हैदराबाद : एक ऐसी सोच जिससे एक व्यापार की शुरूआत हुई। इसमें आई मुश्किलें दो और व्यापारों के सृजन का कारण बनीं। यही सोच संस्था को 1,300 करोड़ के टर्नओवर तक पहुंचाया और 4,800 लोगों के रोजगार की वजह बनी।

अब वही सोच 'ओमिक्स इंटरनेशनल' के रूप में उभरी है। वैज्ञानिक व तकनीकी पत्रों को ऑनलाइन प्रकाशित करने वाली इस संस्था का मुख्य केंद्र हैदराबाद है और इसके मुखिया डॉक्टर गेदेला श्रीनूबाबू फ्रम श्रीकाकुलम हैं। चाहे पीएचडी करनी हो या फिर शोध पत्र लिखना दोनों काम आसान नहीं है। इसके लिए काफी पढ़ाई करके जानकारी हासिल करनी होती है। तो फिर ऐसे में पढ़ने के लिए सामग्री कहां मिलेगी?

बस यही एक सोच ओमिक्स इंटरनेशनल की नींव का कारण बनी। श्रीकाकुलम जिले से तालुक रखने वाले श्रीनूबाबू ने वर्ष 2008 में सियोल में जब उन्हें यंग साइंटिस्ट(युवा वैज्ञानिक) अवार्ड भेंट किया गया, तब ह्यूमन प्रोटियम ऑर्गनाइजेशन(ह्यूपो) के सम्मेलन में इस बात का जिक्र किया था। वे श्रीनूबाबू की बात को समझ गए और प्रकाशित सामग्री सभी के लिए उपलब्ध कराने के लिए दी गई अनुमती ओपन एक्सेस जर्नल की स्थापना का कारण बनी।

इस जर्नल में शोध पत्रों के प्रकाशन के लिए WHO, NIH जैसे अंतर्राष्ट्रीय संस्थानों को अनिवार्य बना दिये जाने से श्रीनूबाबू को फीस स्वरूप थोड़ी बहुत आय मिलनी शुरू हो गई। इसी दौरान ओपन एक्सिेस के साथ साथ प्रोटिन्स के विषय पर प्रोटियम जर्नल लाया गया। स्टैनफोर्ड में पढ़ाई के दौरान मिले पूर्व विद्यार्थियों की सहायता से विभिन्न विषयों पर वैज्ञानिक जर्नल्स ऑनलाइन पर प्रकाशित करना शुरू किया। सभी के इस वेबसाइट का सहारा लेने से रैंकिंग के साथ पब्लिश करने वाले भी बढ़ गए। इस तरह... ओमिक्स इंटरनेशनल की वृद्धि शुरू हुई। इसी क्षेत्र से जुड़ी पल्सस भी ओमिक्स इंटरनेशनल के साथ जुड़ गई।

वर्तमान में पल्सस के सीईओ भी श्रीनूबाबू ही हैं। श्रीनूबाबू ने साक्षी बिजनेस ब्यूरो के प्रतिनिधि से बातचीत में कहा कि वर्तमान में ऑनलाइन पर ओमिक्स जर्नल्स के करीब पांच करोड़ पाठक हैं। हालांकि प्रति वर्ष विभिन्न क्षेत्रों में प्रमुखों को इस जर्नल्स की समीक्षा करनी चाहिए। इसके लिए एडिटोरियल बोर्ड की बैठक भी होनी चाहिए। इसके लिये विभिन्न देशों के विशेषज्ञों को एक मंच पर लेकर आना बहुत ही मुश्किलभरा काम था। उनके हवाई सफर का खर्चा, होटल आदि सुविधाओं की वजह से आर्थिक बोझ बढ़ जाता था।

साल में 3000 सम्मेलन होते हैं

काफी सोच-विचार के बाद श्रीनूबाबू ने विदेशी प्रमुख जहां पहुंचते हैं वहीं पर उनसे संबंधित क्षेत्रों पर सम्मेलनों का आयोजन करना शुरू किया। इसके लिए निर्धारित फीस का भुगतान कर उपस्थित होने में यूजर्स काफी रुचि दिखाते थे। इससे सम्मेलनों का आयोजन एक नया व्यापार बन गया। वर्ष 2010 में पहला सम्मेलन का आयोजन किया गया। बाद में सीएमई, सीपीडी एक्रीडेशनों के आज जाने से ओमिक्स इंटरनेशनल अब प्रति वर्ष 3000 से अधिक सम्मेलनों का आयोजन कर रही है। अपनी विदेशी आय में इन सम्मेलनों का हिस्सा ही ज्यादा है और इसमें मार्जिन करीब 10 से 15 फीसदी होती है।

उन्होंने कहा, हमारे जिले में गुर्दा पीड़ितों की संख्या अधिक रहने वाले उद्दानम क्षेत्र में उन्हें बरती जाने वाली सावधानियों के बारे में तेलुगु भाषा में करपत्र वितरित करने तक वे कुछ समझ नहीं पा रहे हैं। यहां की स्थिति देखने के बाद मुझे लगा कि शोध पत्रों का विभिन्न भाषाओं में अनुवाद करवाने की जरूरत है। रूसी, चीनी, जर्मनी में शोध पत्रों के अनुवाद का काम शुरू किया गया। इससे आय बढ़ गई। देश में तेलुगु, तमिल और हिन्दी में अनुवाद के लिये प्रयास जारी हैं।

हिन्दी के लिए उत्तर प्रदेश सरकार के साथ एक करार हुआ है। केंद्र भी इसके लिए स्वीकृति देकर विशाखपट्टणम में बनाए जा रहे केंद्र के लिये 20 करोड़ रुपये की प्रोत्साहन राशि दी है। हमारे पास कृषि, स्वास्थ्य, साइंस एंड टेक्नालोजी से संबंधित करीब 2.5 करोड़ पन्नों पर जानकारी उपलब्ध है। इनके अनुवाद से करीब 10 हजार लोगों को नौकरी मिलेगी।

तीन सालों में आईपीओ का विचार

वर्तमान में ओमिक्स में 4,800 लोग काम कर रहे हैं। हैदराबाद के नानकरामगुड़ा सेज में स्थापित कार्यालय में 3,700 लोग कार्यरत हैं, जबकि चेन्नई में 400, गुरुग्राम में 300 लोग काम कर रहे हैं। विशाखपट्टणम में 25 हजार वर्ग फुट जमीन पर बनाए जा रहे कार्यालय में 1,000 लोगों को नौकरियां दी जाएंगी। उन्होंने बताया कि विदेश में सालाना 900 करोड़ और देश में 400 करोड़ रुपये का टर्नओवर दर्ज कर रहे हैं। तील साल बाद 2021 में आईपीओ के लिए जाने का विचार है और तब तक हमारे पास काम करने वालों की संख्या 10,000 पार कर जाएगी।

श्रीनूबाबू फ्रम श्रीकाकुलम...

श्रीनूबाबू की कहानी किसी आश्चर्य से कम नहीं है। श्रीकाकुलम जिले के बूर्ज मंडल में गरीब व मध्यम वर्ग के परिवार में जन्म लेकर वहीं पर हाईस्कूल की पढ़ाई पूरी की। इंटर की पढ़ाई पालकोंडा में पूरी की। टॉपर के रूप में आंध्रा विश्वविद्यालय में बी-फार्मा में प्रवेश लिया। वहीं पर एमटेक बायोटेक्नालोजी करने के बाद 'अप्लीकेशन्स ऑफ मेथमेटिकल मॉडल्स टू डिटेक्ट

डयाबेटिक एर्ली' विषय पर पीएचडी की। अर्थात प्रोटिन्स के विश्लेषण से मधुमेह के खतरे को पहले से जाना होता है। इसके लिए सियोल स्थित ह्यूमन प्रोटियम ऑर्गनाइजेशन ने उन्हें 'यंग साइंटिस्ट' अवार्ड भेंट किया। वही मेथमेटिकल मॉडल्स

को लागू करते हुए प्रोस्टेट कैंसर पर शोध के लिये उन्हें स्टैनफोर्ड से बुलावा आया। इस शोध हेतु जरूरी सामग्री के लिए अकसर हैदराबाद स्थित सीसीएमबी, आईआईसीटी कार्यालय के चक्कर काटा करते था और यही कष्ट मुझे ओपेन एक्सेस जर्नल और ओमिक्स इंटरनेशनल की नींव का कारण बना।