हैदराबाद : तेलंगाना हाईकोर्ट ने हनुमकोंडा में नौ महीने की बालिका के बलात्कार व हत्या के मामले में दोषी प्रवीण उर्फ पवन को निचली कोर्ट द्वारा सुनाई गई फांसी की सजा को आजीवन कारावास में बदल दिया है और आखिरी सांस तक जेल में ही रखने का फैसला सुनाया।

इस साल 6 जून को हनुमकोंडा में बालिका के साथ अत्याचार कर हत्या करने वाले मामले में अभियुक्त की अपील पर उच्च न्यायालय के मुख्य न्यायाधीश जस्टिस आर एस चौहान और जस्टिस ए अभिषेक रेड्डी की खंडपीठ ने यह फैसला सुनाया।

फांसी की सजा को रद्द करने के मामले को लेकर विश्व भर में की जा रही चर्चा की पृष्ठभूमि में खंडपीठ ने कहा कि जीवन और मृत्यु मानव के हाथ में नहीं है। फांसी की सजा पर अमल कर रहे अमेरिका सहित अन्य देशों में अपराध की दर से ज्यादा फर्क नहीं है।

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खंडपीठ ने कहा कि फांसी की सजा के डर से अपराध को कम किए जाने के दावे गलत है। भारत में भी फांसी की सजा पर जनता, विधायकों और न्यायाधीशों की अलग-अलग राय है। फांसी की सजा के बारे में उच्चतम न्यायालय द्वारा सुनाए गए विभिन्न फैसलों का उल्लेख करते हुए न्यायालय ने कहा कि फांसी की सजा को आजीवन कारावास में बदला जा सकता है। दुर्भाग्य यही कि उस लड़की को वापस नहीं लाया जा सकता।

इसके साथ ही यह भी सोचा जाना चाहिए कि अपराधी की समाज के लिए कितना खतरनाक है। इस पर में पीड़िता को न्याय दिलाने के साथ समाज को भी सुरक्षा प्रदान करने सबूतों के आधार पर फांसी दे दी जाने वाली सजा से उसी तरह के अपराधी को सबक मिलना चाहिए। इतना ही नहीं बल्कि बदलाव लाने के लिए मददगार साबित होना चाहिए था।

कोर्ट के उस बात को गलत बताया कि पछतावा नहीं है। खंडपीठ ने कहा कि अपराध स्वीकार करना ही पछतावा कहा जाता है। अपराधी 25 साप का और पिछड़ी जाति से संबंधित है। चोरी के सिवा उसके खिलाफ कोई अन्य मामला दर्ज नहीं है। प्रासिक्यूशन यह साबित नहीं सका कि अपराधी में बदलाव नहीं आ सकता। इस तरह के मामले में कोर्ट को मध्य मार्ग अपनाना पड़ेगा।

इस मामले में सभी पहलुओं को देखते हुए निचली कोर्ट द्वारा का समर्थन करने के बावजूद फांसी की सजा को आजीवन कारावास में बदल दी। साथ ही कहा कि किसी तरह नहीं की और आखिर उसे जेल में ही रखा जाना चाहिए।