जानिए क्या है ‘वाल्मीकि’ शब्द का अर्थ, साधना से जुड़ा है इसका रहस्य 

महर्षि वाल्मीकि (डिजाइन फोटो) - Sakshi Samachar

वाल्मीकि जयंती 13 अक्टूबर को है। हर साल अश्विन महीने की शरद पूर्णिमा को महर्षि वाल्मीकि की जयंती (वाल्मीकि जयंती) मनाई जाती है। वाल्मीकि वैदिक काल के प्रसिद्ध रामायण महाकाव्य के रचयिता के रूप में विश्व में विख्यात हैं। महर्षि वाल्मीकि के जन्म के बारे में तो ज्यादातर सही जानकारी नहीं है। मगर पौराणिक कथाओं के मुताबिक, महर्षि वाल्मीकि का जन्म महर्षि कश्यप और अदिति के नौवें पुत्र वरूण और उनकी पत्नी चर्षणी के घर में हुआ था।

महर्षि वाल्मीकि जयंती को आंध्र प्रदेश सरकार ने राजकीय त्यौहार के रूप में मनाने का फैसला लिया है। सरकार ने 13 अक्टूबर को महर्षि वाल्मीकि जयंती को भव्य रूप से मनाने का सोमवार को आदेश दिया है।

वाल्मीकि जयंती के लिए वाईएस जगन मोहन रेड्डी की सरकार ने 25 लाख रुपये भी जारी किया है। इसके चलते अधिकारी वाल्मीकि जयंती को प्रदेश त्यौहार के रूप में अनंतपुर जिले में मनाया जाएगा।

वाल्मीकि जयंती के आयोजन के लिए अनंतपुर जिले को 6 लाख रुपये जारी किये गये है। जबकि अन्य 12 जिलों को एक-एक लाख रुपये जारी किये गये हैं। सरकार ने आदेश में कहा गया है कि हर साल प्रदेश में अश्वयुज पूर्णिमा के दिन वाल्मीकि जयंती को प्रदेश त्यौहार के रूप में मनाया जाए।

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यह भी कहा जाता है कि वाल्मीकि के भाई भृगु थे। महर्षि का नाम वाल्मीकि उनके कठोर तप के कारण पड़ा था। कहा जाता है कि महर्षि वाल्मीकि जब ध्यान में मग्न थे तब उनके शरीर को दीमकों ने घेर लिया था। जब उनकी साधना पूरी हुई तो वह दीमकों के घर से बाहर निकले थे। दीमकों के घर को वाल्मीकि कहा जाता है। इसलिए इनका नाम महर्षि वाल्मीकि पड़ गया।

डाकू कैसे बने वाल्मीकि

कहा जाता है कि वाल्मीकि एक डाकू थे। इनका पालन-पोषण भील जाति में हुआ। पुराणों के मुताबिक, बचपन में एक भीलनी ने वाल्मीकि को चुरा लिया था। जिसके कारण उनका लालन-पालन एक भील समाज में हुआ। इसके बाद में वाल्मीकि डाकू बन गए। लोगों को मारकर पैसे कमाने लगे। मगर ऐसा करना उन्हें अच्छा नहीं लगता था।

ऐसी मिली रामायण लिखने की प्रेरणा

वाल्मीकि को रत्नाकर के नाम से भी जाना जाता है। रत्नाकर को जब अपने पापों का आभास हुआ तो उन्होंने डाकू पथ को त्याग कर नया पथ अपनाने का फैसला लिया। रत्नाकर को नए पथ के बारे में कोई जानकारी नहीं थी। कहा जाता है कि उन्होंने नारद जी से इस पथ के बारे में सलाह ली थी तो उन्होंने राम नाम जपने के लिए कहा था।

वाल्मीकि ने ऐसी की कठोर साधना

ऐसी मान्यता है कि रत्नाकर ने लंबे वक्त कर राम नाम का जप किया। हालांकि कुछ समय के बाद 'राम' शब्द 'मरा' हो गया। 'मरा' शब्द को कई सालों तक जपने के कारण वाल्मीकि का शरीर दुबला हो गया। उनके शरीपर पर चीटियां भी लग गईं। मगर अपनी कठोर साधना से वाल्मीकि ने ब्रह्मा को प्रसन्न किया। जिसके परिणाम स्वरूप ब्रह्मा ने उन्हें ज्ञान दिया और रामायण लिखने का सामर्थ्य दिया। इसके चलते महर्षि वाल्मीकि ने रामायण लिखा।

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