो तमिलनाडु के थे और दोनों ही उनके जूनियर थे। 1976 में करुणानिधि की सरकार बर्खास्त होने के बाद वह तब तक मुख्यमंत्री नहीं बन सके जब तक एमजीआर तमिल की राजनीति में सक्रिया रहे।

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1987 में एमजीआर के निधन के बाद ही करुणानिधि फिर से सत्ता का स्वाद चख पाए। वहीं 2016 में जयललिता ने लागातार दूसरी बार सत्ता हासिल कर अंतिम बार करुणानिधि को मुख्यमंत्री की कुर्सी पर बैठने से रोक दिया था।

उपलब्ध दस्तावेजों के अनुसार कॉलीवुड में करुणानिधि और जयललिता का आमना-सामना सिर्फ एक ही बार हुआ। जब 1966 आई तमिल फिल्म 'मनी मगुदम' की कहानी करुणानिधि ने लिखी थी और इसके सेकेंड लीड रोल में जयललिता थीं।

जब जयललिता ने राजनीति में प्रवेश किया तो डीएमके ने उनके फिल्मी व्यक्तिव को लेकर हमला करना शुरू कर दिया।

जयललिता की बॉयोग्राफी लेखिका वासंती ने लिखा है कि जून 1982 में कुड्डालोर में आयोजित पार्टी के सम्मेलन में जब जयललिता अपना पहला राजनीतिक भाषण देने वाली थी तो रुपहले पर्दे की रानी को सुनने के लिए पूरा शहर इक्ट्ठा हो गया था।

वासंती ने लिखा है कि ज्यादातर लोग सिर्फ सुंदर चेहरे को देखने के लिए आए थे, लेकिन उन्हें एक प्रभावशाली और जोशिला भाषण सुनने को मिला। हालांकि, डीएमके ने जयललिता की राजनीतिक एंट्री को अपने पार्टी के मुखपत्र में ''कुड्डालोर कैबरे'' बताया।

1989 में तमिलनाडु विधानसभा में घटी घटना ने दोनों दलों के संबंधों में और कड़वाहट ला दिया। जब जयललिता ने सत्तारूढ़ पार्टी डीएमके पर फोन टैपिंग का आरोप लगाया। जिस पर मुख्यमंत्री करुणानिधि ने अशोभनीय टिप्पणी की। जिसे बाद में विधानसभा की कार्यवाही से निकाल दिया गया। इसके बाद विधानसभा में दोनों दलों के नेताओं हंगामा मचाते हुए हाथा-पाई शुरू कर दी। इस दौरान डीएमके नेता दुराइमुरुगन ने जयललिता की साड़ी में पकड़ ली की और कथित तौर पर इसे साड़ी खींचने की कोशिश बताया गया। इसके बाद जयललित ने वहीं शपथ लिया कि वह विधानसभा में तभी कदम रखेंगी जब वह अगला चुनाव पूर्ण बहुमत से जीतकर आएंगी और मर्दों के वर्चस्व को खत्म कर देंगी।

1991 करुणानिधि का सबसे बुरा क्षण था। जया विधानसभा में 225 सीटों के साथ मुख्यमंत्री के रूप में लौट आईं। इस चुनाव में डीएमके के नेतृत्व वाले गठबंधन सात सीटों पर सिमट कर रह गया। यही नहीं इस चुनाव में जयललिता की पार्टी का वोट प्रतिशत 59.8 रहा जो कि डीएम को मिले 30 प्रतिशत वोट की तुलना में दोगुना था। करुणानिधि ने विधानसभा में भाग लेने की बजाए अपनी सीट से इस्तीफा देने का फैसला किया। उस समय के नौकरशाहों का कहना है कि ऐसा उन्होंने इसलिए किया था, क्योंकि करुणानिधि को डर था कि 1989 में विधानसभा के अंदर जयललिता पर हुए हमले का एआईएडीएमके बदला ले सकती है।

दोनों की दुश्मनी की सीमा उस समय पार हो गई। जब फ्लाइओवर भ्रष्टाचार के मामले में जयललिता ने देर रात सोते समय करुणानिधि को गिरफ्तार करवाया। इस घटना को 1990 के उत्तरार्ध में हुई जयललिता की गिरफ्तारी के बदले के तौर पर देखा गया। दोनों ने जैसे को तैसा की तर्ज पर चलते हुए घृणा की राजनीति खेली।

15 साल बाद जब जयललिता फिर से मुख्यमंत्री पद की शपथ ले रहीं थी, तब शपथ ग्रहण समारोह में स्टालिन को पहली पंक्ति में जगह नहीं दी गई, जबकि विधानसभा में उनकी पार्टी 89 विधायक थे। जयललिता के इस कदम से करुणानिधि काफी नाराज हुए और कहा कि जयललिता अभी भी नहीं बदली हैं और जानबूझकर अपमानित किया गया है। इस पर जयललिता ने स्पष्टीकरण देते हुए कहा कि उनका उद्देश्य स्टालिन को अपमानित करना नहीं था।

इन सबको छोड़ दिया जाए तो पार्टी के भीतर के लोगों की माने तो एमजीआर का विशेष झुकाव करुणानिधि की तरफ रहा। अगर कोई करुणानिधि को सीधे उनके नाम से पुकारता था तो एमजीआर उसे फटकार लगाते थे और कहते थे कि उन्हें 'कलइगर' (कलाकार) कहा करो। जब एमजीआर की मृत्यु हुई तो चेन्नई स्थित उनके आवास पर सबसे पहले पहुंचने वाले ने करुणानिधि ही बताए जाते हैं।

करुणानिधि की समाधि भी मरीना बीच पर बनाई गई है, जहां सीएन अन्नदुरई, एमजीआर और जयललिता की समाधियां हैं। इस जगह को तमिलनाडु की जनता द्वारा राज्य को ऊंचाई पर ले जाने वाले अपने नेताओं को दिए गए सम्मान के तौर पर देखा जाता है।

करुणानिधि के निधन के साथ ही तमिलनाडु की राजनीति का एक युग खत्म हो गया है। जिसमें तीन बड़ी हस्तियों ने अपने-अपने अंदाज में अनोखे तरीके से राजनीति की।