14.05.2018, सोमवार

एलुरु पूर्वीलाकुलु, पश्चिमी गोदावरी

पिताजी के चरणों को नमन कर शुरू की गई मेरी पदयात्रा ने व्यापक जनसमर्थन के साथ बगैर किसी मुश्किल के 2,000 किलो मीटर की दूरी आसानी से पूरी कर ली है। सर्वधर्म प्रार्थना के साथ मैं ने आज की पदयात्रा शुरू की।

14 मई आंध्र प्रदेश के लोगों के लिए खास दिन है। अब तक चले जनविरोधी शासन को खत्म करते हुए नये युग की शुरूआत आज ही के दिन हुई थी। कल्याण किसे कहते हैं... विकास क्या होता है इसका लोगों को इसका एहसास कराने वाला स्वर्णयुग का आगाज भी आज ही दिन हुआ था। दशकों के सूखे की अंत करते हुए वरूणदेव की दया शुरू हुई थी ठीक 14 साल पहले। 14वें मुख्यमंत्री के रूप में 14 मई को पिताजी ने मुख्यमंत्री पद की शपथ ली थी।

पिताजी का प्रजा प्रस्थानम... बहन शर्मिला का एक और प्रजा प्रस्थानम... मेरी प्रजा संकल्प यात्रा... तीनों का पश्चिमी गोदावरी जिले के साथ काफी पुराना संबंध है। ठीक 17 साल पहले पिताजी, पांच साल पहले बहन शर्मिला और आज मेरा 14 मई को ही पदयात्राओं के साथ इस जिले के लोगों से मिलना एक संयोग ही है। बहन की एक और प्रजा प्रस्थानम भी इसी जिले में मई के महीने में ही 2,000 किलो मीटर की दूरी तय की थी। पिताजी की पदयात्रा में इस जिले में पहली जनसभा का आयोजन 14 मई 2003 में हुआ था और उसके अगले ही वर्ष 14 मई को पिताजी का मुख्यमंत्री के रूप में शपथ लेना भगवान की इच्छा ही थी।

सुबह पदयात्रा के दौरान कलकुर्रू गांव निवासी अशोक कुमार नाम भाई अपना बच्चा और पत्नी के साथ आकर मुझसे मिला और बोला, 'अन्ना, हमारे परिवार का बहिष्कार किया गया है। इसका कारण पूछने पर...मेरा आपकी पदयात्रा में बढ़-चढ़कर हिस्सा लेना है। मेरा स्वागत करने के नाम पर मछुआरा सोसायटी में शामिल लोगों की हिस्सेदारी हटाने के अलावा उनके पास काम करने वालों को भी हटा दिया है।

यह सब सत्तारूढ़ पार्टी के नेताओं की अराजकता है। लेकिन हमारे साथ कुछ भी हो जाए हमें इसकी परवाह नहीं है। जान भी चली जाए, लेकिन हम आपके साथ हैं।' उनके इस सम्मान और प्यार से मैं पिघल गया। टीडीपी के जनप्रतिनिधि अपनी ताकत बढ़ाने के लिए कोल्लेरु के गांवों को अपने कब्जे में बनाए रखने के गलत उद्देश्य से गांव की रीति-रिवाज तोड़ रहे हैं। अराजकता पर उतारू अपने विधायकों को नियंत्रित करने की जिम्मेदारी भुलाकर उल्टा उन्हें सर्वश्रेष्ठ विधायकों की रैंकिंग देकर उन्हें प्रोत्साहित करना केवल चंद्रबाबू नायडू से ही संभव है।

माउंट एवरेस्ट पर चढ़ने वाले के साथ भी विश्वासघात

दोपहर के शिवर के पास रजक संघ के राज्य स्तरीय प्रतिनिधि और माउंट एवरेस्ट पर चढ़ने वाले गजवेल्ली चेन्नाराव के साथ आकर मुझसे मिले। उस भाई का गरीब रजक परिवार है। पिता नहीं है... मां कृषि मजदूरी है। उसने कहा, 'मैं बी.कॉम की पढ़ाई पूरी कर चुका हूं और नौकरी मिलने की उम्मीद से शारीरिक शिक्षा की पढ़ाई कर चुका हूं। मेरी आशा पर पानी फेर गया है। पिछले वर्ष इस राज्य की तरफ से एवरेस्ट पर चढ़ाई की थी। मुख्यमंत्री खुद मुझे शुभकामना देने के साथ मेरे साहस के लिये ईनाम के तौर पर 10 लाख रुपये देने और नौकरी में प्राथमिकता का आश्वासन दिया था। परंतु अब तक किसी प्रकार की कोई सहायता नहीं मिली है। 10 लाख रुपये भी नहीं मिले। मजबूरी में पेशेवर काम कर दिन गुजर रहा हूं।'

मुख्यमंत्रीजी मेरा एक सवाल है...आप ने खुद अत्यंत साहस के साथ एवरेस्ट की चढ़ाई कर चुके पिछड़े वर्ग से जुड़े उस भाई को 10 लाख का इनाम, नौकरी को प्राथमिकता देने का भरोसा दिया था, लेकिन अब आपका इस तरह मुकरना क्या विश्वासघात की पराकाष्टा नहीं है। राज्य में कोई चाहे किसी भी तरह की प्रतिभा प्रदर्शित करता है तो उसके लिए खुद को जिम्मेदार बताते हुए अपने प्रचार के लिये उन्हें बड़े-बड़े तोहफे और नौकरी जैसे वरदानों की घोषणा करना, लेकिम कार्यक्रम मंच से उतरने के तुरंत बाद अपने आश्वासनों को को भूल जाते हैं। ऐसा करना क्या प्रतिभाओं के साथ विश्वासघात नहीं है ?

वाईएस जगन