जब गलत तबला वादन सुनकर कोठे पर पहुंच गए थे शंकर, ऐसे मिला जोड़ीदार जयकिशन  

शंकर-जयकिशन की हिट जोड़ी  - Sakshi Samachar

आज भी पुरानी हिंदी फिल्मों के गाने शिद्दत से सुने जाते हैं, ये वो गाने हैं जो दिल को सुकून पहुंचाते हैं, ताजगी का एहसास कराते हैं। जी हां, उस समय के गाने जितने बेहतरीन तरीके से लिखे जाते थे उतने ही खास तरीके से सुरों में पिरोए भी जाते थे, तभी तो उन गानों की ताजगी बनी हुई है।

आज भी इन पुराने गानों के रीमिक्स बनाकर नए तरीके से पेश भी किया जाता है। जब भी ऐसे मधुर संगीत व गानों की बात होती है तो उस समय की संगीतकार जोड़ी शंकर जयकिशन का नाम सबसे पहले आता है।

संगीतकार शंकर-जयकिशन की जोड़ी पहली ऐसी संगीतकार जोड़ी थी जिसने लगभग दो दशक तक भारतीय फिल्मों के संगीत जगत पर राज किया और भारतीय फिल्मी संगीत को अंतर्राष्ट्रीय स्तर पर लोकप्रियता भी दिलाई।

हैदराबाद से था शंकर का नाता

शंकर-जयकिशन की जोड़ी के शंकर रघुवंशी का जन्म 15 अक्टूबर 1922 को हैदराबाद में हुआ था। शंकर के पिता रामसिंह रघुवंशी मूलत: मध्यप्रदेश के थे। काम के सिलसिले में वे हैदराबाद में बस गए थे।

हैदराबाद में जन्में शंकर को शुरू से ही कुश्ती का शौक था। उनका कसरती बदन बचपन के इसी शौक का परिणाम था। बचपन में वे घर के पास के शिव मंदिर में तबला वादक को देखते और इसके प्रति आकर्षित होते।

फिर उन्होंने तबला वादन भी सीखा। महफिलों में तबला बजाते हुए उस्ताद नसीर खान की निगाह उन पर पड़ी तो फिर शंकर उनके चेले हो गए।

आर्थिक तंगी के चलते शंकर को ट्यूशन भी करनी पड़ी थी पर उनका तबला वादन के प्रेम कम होने की बजाय बढ़ता ही गया।

राजकपूर के साथ शंकर-जयकिशन व गीतकार शैलेंद्र 

शंकर का हैदराबाद से प्रेम हमें फिल्म श्री 420 के गाने में रमैया वस्तावैया में देखने को मिलता है जहां उन्होंने हिंदी के साथ ही तेलुगु का इस्तेमाल किया और यह गाना हिट भी रहा।

जब गलत तबला वादन सुनकर कोठे पर पहुंच गए थे शंकर

एक बार हैदराबाद की महबूब की मेंहदी की गलियों से शंकर गुजर रहे थे और गलत तबला वादन सुनकर तब वे कोठे पर पहुंचे और तबलावादक को गलत बजाने पर टोक दिया।

बात बढ़ी तो शंकर ने इस सफाई से तबला बजाकर बताया कि सब उनकी काबिलियत की तारीफ करने लगे।

लता मंगेशकर के साथ शंकर-जयकिशन 

कुछ ऐसे पहुंचे बम्बई

तबला वादन के प्रति प्रेम के चलते शंकर एक नाट्य मंडली में शामिल हो गए। कुछ समय बाद इस नाट्य मंडली के संचालक ने बम्बई जाकर पृथ्वी थियेटर्स में नौकरी कर ली, तो शंकर भी बम्बई चले गए और 75 रुपये प्रतिमाह पर पृथ्वी थियेटर्स में तबलावादक बन गए।

इसके बाद शंकर को पृथ्वी थियेटर्स में छोटी-मोटी भूमिकाएं मिलने लगीं और उन्होंने वहीं सितार बजाना भी सीख लिया।

शंकर को ऐसे मिले अपने जोड़ीदार जयकिशन

जब भी शंकर का नाम लिया जाता है तो साथ ही जयकिशन का नाम भी आता है तो इन दोनों की मुलाकात भी बड़े अजीब ढंग से हुई।

ऑपेरा हाउस थियेटर के पास की व्यायामशाला में कसरत के लिए शंकर जाया करते थे और वहीं दत्ताराम से उनकी मुलाक़ात हुई। दत्ताराम शंकर से तबले और ढोलक की बारीकियाँ सीखने लगे, और एक दिन उन्हें फ़िल्मों में संगीत का काम दिलाने के लिए दादर में गुजराती फ़िल्मकार चंद्रवदन भट्ट के पास ले गये।

राजकपूर की फिल्मों की हिट संगीतकार जोड़ी शंकर-जयकिशन 

वहीं जयकिशन भी फ़िल्मों में काम की तलाश में आये हुए थे। इंतज़ार के क्षणों में ही बातों में शंकर को पता चला कि जयकिशन हारमोनियम बजाते थे। उस समय सौभाग्य से पृथ्वी थियेटर में हारमोनियम मास्टर की जगह ख़ाली थी।

शंकर ने प्रस्ताव रखा तो जयकिशन झट से मान गये और इस तरह पृथ्वी थियेटर्स के परचम तले शंकर और जयकिशन साथ-साथ काम करने लगे।

'पठान' में दोनों ने साथ-साथ अभिनय भी किया। काम के साथ-साथ दोस्ती भी प्रगाढ़ होती गयी। शंकर साथ-साथ हुस्नलाल भगतराम के लिए भी तबला बजाने का काम करते थे और दोनों भाइयों से भी संगीत की कई बारीकियाँ उन्होंने सीखीं।

पृथ्वी थियेटर्स में ही काम करते करते शंकर और जयकिशन राजकपूर के भी क़रीबी हो गए।

हालाँकि राज कपूर की पहली फ़िल्म के संगीतकार थे पृथ्वी थियेटर्स के वरिष्ठ संगीतकार राम गाँगुली और शंकर जयकिशन उनके सहायक थे।

कमाल की दोस्ती थी शंकर-जयकिशन की 

ऐसे बनीं शंकर-जयकिशन की जोड़ी और मिली पहली फिल्म 'बरसात'

बरसात के लिए संगीत की रिकार्डिंग के शुरुआती दौर में जब राजकपूर को पता चला कि बरसात के लिए बनायी एक धुन राम गाँगुली उसी समय बन रही एक दूसरी फ़िल्म के लिए प्रयुक्त कर रहे हैं तो वे आपा खो बैठे।

शंकर जयकिशन की प्रतिभा के तो वो कायल थे ही और जब उन्होंने शंकर के द्वारा उनकी लिखी कम्पोज़िशन 'अम्बुआ का पेड़ है, वही मुडेर है, मेरे बालमा, अब काहे की देर है' की बनायी धुन सुनी तो उन्होंने राम गाँगुली की जगह शंकर जयकिशन को ही बरसात का संगीत सौंप दिया।

यही धुन बाद में 'जिया बेकरार है, छायी बहार है' के रूप में 'बरसात' में आयी। फ़िल्म बरसात में उनकी जोड़ी ने जिया बेकरार है और बरसात में हमसे मिले तुम सजन जैसा सुपरहिट संगीत दिया। फ़िल्म की कामयाबी के बाद शंकर जयकिशन बतौर संगीतकार अपनी पहचान बनाने में सफल हो गये।

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इसे महज एक संयोग ही कहा जायेगा कि फ़िल्म बरसात से ही गीतकार शैलेन्द्र और हसरत जयपुरी ने भी अपने सिने कैरियर की शुरूआत की थी।

फ़िल्म बरसात की सफलता के बाद शंकर जयकिशन राजकपूर के चहेते संगीतकार बन गये। इसके बाद राजकपूर की फ़िल्मों के लिये शंकर जयकिशन ने बेमिसाल संगीत देकर उनकी फ़िल्मों को सफल बनाने मे महत्त्वपूर्ण भूमिका निभाई।

"बरसात" कामयाबी के बाद जयकिशन और शंकर की जोड़ी ने फिर पलट कर नहीं देखा और हिट फिल्मों की झडी सी लगा दी। फिल्म में उनके संगीत का होना सफलता की गारंटी मानी जाने लगी।

आवारा, आह, श्री 420, हलाकू, पतिता, कठपुतली, अनाडी, चोरी-चोरी, दाग, बादशाह, बूट पालिश और उजाला उनके स्वर्णिम दौर की कुछ उल्लेखनीय फिल्में हैं।

संगीतकार मदन मोहन के साथ शंकर 

आवारा और श्री 420 से उनकी ख्याति देश की सीमाओं को भी पार कर गई। आवारा का आवारा हूं या गर्दिश में हूं आसमान का तारा हूं और श्री 420 का मेरा जूता है जापानी, सोवियत संघ. चीन और पूर्वी यूरोपीय देशों के भी गीत बन गए।

सम्मान और पुरस्कार

शंकर और जयकिशन को चोरी चोरी (1956), अनाडी (1959), दिल अपना और प्रीत पराई (1960), प्रोफेसर (1963), सूरज (1966), ब्रह्मचारी (1966), मेरा नाम जोकर (1970), पहचान (1971) और बेईमान (1972) के लिए नौ बार सर्वश्रेष्ठ संगीतकार का फ़िल्मफेयर पुरस्कार मिला। अंतिम तीन पुरस्कार तो उन्हें लगातार तीन वर्ष तक मिले।

शंकर-जयकिशन की संगीतकार जोड़ी ने ही सुर साम्राज्ञी लता मंगेशकर से बेहतरीन गाने गवाए थे। लता मंगेशकर बडी विनम्रता से अपने कैरियर में मौलिक प्रतिभा की धनी इस संगीतकार जोडी के योगदान को स्वीकार करती हैं।

राजेंद्रनाथ व प्रेम चोपड़ा के साथ शंकर 

जब भी शंकर.जयकिशन का उनके सामने जिक्र होता है वह कहना नहीं भूलतीं- मेरा मानना है कि कोई भी शंकर-जयकिशन के संगीत की बराबरी नहीं कर सकता। उन्होंने शास्त्रीय, कैबरे, नृत्य, प्रेम तथा दुख और खुशी के नगमों के लिए स्वर रचनाएं की।

कुछ ही संगीतकार हैं, जो उनकी रेंज का मुकाबला कर सकते हैं। उनके संगीत ने कई फिल्मों को जिन्दगी दी। अन्यथा वे भुला दी जातीं।

तो ऐसी शानदार थी यह संगीतकार जोड़ी जिसने हिंदी फिल्मों को बेहतरीन संगीत से नवाजा।

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