- देहरादून से के. रामचंद्र मूर्ति

सारांश

गोवा और मणिपुर बहुत ही छोटे हैं। पंजाब में अकाली दल और भाजपा गठबंधन की पराजय लगभग तय मानी जा रही है। यूपी में अनिश्चितता बरकरार है। ऐसे में उत्तराखंड ही एक ऐसा राज्य है जोकि भाजपा की झोली में आ सकता है, जिस पर उसने पूरा जोर लगाया।

सोमवार शाम को उत्तराखंड में चुनावी शोर थम गया। इस पहाड़ी राज्य के चुनावी समीकरणों के देखने से लगता है कि बागी उम्मीदवारों की ताकत ही दो राष्ट्रीय दलों के भाग्य का फ़ैसला तय करने वाली है। कांग्रेस और भाजपा दोनों ही अपने पुराने सहयोगियों से बगावत का सामना कर रही हैं, जोकि अलग-अलग कारणों से नाराज़ चल रहे थे। बुधवार, 15 फरवरी को इस प्रदेश में मतदान होने वाला है। 11 मार्च को बाकी राज्यों के साथ इस राज्य में भी मतगणना होगी।


उत्तराखंड में चुनाव हमेशा कांटे की टक्कर जैसे रहे जहां पूर्ण बहुमत या सत्ता में स्थिरता का सुख किसी भी पार्टी को नहीं मिला। एनडी तिवारी एक मात्र मुख्यमंत्री थे जो 2002 से 2007 तक पूरे पांच साल तक सत्ता में बने रहे। इस बार भी लगता यही है कि मामला बेहद नज़दीकी होगा।

जीत-हार का अंतर कम

2012 में हुए पिछले चुनाव में कांग्रेस को 32 और भाजपा को 31 सीट मिले थे। दोनों पार्टियों के मिले वोटों के प्रतिशत में अंतर शून्य रहा। दोनों ही पार्टियों को 33.13 प्रतिशत वोट मिले थे। वोटों की कुल संख्या के हिसाब से कांग्रेस को भाजपा से सिर्फ 27,000 वोट ज्यादा मिले थे।


2007 के चुनाव में कांग्रेस को 29.9 फीसदी वोट मिले थे जबकि भाजपा को 31.6 फीसदी। 2002 में हुए पहले विधानसभा चुनाव में लोगों ने कांग्रेस को चुना था। उसे 26.81 फीसदी वोट मिले थे और भाजपा का वोटों का प्रतिशत 25.81 रहा। शुरू से ही जीत का अंतर काफी कम ही रहता रहा।

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उत्तराखंड में कुल 74 लाख मतदाता हैं। इनमें करीब 39 लाख महिला मतदाता हैं। यह एक ऐसा राज्य है जहां अगड़ी जातियों का दबदबा बहुत ज्यादा है। ठाकुर और ब्राह्मण मिलकर कुल आबादी का 64 प्रतिशत होंगे और सिर्फ ठाकुरों का हिस्सा 35 प्रतिशत है। मुसलमान आबादी 14 प्रतिशत है जबकि प्रदेश की कुल आबादी का 16 प्रतिशत दलितों का है।

रविवार को भाजपा के प्रत्याशी कुलदीप कानवासी (32) का निधन हुआ जिससे चमोली जिले के कर्णप्रयाग विधानसभा क्षेत्र में चुनाव रद्द किया गया। अब कुल 70 में से 69 विधानसभा क्षेत्रों में मतदान होगा।

भाजपा के लिए अहम है उत्तराखंड

इस प्रदेश की एक और खासियत यह रही कि हर पांचवें परिवार से एक सैनिक है। फिलहाल इस राज्य से 90 हजार लोग सेना में काम कर रहे हैं जबकि अर्ध-सैनिक बलों में 1,25,000 लोग कार्यरत हैं। यही वजह है कि भाजपा के नेता अपने भाषणों में वन रैंक वन पेंशन (ओआरओपी) के बारे में विस्तार से बताते हैं। इसलिए उत्तराखंड भाजपा के लिए, खासकर नरेंद्र मोदी के लिए बेहद महत्वपूर्ण है। जिन पांच राज्यों में फिलहाल विधानसभा चुनाव हो रहे हैं उनमें गोवा और मणिपुर बहुत ही छोटे हैं। पंजाब में शिरोमणि अकाली दल (एसएडी) और भाजपा गठबंधन की पराजय लगभग तय मानी जा रही है। यूपी में अनिश्चितता बरकरार है। ऐसे में उत्तराखंड ही एक ऐसा राज्य है जोकि भाजपा की झोली में आ सकता है, जिस पर पार्टी ने बहुत कुछ दांव पर रखा है।

प्रधानमंत्री बनाम मुख्यमंत्री

उत्तराखंड में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और मुख्यमंत्री हरीश रावत के बीच दिखाई पड़ रही इस लड़ाई में भाजपा कोई कसर छोड़ नहीं रही है। हालांकि कांग्रेस के उपाध्यक्ष राहुल गांधी ने कुछ रोड शो के अलावा तीन आमसभाओं को संबोधित किया है, लेकिन मुख्य रूप से हरीश रावत ही कांग्रेस पार्टी के प्रचार अभियान की कमान संभाले हुए हैं। इसमें चाहे जीते या हारे, इसकी जिम्मेदारी रावत की ही होगी।

भाजपा ने लगाया पूरा जोर

जहां तक भाजपा का सवाल है, उसकी ओर से पीएम मोदी ने पांच रैलियों को संबोधित किया है और उसके तमाम दिग्गज जैसे कि पार्टी अध्यक्ष अमित शाह, वित्त मंत्री अरुण जेटली, गृह मंत्री राजनाथ सिंह के अलावा उमा भारती, स्मृति इरानी, नितिन गडकरी, जेपी नड्डा, धर्मेंद्र प्रधान आदि अन्य मंत्री, सांसद हेमा मालिनी, योगी आदित्यनाथ समेत कई बड़े नेताओं ने इस छोटे से राज्य में प्रचार में भाग लिया।


पहले जोड़-तोड़, अब बागियों से खतरा

भाजपा के लिए दिक्कत यह है कि बागी उम्मीदवार भी उतने ही जोर लगाए हुए हैं ताकि पार्टी के अधीकृत उम्मीदवारों को पराजित किया जा सके। बता दें कि अमित शाह ने हरीश रावत के नेतृत्व वाली सरकार को गिराने की साजिश रची थी और हेच.एन. बहुगुणा के बेटे विजय बहुगुणा के जरिए दलबदल को बढ़ावा दिया था। कांग्रेस के 12 विधायक भाजपा का पल्ला थामने के लिए तैयार भी हुए थे। शाह ने प्रदेश में अपनी पार्टी के नेताओं को मनाने की कोशिश की कि बागियों को फिर से पार्टी में ले लिया जाए।


उन्होंने लेफ्टिनेंट जनरल खंडूरी, निशांक, अजय भट और अन्य लोगों को फिर से पार्टी में आने का न्यौता दिया। लेकिन उत्तराखंड के तमाम भाजपा नेताओं ने इस प्रस्ताव को मानने से साफ़ इनकार किया। फिर भी ताकतवर नेता होने के नाते अमित शाह ने उनके विरोध को दरकिनार करते हुए बागी विधायकों को फिर से पार्टी में ले लिया। इसी की कड़ी में सभी बागी विधायकों को भाजपा ने टिकट दिया और चार वफादार विधायकों का टिकट काटा ताकि गैर-विधायक बागियों को टिकट दिया जा सके। कई भूतपूर्व मुख्यमंत्री भी अपने गुट के उम्मीदवारों को जिताने के लिए पार्टी के अधीकृत प्रत्याशियों के खिलाफ काम कर रहे हैं।

कांग्रेस को भी हैं परेशानियां

बागियों के मामले में कांग्रेस के सामने भी परेशानियां कम नहीं हैं। कम से कम 12 स्थानों में वह बागी उम्मीदवारों से जूझ रही है। हालांकि बागियों के खतरे के मामले में कांग्रेस की हालत भाजपा की तुलना में कुछ बेहतर कही जा सकती है। असंतुष्टों से चुनौती और सत्ता-विरोधी लहर के बावजूद रावत ताकतवर भाजपा से हिम्मत के साथ लोहा ले रहे हैं।


भ्रष्टाचार ही बड़ा मुद्दा

इस प्रदेश के चुनाव में भ्रष्टाचार, ओआरओपी, मुज़फ्फरनगर सांप्रदायिक दंगे आदि मुद्दे प्रमुख हैं। उत्तराखंड को अस्तित्व में आए 16 साल हुए हैं और इस दौरान 8 मुख्यमंत्री बदल चुके हैं। क्या अब इस राज्य को नए मुख्यमंत्री मिलने वाले हैं या फिर वर्तमान मुख्यमंत्री ही सत्ता में बने रहेंगे, इस प्रश्न का जवाब बहुत हद तक बागियों की क्षमता और ताकत पर टिका हुआ है।