08.07.2018, रविवार

माचवरम, पूर्वी गोदावरी जिला

मेरी हर बात, हर कथनी और हर सोच में प्रति दिन पिताजी ही मेरे प्रेरणास्रोत बनते हैं। लोगों के बीच बीते उनके सफर के हर कदम ने मेरे व्यक्तित्व को प्रभावित किया है। पिताजी के मूल्यों के रास्ते विश्वसनीयता को साक्ष्य बनाकर चलूंगा यही बात दिल में सोचते और पिता को याद करते हुए उनकी जयंती पर उन्हें श्रद्धांजलि अर्पित की।

सुबह शिविर से बाहर आते ही मुझसे मिली बहन ऊषा माधवी ने अपनी परेशानी सुनाई। सवर्ण वर्ग से जुड़े गुणसागर से प्रेम विवाह कर चुकी उस बहन ने एमए और बीएड की पढ़ाई की है, लेकिन अभी नौकरी नहीं मिली है। एससी बैकलॉग पदों में भी उसके साथ नाइंसाफी हुई। पति गुणसागर ऑटो चलाता है।

उस बहन के 13 साल के बेटा जन्म से ही हड्डियों से जुड़ी बीमारी से ग्रस्त है। जैसे-जैसे बड़ा होता गया, उसकी हड्डियां फटने के अलावा टेडे हो जाने से वह नहीं चल पा रहा है। कम आय की वजह से दो वक्त की रोटी मिलना भी मुशिकिल है, ऐसे में बेटे के इलाज पर हर महीने 5 से 6 हजार रुपये खर्च होने से उनकी जिन्दगी दिनों-दिन बोझ बनती जा रही है।

आरोग्यश्री की सेवाएं नहीं मिलने से उस बहन की मुश्किलें दोगुनी हो गई हैं। किसी तरह वह जिन्दगी से लड़ना भी चाहती है, लेकिन इसके लिए सरकार की तरफ से उसे किसी तरह की मदद नहीं मिल रही है। परिणामस्वरूप उसकी जिन्दगी मुश्किलभरी और दूभर बनती जा रही है। अत: उसे जीवन से ही घृणा होने लगी है। उस बहन की ये बातें मेरे दिल को छू गईं।

वर्ष 2004 से पहले तक गरीबों की स्थिति बहुत ही बदतर हुआ करती थी। आरोग्यश्री जैसी कोई योजना नहीं थी। मुख्यमंत्री राहत कोष रहकर भी नहीं जैसा ही था। गरीबों को अगर कोई बड़ी बीमारी होती तो उन्हें निजी अस्पतालों में लाखों रुपये खर्च करने पड़ते थे। पढ़ाई तक खरीदनी पड़ती थी। फीस रिअंबर्समेंट जैसी योजनाओं का दूर-दूर तक गुंजाइश नहीं था।

उस वक्त भी गरीब को कर्ज में डूबोने के अलावा स्वास्थ्य व शिक्षा के क्षेत्र की अनदेखी होने वाला शासन था और आज भी यहां उसी तरह का शासन, हालात और मानवीयता की कमी के कारण इस शासन में गरीबों की स्थिति और भी बददर बनते देख बड़ा दुख होने लगा है। पिताजी द्वारा शुरू की गई सभी कल्याणकारी योजनाएं बहाल कर उन्हें फिर से लागू करने के मेरे संकल्प को और बल मिलने लगा है और मैं अपने कदम आगे बढ़ा रहा हूं।

पसलपूड़ी गांव के सीमावर्ती क्षेत्र में पदयात्रा ने 2,500 किलो मीटर की दूरी तय कर ली। सरकारी कर्मचारी संघ के प्रतिनिधि मुझसे मिले और सीपीएस नीति रद्द करने की अपील की। उन्होंने कहा, 'सर टीडीपी सरकार द्व्दंव् रुख अपना रही है। तेलंगाना विधानसभा में तेलुगु देशम पार्टी सीपीएस को राज्य की परिधि में आने वाला मामला बताते हुए उसे रद्द कराने की जिद्द पर अड़ी है, वहीं आंध्र प्रदेश में पार्टी सत्ता में होने के बावजूद सीपीएस का जिक्र तक नहीं कर रही है।

टीडीपी दोहरी चाल चल रही है। पाठ्यपुस्तक विद्यार्थियों को अप्रैल के महीने में मिल जाने चाहिए थे, लेकिन अभी तक नहीं मिले हैं। ऐसे में बच्चे स्कूल कैसे जाएंगे और जाएंगे तो भी क्या पढ़ेंगे। यूनिफॉर्म का भी लगभग यही हाल है। निजी स्कूलों में पाठ्य पुस्तकों की कभी कमी नजर नहीं आती। इसीलिए सभी बच्चे निजी स्कूलों की राह पकड़ रहे हैं। शिक्षा को पूरी तरह से व्यापार बनाकर केजी टू पीजी मुफ्त शिक्षा का आश्वासन देकर सत्ता में पहुंची टीडीपी सरकार में गरीब शिक्षा से वंचित हो रहे हैं।

मुख्यमंत्रीजी मेरा एक सवाल है... क्या ये बात सच नहीं है कि सरकारी स्कूलों के विद्यार्थियों को समय पर पाठ्यपुस्तक और यूनिफॉर्म नहीं मिलने और बुनियादी सुविधाएं बेहतर नहीं बनाने, मध्याह्न भोजन योजना को निष्क्रिय बनाने जैसे आपकी कार्रवाइयों के कारण विद्यार्थियों की संख्या घट रही है? विद्यार्थियों की संख्या कम होने के नाम पर स्कूलों में कर्मचारियों की संख्या घटाना और स्कूलों को बंद करना क्या आपकी सरकार की एक साजिश नहीं है? शिक्षक संघों के उन आरोपों का क्या जवाब देंगे, जिसमें कहा जा रहा है कि सरकार शिक्षा क्षेत्र को निष्क्रिय बनाना और कार्पोरेट स्कूलों को बेनामी शिक्षण संस्थानों को लाभ पहुंचाने में जुटी है।

वाईएस जगन