कई बार बस स्टैण्ड, रेलवे स्टेशन, नुमाईश या फिर बाजार बाजार में खुले में लोग मूत्र त्याग करते हैं। जिसकी बदबू से राह चलते लोगों को खासी परेशानी होती है। लेकिन इसका हल है यूरोट्रोटर। शायद आप समझ नही पाएं हों की यूरोट्रोटर बदबू से कैसे निजात दिलाता है।

हम आपको इस तकनीक के बारे में यहां विस्तार से बताते हैं, दरअसल मूत्र की बदबू से छूटकारा दिलाने के लिए पेरिस में विशेष कुंडियाँ बनायी जा रही है। इन कुंडियों को लारेंट लीबाट कंपनी तैयार कर रही है। ये कुंडियाँ ना खर्चीले होते हैं, और ना ही हाईटेक मॉडल के होते हैं। यानी सस्ता और कामयाब।

टॉयलेट
टॉयलेट

यूरोट्रोट्टर में सिर्फ दो डिब्बे का उपयोग किया जाता है। पहले डिब्बे में उपजाऊ खाद और कुछ फूलों के पौेधे होते हैं। नीचे के एक डिब्बे में सूखा घास मात्र होता है। विसर्जित मूत्र को सूखा घास अपने अंदर समा लेता है। कुछ दिनों बाद इस गीले घास को दूर ले जाकर मिट्टी के साथ सड़ा दिया जाता है। जिससे खाद बनता है। इस खाद को बाद में ऊपर के डिब्बे में डाला जाता है। इसे 'यूरीट्रोट्टर' कहा जाता है। इस तकनीक को आप नीचे दिए चित्र से समझ सकते हैं।

यूरीट्रोट्टर का नमूना
यूरीट्रोट्टर का नमूना

कंपनी ने दो तरह के डिब्बे तैयार किए हैं। एक लगभग 300 बार उपयोग में आने वाला डिब्बा है। दूसरा 600 बार उपयोग में आने वाला डिब्बा है। एक और मजे की बात। जैसे ही घास पूरी तरह से गीला हो जाता है तो उसके अंदर रखा हुआ एक सेंसर 'मुझे तुरंत खाली करो' का संकेत (अलार्म) पेरिस कॉर्पोरेशन के कर्मचारियों को भेज देता है। इस समय पेरिस में दो यरीट्रोट्टरों को प्रयोग के तौर पर इस्तेमाल किया जा रहा है। यदि इसके अच्छे परिणाम मिलते है तो पूरे नगर में यूरीट्रोट्टर स्थापित किये जाने पर विचार किया जा रहा है।

-साक्षी नॉलेज सेंटर