फांसी से ठीक एक दिन पहले भगत सिंह ने क्या लिखा था अपने आखिरी खत में, पढ़िए

शहीद भगत सिंह - Sakshi Samachar

नई दिल्लीः 23 मार्च के ही दिन शहीद-ए-आजम भगत सिंह, राजगुरु और सुखदेव ने हंसते हंसते फांसी को गले लगा लिया था। जिस दिन उन्हें फांसी दी गई थी उस दिन वो मुस्कुरा रहे थे। मौत से पहले इन देशभक्तों ने गले लगकर भगवान से इसी देश में पैदा करने की गुजारिश की थी, ताकी इस मिट्टी की सेवा ये करते रहें। जिस दिन भगत सिंह और बाकी शहीदों को फांसी दी गई थी, उस दिन लाहौर जेल में बंद सभी कैदियों की आंखें नम हो गईं। यहां तक कि जेल के कर्मचारी और अधिकारी के भी हाथ कांप गए थे धरती के इस लाल के गले में फांसी का फंदा डालने में।

जेल के नियम के मुताबिक फांसी से पहले तीनों देश भक्तों को नहलाया गया था। फिर इन्हें नए कपड़े पहनाकर जल्लाद के सामने किया गया। जिसने इनका वजन लिया। मजे की बात ये कि फांसी की सजा के एलान के बाद भगत सिंह का वजन बढ़ गया था।

फांसी से एक दिन पहले लिखी भगत सिंह की आखिरी चिट्टी

साथियों स्वाभाविक है जीने की इच्छा मुझमें भी होनी चाहिए। मैं इसे छिपाना नहीं चाहता हूं, लेकिन मैं एक शर्त पर जिंदा रह सकता हूं कि कैद होकर या पाबंद होकर न रहूं। मेरा नाम हिन्दुस्तानी क्रांति का प्रतीक बन चुका है। क्रांतिकारी दलों के आदर्शों ने मुझे बहुत ऊंचा उठा दिया है, इतना ऊंचा कि जीवित रहने की स्थिति में मैं इससे ऊंचा नहीं हो सकता था। मेरे हंसते-हंसते फांसी पर चढ़ने की सूरत में देश की माताएं अपने बच्चों के भगत सिंह की उम्मीद करेंगी। इससे आजादी के लिए कुर्बानी देने वालों की तादाद इतनी बढ़ जाएगी कि क्रांति को रोकना नामुमकिन हो जाएगा। आजकल मुझे खुद पर बहुत गर्व है। अब तो बड़ी बेताबी से अंतिम परीक्षा का इंतजार है। कामना है कि यह और नजदीक हो जाए’।

कहते हैं फांसी से पहले भगत सिंह ने बुलंद आवाज में देश के नाम एक संदेश भी दिया था। उन्होंने इंकलाब जिंदाबाद का नारा लगाते हुए कहा, मैं ये मानकर चल रहा हूं कि आप वास्तव में ऐसा ही चाहते हैं। अब आप सिर्फ अपने बारे में सोचना बंद करें, व्यक्तिगत आराम के सपने को छोड़ दें, हमें इंच-इंच आगे बढ़ना होगा। इसके लिए साहस, दृढ़ता और मजबूत संकल्प चाहिए। कोई भी मुश्किल आपको रास्ते से डिगाए नहीं। किसी विश्वासघात से दिल न टूटे। पीड़ा और बलिदान से गुजरकर आपको विजय प्राप्त होगी। ये व्यक्तिगत जीत क्रांति की बहुमूल्य संपदा बनेंगी।

फांसी दिए जाने से पहले भगत सिंह, राजगुरु और सुखदेव से उनकी आखिरी ख्वाहिश पूछी गई। तीनों ने एक स्वर में कहा कि हम आपस में गले मिलना चाहते हैं। इजाजत मिलते ही ये आपस में लिपट गए।

पहले जल्लाद ने तो इन शहीदों को फांसी देने से ही इनकार कर दिया था। इसके बाद दूसरे जल्लाद को बुलाया गया। फांसी देते वक्त उसका हाथ भी कांप रहा था। फांसी के बाद जेल का वॉर्डन बैरक की तरफ भागा और फूट फूटकर रोने लगा। बाद में वॉर्डन ने स्वीकार किया कि उसके तीस सालों के करियर में फांसी के वक्त ऐसा उल्लास उसने कभी नहीं देखा था।

कहते हैं भगत सिंह 23 मार्च 1931 की उस शाम के लिए लंबे बेसब्र हो रहे थे। देश के लिए ऐसा समर्पण बिरले ही देखने को मिलता है।

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