नई दिल्ली : कोलकाता स्थित ईडन गार्डन्स स्टेडियम पहली बार भारत और बांग्लादेश के बीच शुक्रवार से शुरू होने वाले पहले ऐतिहासिक दिन-रात टेस्ट मैच के लिए पूरी तरह से तैयार है। दिन-रात टेस्ट मैच गुलाबी गेंद से खेला जाएगा और इस मैच को लेकर अब सबकी नजरें इस बात पर लगी हुई हैं कि क्या इस मैच में यह गेंद रिवर्स स्विंग होगी या नहीं।

इस बीच, बीसीसीआई के अधिकारियों ने आईएएनएस से कहा है कि मैदान पर रिवर्स स्विंग हासिल करने के लिए गुलाबी गेंद की सिलाई हाथ से की गई है ताकि यह रिवर्स स्विंग में मददगार साबित हो सके।

अधिकारी ने कहा, "गुलाबी गेंद को हाथ से सिलकर तैयार किया गया है ताकि यह अधिक से अधिक रिवर्स स्विंग हो सके। इसलिए गुलाबी गेंद से स्विंग हासिल करने में अब कोई समस्या नहीं होनी चाहिए।"

गुलाबी गेंद को बनाने में लगभग सात से आठ दिन का समय लगाता है और फिर इसके बाद इस पर गुलाबी रंग के चमड़े लगाए जाते हैं। एक बार जब चमड़ा तैयार हो जाता है तो फिर उन्हें टुकड़ों में काट दिया जाता है, जो बाद में गेंद को ढंक देता है।

इसके बाद इसे चमड़े की कटिंग से सिला जाता है और एक बार फिर से रंगा जाता है और फिर इसे सिलाई करके तैयार किया जाता है। गेंद के भीतरी हिस्से की सिलाई पहले ही कर दी जाती है और फिर बाहर के हिस्से की सिलाई होती है।

एक बार मुख्य प्रक्रिया पूरी हो जाती है तो फिर गेंद को अंतिम रूप से तौलने और उसे बाहर भेजने से पहले उस पर अच्छी तरह से रंग चढ़ाया जाता है। गुलाबी गेंद पारंपरिक लाल गेंद की तुलना में थोड़ा भारी है।

लाल गेंद से पिंक बॉल है कितनी अलग

लाल और पिंक बॉल में काफी कुछ अंतर होता है। पिंक बॉल को लाल गेंद से अलग बनाया गया है ताकि गेंद का रंग जल्दी न निकले। लाल गेंद में रंग की केवल एक परत होती है, जबकि गुलाबी गेंद में गुलाबी रंग की दो परत होती हैं ताकि ज्यादा समय तक रंग बरकरार रहे। लाल रंग की बॉल को डाई किया जाता है, जबकि गुलाबी रंग की बॉल पर पेंट किया जाता है और उसकी एक खास तरह के केमिकल से कोटिंग की जाती है, ताकि रंग लंबे समय तक बना रहे। लाल गेंद का रंग गहरा होता है, जिसके चलते खिलाड़ियों को गेंद चमकाने और पूरे दिन स्विंग हासिल करने में मदद मिलती है।

गेंदबाजों के लिए दिक्कत

तेज गेंदबाजों को गुलाबी गेंद को नियंत्रित करने में दिक्कत हो सकती है, जिससे इनस्विंग करने में परेशानी होगी। स्पिनरों की बात है तो गुलाबी गेंद थोड़ी मुलायम होती है इसलिए स्पिनरों को उसे ग्रिप करने में थोड़ी परेशानी हो सकती है, हालांकि गेंद की चमक कम होने के बाद गेंद स्पिनर्स को मदद कर सकती है।

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गुलाबी गेंद से बल्लेबाजों को होगा फायदा

नई गुलाबी गेंद ज्यादा स्विंग करती है, जो बल्लेबाजों के लिए दिक्कत बन सकती है। इसके अलावा बल्लेबाजों को यह समझने में दिक्कत हो सकती है कि बॉल कैसे और कितनी स्पिन कर रही है, क्योंकि लाल गेंद में सफेद सिलाई होती है जो गेंद की स्पिन को दिखा देती है, लेकिन गुलाबी गेंद की सफेद सिलाई लाल गेंद जितनी उभर कर नहीं दिखती। इसके साथ ही पिंक बॉल से शाम के समय जब सूरज के ढलने का समय होगा तब गुलाबी गेंद से खेलने में दिक्कत होगी।

क्रिकेट में पहली बार पिंक बॉल का इस्तेमाल एक वन-डे मैच में किया गया था। ये मुकाबला ऑस्ट्रेलिया बनाम इंग्लैंड की महिला टीमों के बीच 2009 में खेला गया था। हालांकि पुरुष क्रिकेट में इसे आने में छह साल और लग गए।