हैदराबाद: तेलंगाना राष्ट्र समिति के कार्यकारी अध्यक्ष केटी रामा राव ने सोमवार को आरोप लगाया था कि फेक ट्विटर हैंडर के जरिए तेरास के खिलाफ दुष्प्रचार किया जा रहा है। केटीआर के मुताबिक इस तरह के प्रयासों में तेदेपा की बड़ी भूमिका है। जिसमें कथित तौर पर खुद आंध्र प्रदेश के मुख्यमंत्री नारा चंद्रबाबू नायडू की सहमति है।

टीडीपी और चंद्रबाबू नायडू की कथित तौर पर डाटा चोरी मामले में संलिप्तता पर कई खुलासे हो रहे हैं। आरोपों के मुताबिक डाटा चोरी मामले में तेदेपा बचाव के लिए फेक ट्विटर हैंडलर्स का इस्तेमाल कर रही है। इसका सुबूत देते हुए केटीआर ने कहा कि देश के उन हिस्सों से भी लोग इस मामले में दिलचस्पी ले रहे हैं जिनका रुझान आश्चर्य पैदा करता है। यहां तक कि बिहार और बाकी कई उत्तर भारतीय राज्यों से लगातार डाटा चोरी मामले पर चंद्रबाबू का बचाव करने वाले सोशल मीडिया मैसेजेज आ रहे हैं।

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केटीआर ने चंद्रबाबू को चेतावनी देते हुए कहा कि सोशल मीडिया पर भाड़े के हैंडलर्स से लोगों को प्रभावित नहीं करें। मामले में तेलंगाना पुलिस सख्ती से जांच कर रही है। जिसमें शुरुआती जांच में ही मुख्यमंत्री चंद्रबाबू का सीधा हाथ जान पड़ता है। केटीआर के मुताबिक वास्तव में सोशल मीडिया पर ये खरीदे हुए ट्विटर हैंडल्स हैं जिनका इस्तेमाल लोगों को बरगलाने के लिए किया जाता है।

सोशल मीडिया पर सभी विषय जो ट्रेंड कर रहे हैं वास्तव में सही हों, कहा नहीं जा सकता। ऐसा ही एक हैश टैग #TSGovtStealsData ट्रेंड कर रहा है। जो कथित तौर पर पेड प्रमोशन माना जा रहा है। दरअसल इस तरह के राजनीतिक दुष्प्रचार के लिए हैंडलर्स को बकायदा पेमेंट होती है। जिन लोगों का तेलुगू राज्यों की राजनीति से कोई वास्ता नहीं है वो भी तेरास के बारे में टीका टिप्पणी में जुटे हुए हैं।

वास्तव में प्रोपेगेंडा क्लिप्स, संदेश और हैशटैग अब व्यवसाय का रूप ले चुका है। जिसमें कई ब्लॉगर्स और ग्रुप्स संलिप्त हैं, जो लोगों को गलत दिशा में प्रभावित करते हैं और झूठी खबरें प्रचारित करते हैं।

राजनीतिक गर्मागर्मी के माहौल में इन पेड हैंडलर्स की चांदी होती है। ये किसी खास पक्ष या नेता के लिए पैसे लेकर काम करते हैं। सोशल मीडिया जानकारों की मानें तो सोशल मीडिया पेड हैंडिल्स वास्तव में पैसा कमाने का जरिया है। खासकर जब किसी राजनीतिक पार्टी को अपने पक्ष में माहौल बनाने की दरकार होती है तो वे इन हैंडलर्स का इस्तेमाल करते हैं। इन हैंडलर्स में ज्यादातर कॉलेज के छात्रों का ग्रुप होता है। राजनीतिक पार्टियां बकायदा स्थापित कंपनियों के जरिए इन फेक हैंडलर्स से संपर्क करती है।

10 से 50 हजार रुपए मिलते हैं फेक हैंडलर्स को

आपको जानकर हैरानी होगी कि राजनीतिक संदेशों को प्रचारित करने वाले हैंडलर्स ज्यादातर फेक होते हैं। डिजिटल मार्केटिंग के जानकार मानते हैं कि राजनीतिक पार्टियों के लिए प्रचार करने वाले ज्यादातर सोशल मीडिया हैंडलर उत्तर भारत खासकर बिहार, यूपी और राजस्थान से आते हैं। हालांकि इस दावे पर कोई पुख्ता प्रमाण नहीं है।

मौजूदा राजनीतिक माहौल में युवा सोशल मीडिया से कमाई भी कर रहे हैं। हालांकि इसे जायज नहीं ठहराया जा सकता है। चंद रुपयों की खातिर लोगों को प्रभावित करना सही नहीं है। फिलहाल दरकार इस बात की है कि उन कंपनियों का पता लगाया जाय जो डिजिटल मार्केटिंग की आड़ में गोरखधंधे में लिप्त हैं। आईटी एक्ट में इन कंपनियों के खिलाफ कार्रवाई के पुख्ता प्रावधान हैं। बस प्रशासनिक इच्छाशक्ति हो तो पुलिस इन पर तत्काल पाबंदी लगा सकती है।