13.06.2018, बुधवार

पेरवरम, पूर्वी गोदावरी जिला

आज कॉटन बैरेज सेंटर के पास मध्यान्ह भोजन का शिबिर था। बगल में गोदावरी और सामने 'गोदावरी डेल्टा के पितामहा' सर अर्थर कॉटन की प्रतिमा। वहीं पर पिताजी की विशाल मूर्ति बनी है। ये सभी इस बात की गवाह है कि महान कार्य करने वालों को लोग अपने दिलों में बसा लेते हैं। राज्य के इतिहास में पेयजल परियोजनाओं की प्राथमिकता और आवश्यकता को जानकर भावी पीढ़ियों की जरूरतों को ध्यान में रखते हुए उसी दिशा में पूरी लगन के साथ काम करने वाले दो दार्शनिक व्यक्तियों की विशाल प्रतिमाएं यहां लगी हैं।

सिंचाई परियोजनाओं के निर्माण से इस क्षेत्र को हराबरा करने वाले महान कॉटन के बारे में कुछ भी कहना कम ही होगा। पिताजी ने जब इस क्षेत्र में पदयात्रा की थी, तब उन्होंने अपनी प्रजा प्रस्थानम किताब में लिखा था कि कहीं दूसरी जगह पैदा होकर नौकरी के लिये यहां पहुंचे उस महान व्यक्ति में जो जिज्ञासा थी, उसका थोड़ा हिस्सा भी यहां की सरकार में नहीं है, जोकि बहुत ही दुख की बात है। उस वक्त भी राज्य के मुख्यमंत्री चंद्रबाबू ही थे और अब भी वही मुख्यमंत्री हैं। यही नहीं, परिस्थितियां भी लगभग समान हैं। कल और आज भी चंद्रबाबू का ध्यान केवल उनके प्रचार के लिए काम आने वालों पर है, क्योंकि जो चीज भ्रष्टाचार के लिए अनुकूल होती हैं, उनका पूरा ध्यान उसी पर होता है।

बाबू शासन से परेशान हैं कांट्रैक्ट कर्मचारी

यहां मुझे मिले विद्युत विभाग में अनुबंध पर कार्यरत कर्मचारियों ने बताया, 'हम पिछले 20 वर्षों से काम कर रहे हैं, हमारी नौकरी की सुरक्षा नहीं है। बहुत कम वेतन में गुजारा कर रहे हैं। बाबू जब भी सत्ता में आते हैं तो हमें अपनी नौकरी जाने का डर सताने लगता है। चुनाव के वक्त हमसभी की नौकरियों के नियमितिकरण का आश्वासन दिया था, लेकिन अब हमारी नौकरी छीनने का प्रयास कर रहे हैं।'

बाद में मिले ट्रांस्को कर्मचारियों की भी यही कहानी है। उन्होंने कहा, 'इससे पहले चंद्रबाबू नायडू जब मुख्यमंत्री थे, तब पहले चरण के सुधारों के नाम पर अनुबंध पद्धति लेकर आए। अब दूसरे चरण के नाम पर कर्मचारियों की सेवाओं को आउट सोर्सिंग करने की बात कह रहे हैं और इसका मुख्य उद्देश्य विद्युत सेवाओं का निजीकरण कर उसे अपने करीबियों को सौंपना है। बाबू सरकार ने केवल कमीशन के लिए 22 लाख रुपये खर्च से सुचारू रूप से चल रहे 132 केवी सबस्टेशन निजी लोगों को सौंपकर 52.5 लाख रुपये का भुगतान किया है। राज्य के मुख्यमंत्री होने के बाद भी खुद को सीईओ कहलवाने में रुचि दिखाने वाले चंद्रबाबू हर चीज को व्यापार की दृष्टि से देखते हैं। ऐसे में बाबू में मानवता की दृष्टि का कल्पना तक नहीं की जा सकती।

प्रशासकों की अनदेखी का शिकार होते हुए दुर्बर जीवन बिताने को मजबूर आर.एस.नगर की बहनों की दर्दभरी कहानी सुनकर मुझे बहुत बुरा लगा। उन्होंने बताया, झोपड़ियों में रहते थे और आज हम पक्के मकानों में रह रहे हैं तो इसका मुख्य कारण आपके पिताजी ही हैं। उनके चले जाने के बाद हमारी परेशानी सुनने वाला कोई नेता नहीं है। इस सरकार में तो हमारी हालत बहुत ही बदतर बनी हुई है।

कॉलोनी में नहीं हैं ड्रेनेज की व्यवस्था

हमारी कॉलोनी में ड्रेनेज का पानी बाहर जाने का रास्ता नहीं होने से हम दुर्गंध पानी की मच्छरों व सूआरों के बीच रहने को मजबूर हैं। शौचालयों का मलीन उसी में तो पेयजल के पाइपलाइन भी उसी नाले से गुजरता है। इस बारे में कलेक्टर और स्थानीय विधायक से समस्या की शिकायत करने के बावजूद उसका समाधान नहीं हुआ है। कॉलोनी के लोग गंभीर रोगों का शिकार हो रहे हैं, लेकिन हमारी तरफ देखने वाला कोई नहीं है। ऐसा लगता है कि हमें आम मनुष्य की नजरिया से नहीं देखा जा रहा है।' उनकी ये बातें सुनकर मैं हैरान रह गया। पुष्कर के नाम पर सैकड़ों करोड़ रुपये लूट चुके नेताओं को बगल में रह रहे गरीब चुनाव को छोड़कर बाकी समय में कभी याद ही नहीं आते।

आखिर में मुख्यमंत्रीजी मेरा एक प्रश्न है... क्या ये सच नहीं है कि केवल कमीशन के लिए आपकी सरकार राज्य के सब-स्टेशन और उनमें कार्यरत कर्मचारी तथा आवंटित बजट में जब सबकुछ ठीक-ठाक चल रहा है तो सब-स्टेशनों को दोगुने खर्च पर आउट सोर्सिंग पर दिया जा रहा है। चुनाव के वक्त कांट्रैक्ट कर्मचारियों की सेवाएं नियमित करने का आश्वासन दे चुके आपका अब उनकी रोजीरोटी छीनना कहां का इंसाफ है ?

वाईएस जगन