संक्रांति त्यौहार आंध्र प्रदेश और तेलंगाना के लोगों का बहुत बड़ा उत्सव है। संक्रांति मेल-मिलाप का उत्सव भी कहा जाता है। शहरीकरण के कारण गांवों के अधिक लोग शहरों में जा बसे हैं। ऐसे में यह उत्सव लोगों को एक साथ रहने का मौका देता है। इतना ही नहीं, हमारे पूर्वजों ने लगभग सभी त्यौहारों को मेल-मिलाप के लिए बनाया है। संक्रांति त्यौहार की विधि-विधान अलग-अलग राज्यों में अलग-अलग हैं।

जो लोग शहरों में बसे हैं या रोजगार और काम की तलाश में गांव छोड़कर बाहर चले गये हैं, वो लोग संक्रांति के दिन गांव में आना/जाना पसंद करते हैं, क्योंकि इन दिनों में यहां के स्कूल और कॉलजों को लंबी छुट्टियां दी जाती है। अन्य कार्यालय भी बंद रह रहने से सभी लोग इस त्यौहार पर अपने-अपने गांव जाते हैं। इस तरह परिवार के सभी लोग एक जगह मिलते हैं। यह कहना उचित होगा कि इसी मिलन को संक्रांति हैं।

संक्रांति उत्सव के दौरान कलाकारों के साथ अभिनेता राजेंद्र प्रसाद
संक्रांति उत्सव के दौरान कलाकारों के साथ अभिनेता राजेंद्र प्रसाद

पूर्वजों की नजर में संक्रांति

हमारे पूर्वजों ने हमें एक संदेश दिया है। संदेश यह है कि पशु, पक्षी और मनुष्य एक ही परिवार के सदस्य हैं। इस बात का अहसास हमें संक्रांति त्यौहार से होता है। दक्षिण भारत में इसे अनेक रूपों में मनाया जाता है। उत्तर भारत में लोहड़ी और खिचड़ी भी कहा जाता है। तेलंगाना और आंध्रप्रदेश में संक्रांति कहा जाता है। तमिलनाडु में पोंगल कहा जाता है। इस तरह अनेक प्रांतों में इस त्यौहार को अनेक नामों से जाना जाता है।

गंगिरेद्दु को नचाता हुआ मालिक
गंगिरेद्दु को नचाता हुआ मालिक

संक्राति का अर्थ है-नजदीक आना/होना । इसके साथ ही साथ सूरज एक राशि से दूसरे राशि में प्रवेश करने की प्रक्रिया को संक्राति भी कहा जाता है।

पतंगबाजी करते लोग
पतंगबाजी करते लोग

पतंगबाजी का भी त्यौहार

संक्रांति पर हैदराबाद में पतंगबाजी बड़े पैमाने पर होती है। पतंगबाजी उत्सव में नेता, छोटे, बड़े, महिला, छात्र और विदेशी लोग भी भाग लेते हैं। नगर में पतंगों का लाखों का कारोबार होता है। कहा जाता है कि पतंग उड़ाने वालों की आंखें साफ-साफ दिखाई देती हैं।

भोगी का त्यौहार मनाती महिलाएं
भोगी का त्यौहार मनाती महिलाएं

भोगी का महत्व

तेलंगाना और आंध्रप्रदेश में संक्राति को दक्षिण भारत में तीन दिन तक मनाया जाता है। भोगी इनमें से पहला त्यौहार है। भोगी धनुर्मास का समापन दिन होता है। इस बारे में यह कहावत प्रचलित है कि धनुर्मास व्रत रखने वाली भूदेवी के अंश में जन्मी गोदादेवी श्रीरंगनाथ की पत्नी के रूप में अवतार लेती हैं। इसी अवतार को भोगी कहते है।

दरिद्रता की पहचान

पूराने सामान, झाड़ू, लकड़ियां व टूटे-फूटे चीजें दरिद्रता के प्रतीक माने गये हैं। इन बेकार चीजों को जलाने से जो रोशनी हमें दिखाई देती है। उस रोशनी से हमें नया रास्ता दिखाई देता है। इस आग की लपटों को ही भोगी कहा जाता है।

गंगिरेद्दुलु की पूजा करते हुए वेंकय्या नायडू और परिवार के सदस्य
गंगिरेद्दुलु की पूजा करते हुए वेंकय्या नायडू और परिवार के सदस्य

गंगिरेद्दुलु (बैल)

संक्रांति के दौरान गंगिरेद्दुलु (बैल) का काफी महत्व हैं। गंगिरेद्दुलु विशेष प्रशिक्षण प्राप्त होते हैं। मालिक के कहने पर गंगिरेद्दुलु नमन करता है। बैठता है। घुटने टेकता है। गंगिरेद्दुलु के ये हरकतों को छोटे बड़े सभी उत्सकता के साथ देखते हैं। कहा जाता है कि गैंगिरेद्दुलु और उसके मालिक को भगवान का रूप माना जाता है। जिसके भी मकान के सामने गंगिरेद्दुलु आता है तो सभी लोग गंगिरेद्दुलु और उसके मालिक के पैर पड़ते है। बड़ पैमाने पर दान धर्म करते हैं।

मालिक पर पैर रखकर खड़ा गैंगिरेद्दु
मालिक पर पैर रखकर खड़ा गैंगिरेद्दु

इसके अगले दिन से आरंभ होने वाले त्यौहार को सभी लोग खुशियों से मनाते हैं। भोगी से निकलने वाली आग को संक्रांति कहते है। भोगी की रोशनी से हमें नया रास्ता दिखाई देता है। यही रोशनी हमें जीवन जीने की नई प्रेरणा देती है। इसके बल पर हम आगे बढ़ते जाते हैं। इसके अलावा किसानों की उगाई गयी नई फसलें हमारे हाथ में आने के नये दिन को भी भोगी कहते है।

संक्रांति के दौरान पारंपारिक नृत्य करती हुई महिलाएं
संक्रांति के दौरान पारंपारिक नृत्य करती हुई महिलाएं

फसल और पशु पक्षी

किसान अपनी फसल की कटाई करके घर और आंगम में लाकर रखते हैं। तब पशु-पक्षी नाचते-गूंजते आंगन में आते है और किलकिलाहट करते हुए फसल के दाने चुंगते हैं। इस समय आने वाली पशु पक्षियों की ध्वनि से पूरे गांव का वातावरण संगीतमय हो जाता है। कुल मिलाकर हर वर्ग की दरिद्रता को दूर होकर उनके जीवन में खुशियां से भर देने वाला त्यौहार ही भोगी यानी संक्रांति है। भोगी मकर संक्रांति त्यौहार के पहले दिन का संक्षिप्त सारांश है।

इस त्यौहार के प्रसिद्ध व्यंजन

तेलंगाना और आंध्र प्रदेश में अनेक प्रसिद्ध व्यंजन बनाये जाते हैं। इनमें प्रसिद्ध तिल की चपाती/रोटी है। इसे गुड़, तिल, गेहु के आटे से बनाया जाता है। यह एक प्रकार की आयुर्वेदिक दवा है। तिल और गुड़ स्वास्थ्य के लिए लाभदायक होते हैं।

इसी तरह आंध्र प्रदेश पूतरेकुलू प्रसिद्ध है। इसे चावल, दूध, गुड़ और शक्कर से बनाया जाता है। यह भी एक प्रकार की आयुर्वेदिक दवा है। यह भी स्वास्थ्य के लिए लाभदायक है।संक्राति त्यौहार से स्पष्ट होता है और संदेश मिलता है कि प्रकृति के साथ सभी को मिलजुलकर जीवन यापन करना चाहिए।

मकर संक्रान्ति पर के. राजन्ना की कलम से....