09.07.2018, सोमवार

रायवरम, पूर्वी गोदावरी जिला

चारों तरफ हरीयाली और प्राकृतिक सौंदर्य से भरपुर पसलपूड़ी क्षेत्र फिल्मों की शूटिंग के लिए काफी मशहूर है। पेद्दाजीयर और चिन्नाजीयर स्वामियों के पैतृक गांव वाला निर्वाचन क्षेत्र है मंडपेट। इस निर्वाचन क्षेत्र का नाम सुनते ही तापेश्वर काजा की याद आती है। पूरे राज्य में अत्यधिक चावल की मिलें रहने वाले इस निर्वाचन क्षेत्र में दूसरे दिन की पदयात्रा चली।

अमलापुरम निर्वाचन क्षेत्र के डी. पोलवरम से कोल्लु प्रसाद राव नामक भाई आकर मुझसे मिला। उसका पिता सत्यनारायण एक पट्टा किसान था। काफी मेहनत के बाद भी खेती में नुकसान होने की वजह से सत्यनारायण कर्ज में डूब गया। कर्ज नहीं चुका पाने और अपमान नहीं सह पाने के कारण उसने फरवरी 2016 में अपने ही खेत में आत्महत्या कर ली।

महीनों बीत जाने के बाद भी सरकार की तरफ से किसी तरह की आर्थिक सहायता नहीं मिलने से परेशान प्रसाद राव मेरे पास आकर अपना दुखड़ा सुनाया था। उस वक्त मैंने जब पत्र लिखकर सरकार पर दबाव बनाया तो इसको लेकर अधिकारियों ने पहल शुरू कर दी और अंतत: उस परिवार को वित्तीय सहायता मिली। इसी बात को याद करते हुए मुझे धन्यवाद प्रकट करने पहुंचे प्रसाद राव को देख मेरे मन में किसानों की बदहाली फिर से याद आई। पिताजी जब भी इस जिले का हवाई दौरा करते थे, तब यहां के कोनसीमा क्षेत्र की खूबसूरती देखते हुए कहा करते थे कि राज्य का हर क्षेत्र इसी तरह हराबरा और प्राकृतिक सौंदर्य से भरा रहेगा तो अच्छा होता।

पिताजी अकसर इसी बात का जिक्र किया करते थे। उनके बाद कोनसीमा में फसलों की पैदावर किए बिना क्रॉप हॉलिडे घोषित करने की स्थिति पैदा हो गई। बाबू के शासन में किसी प्रकार के संसाधन नहीं रहने वाले उत्तरांध्र और रायलसीमा जैसे सूखाग्रस्त क्षेत्रों के साथ बाकी सभी जिलों में अन्नदाताओं की आत्महत्या की घटनाएं आम बन गई हैं। परंतु अत्यंत उपजाऊ जमीन और सिंचाई संसाधन वाले इस कोनसीमा में भी किसानों की आत्महत्याएं चिंता का विषय है। भ्रष्ट शासन और दलालों की चंगुल में जब तक अन्नदाता बंदी बनकर रहेगा तब तक संभवत: ये विषम परिस्थितियां नहीं बलदेंगी।

सोमेश्वरम पार होने के बाद धान की रोपाई कर रही महिला मजदूर आकर मुझसे मिलीं और बोली, 'दिनभर की कड़ी मेहनत के बाद भी उन्हें पेटभर भोजन नहीं मिलना मुश्किल है।' नागमणि नामक बहन ने कहा, 'अन्ना पहले तो काम नहीं मिलता और थोड़ी-बहुत जो मजदूरी मिलती है, उससे हमारी जरूरतें पूरी नहीं हो पाती। इससे पहले चार-पांच महीने मिलाकर जो बिजली का बिल आता था, उतना बिल अब एक महीने में आने लगा है। दिनों-दिन बढ़ते खर्च की वजह से बच्चों को कहां और कैसे पढ़ाए इसको लेकर हम परेशान हैं।

हम जैसी मजदूर की जिन्दगी हमारे बच्चों के लिए नहीं चाहिए उन्हें अच्छा पढ़ाने की काफी कोशिश कर रही हूं, लेकिन बढ़ती फीस की वजह से वह संभव नहीं हो पा रहा है। इंटर की पढ़ाई पूरी कर चुकी बेटी को पढ़ाई बीच में रोक देनी पड़ी। गंगारत्नमणी नामकी एक बहन ने कहा, 'इंजीनियरिंग कर रही बेटी की आगे की शिक्षा कैसे पूरा करवाए समझ नहीं पा रही हूं।' गरीबों को केजी से पीजी तक मुफ्त शिक्षा का सपना दिखा चुके चंद्रबाबू नायडू आखिर अब कमजोर तबकों की बहनों को क्या जवाब देंगे ?

सोमेश्वर की रहने वाली बत्तुला बुज्जी, कोंड्रपु शशिरेखा आदि बहनों ने कहा कि बाबू की सरकार आने के बाद से कई आवेदन सौंपे गए, लेकिन अभी तक उन्हें मकान नहीं दिए जा रहे हैं। उस सयम गरीब के खुद के मकान का सपना साकार करने के लिए पिताजी ने इंदिरम्मा योजना वर्ष 2006 में इसी निर्वाचन क्षेत्र के पडमराकंड्रिगा में शुरू की थी। इस नए राज्य के 13 जिलों में 24 लाख से अधिक गरीबों के खुद के मकान का सपना साकार हुआ है, तो वह केवल पिताजी की बदौलत।

मुख्यमंत्रीजी मेरा एक सवाल है... क्या आपको यह याद है कि आपने अपने चुनावी घोषणा पत्र में झोपड़पट्टी मुक्त राज्य बनाने, सभी योग्य लोगों को तीन सेंट जमीन के साथ मुफ्त में मकान बनाकर देने का आश्वासन दिया था ?

इन पिछले साढे चार सालों में प्रति वर्ष एक लाख मकान का निर्माण नहीं करवा पाए हैं। चुनाव से ठीक छह महीने पहले अब 19 लाख मकानों का निर्माण पूरा करने का आपका ऐलान क्या फिर से लोगों को धोखा देना नहीं है?

वाईएस जगन