आंध्रप्रदेश की राजनीति में इन दिनों काफी हलचल दिख रही है। जहां एकतरफ विधानसभा का विशेष सत्र चल रहा है वहीं तीन राजधानियों के समर्थन में भी कई रैलियां आयोजित की जा रही है।

मुख्यमंत्री वाईएस जगन मोहन रेड्डी ने कई कल्याणकारी योजनाओं का शुभारंभ किया है साथ ही वे लगातार राज्य के विकास के लिए काम भी कर रहे हैं। पर हो यह रहा है कि उन्हें विपक्ष के विरोध का सामना भी जब-तब करना ही पड़ रहा है। जहां विधानसभा में वाईएसआरसीपी बहुमत में है, वहीं दूसरी ओर विधान परिषद में वह अल्पमत में है। इसी वजह से कोई भी विधेयक वहां पास नहीं हो पा रहा। वहां तेलुगु देशम पार्टी के लोग जानबूझकर सरकार के कामकाज में अडंगा डाल रहे हैं।

क्या है विधान परिषद का गणित

विधान परिषद में सदस्यों की कुल संख्या 58 है। इसमें तेलुगु देशम के 28, वाईएसआरसीपी के 9, भाजपा के 2, प्रोग्रेसिव डेमोक्रेटिक फ्रंट के 5, निर्दलीय 3, नॉमिनेटेड 8 सदस्य हैं, जबकि 3 सीटें खाली है।

इसी के मद्देनजर मुख्यमंत्री जगन मोहन रेड्डी आंध्र प्रदेश विधान परिषद को बर्खास्त करने की दिशा में पहल कर रहे हैं। सूत्रों के मुताबिक सीएम ने विधि विभाग को इससे जुड़ा ड्राफ्ट तैयार करने को कह दिया है और विधि विभाग ने ड्राफ्ट तैयार भी करवा रहा है।

जगन सरकार ने ये फैसला इसलिए लिया है कि विधान परिषद में तेदेपा सदस्यों की संख्या अधिक है और वह जगन सरकार का हर बिल पारित करने में रोड़ा बन रही है।

हाल ही में सरकारी स्कूलों में इंग्लिश माध्यम शुरू करने से जुड़े बिल को विधान परिषद में तेदेपा ने रिजेक्ट कर दिया था। ऐसे में जगन सरकार का मानना है कि वह जो भी बिल विधान परिषद में लेकर आएंगे तेदेपा उसका जरूर विरोध करेगी।

इसी को देखते हुए विधि विभाग से विधान परिषद को रद्द करने के लिये आवश्यक ड्राफ्ट तैयार करने को कहा है और विधि विभाग ने ड्राफ्ट तैयार भी करवाने लगा है।

इस बात की पूरी संभावना है कि इस सत्र में अगर बात नहीं बनी तो विधान परिषद को खत्म करने की पहल की जा सकती है। वैसे ऐसा कोई पहली बार नहीं हो रहा है बल्कि ऐसा पहले हो चुका है। एकीकृत आंध्रप्रदेश में जब एनटीआर मुख्यमंत्री थे, 31 मई 1985 को विधान परिषद को उनके द्वारा बर्खास्त कर दिया गया था।

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गौरतलब है कि विधान परिषद में तेदेपा के पास 28 सदस्य है और निकट भविष्य में इनकी संख्या तभी कम हो सकती है जब इनके कुछ सदस्य यो तो इस्तीफा दे दें या फिर पाला बदलकर सरकार का समर्थन करने लगें। ऐसे ही हालात को देखते हुए जगन सरकार ने ये फैसला किया है कि अगर सरकार के कामकाज में ये विधायक हमेशा आड़े आते रहे तो सरकार के पास इसके अलावा कोई और चारा नहीं बचेगा।