गुरु पूर्णिमा 2019 : जानें भारतीय परंपरा में इसका महत्व, इसलिए आज के दिन मनाते हैं यह महापर्व

कांसेप्ट फोटो - Sakshi Samachar

भारतीय परंपरा में गुरु पूर्णिमा का बड़ा महत्व है। इसदिन हर क्षेत्र से जुड़े लोग अपने उस गुरू को याद करके गुरू शिष्य परंपरा को जीवंत करने की कोशिश करते हैं, जिसकी प्रेरणा से वह किसी खास मुकाम को हासिल किए होते हैं।

हमारे देश में गुरु पूर्णिमा का पर्व आज भी बड़ी श्रद्धा व धूमधाम से मनाया जाता है। वैसे तो प्राचीन काल में जब विद्यार्थी गुरु के आश्रम में निःशुल्क शिक्षा ग्रहण करता था तो इसी दिन श्रद्धा भाव से प्रेरित होकर अपने गुरु का पूजन करके उन्हें अपनी शक्ति सामर्थ्यानुसार दक्षिणा देकर कृतकृत्य होता था।

आज भले ही यह प्रक्रिया खत्म हो गयी हो पर इसका महत्व कम नहीं हुआ है।

आज भी पारंपरिक रूप से शिक्षा देने वाले विद्यालयों, संगीत और कला के साथ साथ आध्यात्मिक क्षेत्र से जुड़े लोग इस दिन अपने अपने गुरु को याद करते हैं और उनको यथा संभव अपनी ओर से भेंट देकर सम्मानित करने की कोशिश करते हैं।

कई धार्मिक स्थलों व मन्दिरों में विशेष पूजा आयोजित की जाती है। देशभर में पवित्र नदियों में श्रद्धालु स्नान करके दानपुण्य करने का कार्य करते हैं। जगह-जगह भंडारे भी आयोजित किए जाते हैं और कई स्थानों पर विशाल मेले भी लगते हैं।

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वैसे तो आषाढ़ मास की पूर्णिमा को 'गुरु पूर्णिमा' का महा पर्व मनाया जाता है। इस दिन गुरु पूजा का विधान है। गुरु पूर्णिमा वर्षा ऋतु के आरम्भ में आती है। इस दिन से चार महीने तक परिव्राजक साधु-सन्त एक ही स्थान पर रहकर ज्ञान की गंगा बहाते हैं।

ये चार महीने मौसम की दृष्टि से भी सर्वश्रेष्ठ होते हैं। न अधिक गर्मी और न अधिक सर्दी। इसलिए अध्ययन के लिए उपयुक्त माने गए हैं।

कहते हैं कि जैसे सूर्य के ताप से तप्त भूमि को वर्षा से शीतलता एवं फसल पैदा करने की शक्ति मिलती है, वैसे ही गुरु-चरणों में उपस्थित साधकों को ज्ञान, शान्ति, भक्ति और योग शक्ति प्राप्त करने की शक्ति मिलती है।

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यह दिन महाभारत के रचयिता कृष्ण द्वैपायन व्यास का जन्मदिन भी है। वे संस्कृत के प्रकांड विद्वान कहे जाते थे और उन्होंने चारों वेदों की भी रचना की थी।

इस कारण उनका एक नाम वेद व्यास भी है। उन्हें आदिगुरु कहा जाता है और उनके सम्मान में गुरु पूर्णिमा को व्यास पूर्णिमा नाम से भी जाना जाता है। भक्तिकाल के संत घीसादास का भी जन्म इसी दिन हुआ था वे कबीरदास के शिष्य थे।

शास्त्रों में 'गु' का अर्थ बताया गया है- अंधकार या मूल अज्ञान और 'रु' का का अर्थ किया गया है- उसका निरोधक। गुरु को गुरु इसलिए कहा जाता है कि वह अज्ञान तिमिर का ज्ञानांजन-शलाका से निवारण कर देता है। अर्थात् अंधकार को हटाकर प्रकाश की ओर ले जाने वाले को 'गुरु' कहा जाता है।

"अज्ञान तिमिरांधश्च ज्ञानांजन शलाकया, चक्षुन्मीलितम तस्मै श्री गुरुवै नमः "

गुरु तथा देवता में समानता के लिए एक श्लोक में कहा गया है कि जैसी भक्ति की आवश्यकता देवता के लिए है वैसी ही गुरु के लिए भी। बल्कि सद्गुरु की कृपा से ईश्वर का साक्षात्कार भी संभव है। गुरु की कृपा के अभाव में कुछ भी संभव नहीं है।

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