लखनऊ : समाजवादी पार्टी (सपा) के अंदर चल रही भारी उथल-पुथल के बीच ही मुख्यमंत्री अखिलेश यादव ने इशारा किया है कि वो आगामी चुनावों में बुंदेलखंड क्षेत्र से लड़ सकते हैं। पार्टी में उत्पन्न संकट से जूझते हुए ही उन्होंने समय निकाल कर इस क्षेत्र में सोलार पॉवर परियोजना का आरंभ किया है, जोकि इस बात का साफ संकेत था कि वो इस इलाके पर नजर गड़ाए हुए हैं। इसके अलावा बुंदेलखंड में उन्होंने कई रैलियों को भी संबोधित किया और लोगों के लिए कई सौगातों की घोषणा कीं।

यह जगजाहिर है कि बुंदेलखंड एक बहुत ही पिछड़ा इलाका है जिसकी चर्चा देश में ही नहीं, बल्कि अंतरराष्ट्रीय स्तर पर भी होती है। लगातार पड़ने वाले सूखे से और लोगों के पलायन के साथ-साथ हाल फिलहाल की नोटबंदी के चलते यह इलाका बुरी तरह प्रभावित है। कहने के लिए तो आर्थिक दृष्टि से कमजोर लोगों के नाम से नरेगा, खाद्य सुरक्षा कानून, मध्याह्न भोजन, सामाजिक सुरक्षा पेंशन जैसी कई योजनाएं हैं, पर इनके क्रियान्वयन में अक्सर ग्रामीण गरीबों की उपेक्षा ही की जाती है। जिससे क्षेत्र के लोगों में गरीबी और कुपोषण को और ज्यादा बढ़ावा मिला।

पिछले चुनावों में अखिलेश कन्नौज और फिरोजाबाद से जीते थे। अगर सचमुच वो इस बार इस बुंदेलखंड जैसे सूखाग्रस्त और अविकसित इलाके से चुनाव लड़ते हैं तो इसका राजनीतिक महत्व तो होगा ही होगा, ऊपर से भविष्य में राष्ट्रीय राजनीति में कदम रखने के उनके सपनों के परिप्रेक्ष्य में भी इसे एक सांकेतिक कदम भी माना जाएगा।

इस कदम के साथ अखिलेश इस क्षेत्र में न सिर्फ समाजवादी पार्टी के प्रभाव का विस्तार करेंगे, बल्कि लोगों को यह दिलासा भी देंगे कि वो अपने विकास के एजेंडे के प्रति समर्पित रहेंगे। ऐसा माना जाता है कि समाजवादी पार्टी को शहरी क्षेत्रों और ग्रामीण इलाकों के धनी समुदायों में ही ज्यादा पकड़ है। सड़क संपर्क, गन्ने का समर्थन मूल्य जैसी घोषणाएं हों या फिर मेट्रो, एक्सप्रेसवे, सूपर-स्पेशलाइज्‍ड मेडिकल केयर या फिर लैपटॉप देने जैसी योजनाएं, इनसे बुंदेलखंड जैसे पिछड़े क्षेत्र को लाभ न के बराबर हुआ। ऐसे में अखिलेश इस फैसले के साथ इस क्षेत्र को नया संदेश पहुंचाने की कोशिश कर रहे हैं, ऐसा विश्लेषकों का आकलन है।

इस क्षेत्र पर उनका ध्यान बढ़ने से सामाजिक सुरक्षा योजनाओं में व्याप्त भ्रष्टाचार पर अंकुश लगने की संभावना निश्चित रूप से बढ़ जाएगी। हालांकि आंकड़ों की दृष्टि से देखा जाए तो कुल 403 तीन सीटों वाली यूपी की विधानसभा में 19 सीटों के साथ बुंदेलखंड का हिस्सा बहुत ही कम है। फिर भी, एक बात तो स्पष्ट है कि इटावा, कन्नौज, मैनपुरी और फारुखाबाद जैसे सपा के परम्परागत गढ़ों को फिर से फतह कर लेने में अखिलेश कोई कसर नहीं छोड़ेंगे। बुंदेलखंड में बाबेरु, बबीना, चरखारी और महोबा सीटों में से किसी एक को अखिलेश अपने लिए चुन सकते हैं।

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अगर 2012 के चुनावों की बात की जाए तो बुंदेलखंड में मौजूद कुल 19 सीटों में से बहुजन समाज पार्टी 7, समाजवादी पार्टी 5, कांग्रेस 4 और भाजपा 3 पर काबिज हैं। एक समय था जब इस क्षेत्र में सपा का दबदबा था। लेकिन बाद में यहां पर बसपा मजबूत बन गई। अब अखिलेश के इस तरफ रुख करने से सपा फिर से हावी हो सकती है।

बुंदेलखंड में सपा का प्रभाव बढ़ने से उत्तर प्रदेश के इस दक्षिणी हिस्से के अलावा मध्यप्रदेश में भी उसे राजनीतिक लाभ होगा। बता दें कि बुंदेलखंड वह क्षेत्र है जो उत्तर प्रदेश और मध्यप्रदेश दोनों राज्यों में फैला हुआ है। मध्यप्रदेश के दतिया, टीकमगढ़, छतरपुर, पन्ना, सागर, गुना, अशोकनगर और दमोह जिले इसके अंतर्गत आते हैं जबकि उत्तरप्रदेश के झांसी, ललितपुर, जालौन, हामीरपुर, महोबा, बांदा और चित्रकूट जिले बुंदेलखंड में समाहित हैं।

लखनऊ विश्वविद्यालय में पढ़ाने वाले आशुतोष मिश्र मानते हैं कि बुंदेलखंड से सीएम अखिलेश के लड़ने का मतलब यह होगा कि लोगों में यह संदेश जाएगा कि इस इलाके को ज्यादा महत्व दिया जाएगा। उन्होंने आगे कहा कि इससे लोग यह मान लेंगे कि व्यवस्था अब उनकी आवाज़ सुनने के लिए तैयार हो गई है। लेकिन फिलहाल तो लोगों को इस बात में ज्यादा दिलचस्पी है कि अखिलेश अपनी पार्टी व परिवार में चल रही अंतर्कलह को सुलझाने में सफल होंगे या नहीं, अगर होंगे भी तो किस कीमत पर।