पुणे : दिव्यांशु गणत्रा जब महज 19 साल के थे तभी मोतियाबिंद के चलते उनकी आंखों की रोशनी चली गई थी। स्वभाव से साइकिल चलाने, पहाड़ों की चढ़ाई करने और लंबी पदयात्रा करने में मस्त रहने वाले गणत्रा अपने कमरे की चारदीवारी के भीतर खुद को कैद रखने को तैयार नहीं थे।

उन्होंने हर विषम परिस्थिति का सामना किया और आज वह भारत के पहले एकल नेत्रहीन पैराग्लाइडर हैं। उनका मानना है कि सिर्फ खेल एक ऐसा क्षेत्र है जो शारीरिक रूप से सक्षम व अक्षम लोगों एकजुट कर सकता है और अशक्त व्यक्ति (दिव्यांग) की जन्मजात क्षमता को लेकर गलतफहमी दूर हो सकती है।

दिव्यांशु का यह सफर उनकी जिंदगी में अचानक आई मुश्किल और अंधकार के दौर के प्रति उनके गुस्से व निराशा से शुरू हुई। उनके अकेले चलने की क्षमता को लेकर हर दिन लोग सवाल उठाते थे। अपने जीवन को संवारने के लिए वह एक पुनर्वास केंद्र गए, लेकिन वहां वह ज्यादा वक्त नहीं टिक पाए, क्योंकि वहां उनको अपने लिए टेलीफोन ऑपरेटर बनने या खड़िया बनाने का काम करने के सिवा दूसरा कोई काम करने का अवसर नहीं था। जबकि उनको पक्का विश्वास था कि अशक्त व्यक्ति के बारे में समाज की जो धारणा है, वह उससे ज्यादा कर सकते हैं।

40 वर्षीय दिव्यांशु ने आईएएनएस से बातचीत में कहा, "मैं लोगों की सहानुभूति के सहारे जिंदगी बसर करने को तैयार नहीं था। मुझे अपना मनोबल और शारीरिक शक्ति दोबारा हासिल करने में थोड़ा वक्त लगा। मैं जानता था कि मैं खुले मैदान के लिए बना हूं। धीरे-धीरे मैं साइकिल चलाने व चढ़ाई करने जैसी गतिविधि में संलग्न रहने लगा।"

चढ़ाई करने से पैराग्लाइडिंग का सफर एक प्रशिक्षण के साथ आरंभ हुआ। उन्होंने बताया, "मैं अपने उस आनंद की अनुभूति को कभी भूल नहीं सकता। यह मेरे लिए एक प्रकार का आध्यात्मिक अनुभव था। आकाश में उड़ने की अनुभूति को बयां करना काफी कठिन है। धरती पर कई बाधाएं हैं, लेकिन आकाश में तो मैं पक्षी की तरह आजाद हूं।"

यह 2004 की बात है, जब वह 26 साल थे। उसके बाद उन्होंने कभी पीछे पलट कर नहीं देखा। रूढ़ियों से मुकाबला करते हुए उस भीड़ से अलग दिखना चाहते थे, उस धारणा को तोड़ना चाहते थे कि अशक्त व्यक्ति को सहारे की जरूरत होती है।

आखिरकार, 2014 में दिव्यांशु भारत के पहले एकल पैराग्लाइड़र बन गए। उसी साल उन्होंने भारत में आयातित साइकिल की अग्रणी ब्रांड फायरफॉक्स बाइक के सहयोग से एडवेंचर्स बियांड बैरियर्स फाउंडेशन (एबीबीएफ) की शुरुआत की, जिसका मकसद सक्षम व असक्षम के बीच के अंतर को मिटाना है।

उन्होंने कहा, "मुझे पुणे में पैदा होने का सौभाग्य मिला। बचपन से ही मैं पहाड़ियों की चढ़ाई करता रहा हूं और अक्सर लंबी यात्रा पर जाता रहा हूं। मेरा विश्वास है कि खेल एक ऐसा मंच है, जहां दोनों वर्ग के लोगों के बीच संपर्क स्थापित होता है।"

दिव्यांशु को लोग अक्सर दूसरों की प्रेरणा के लिए मिसाल के तौर पर पेश करते हैं, लेकिन उनको अपनी प्रशंसा सुनने का शौक नहीं है। उन्होंने कहा, "मैंने जो किया, उसमें प्रेरणा की कोई बात नहीं है। पैराग्लाइडिंग या पवर्तारोहण जैसे साहसिक खेल कोई भी खेल सकता है। इसमें कौन-सी विशेष बात है जो मैंने की है? आप किसी सक्षम व्यक्ति द्वारा ऐसा करने पर उनको किसी के लिए प्रेरणा के स्रोत नहीं बता सकते तो फिर अशक्त के लिए क्यों?"

दिव्यांशु ने कहा, "नेत्रहीन व्यक्ति के लिए अशक्तता शब्द का इस्तेमाल इसके बाद नहीं होना चाहिए। हम सबसे ज्यादा शरीर से सक्षम व्यक्ति की इस धारणा से आहत होते हैं। अशक्तता के साथ जीना किसी के लिए मुश्किल होता है। इसमें कोई बुरी मंशा नहीं है, बल्कि यह गलतफहमी है, जो मुख्यधारा के लोग अपने मन में पाल लेते हैं।"

उन्होंने कहा, "हमारे देश में सबसे ज्यादा अशक्त लोगों की आबादी है, जो अदृश्य है। भारत में करीब 20 करोड़ लोग अशक्त हैं, लेकिन हमारी तरफ मुश्किल से ध्यान दिया जाता है।" दिव्यांगों के संवैधानिक अधिकारों के बार में दिव्यांशु कहते हैं कि इसके लिए कई कानून हैं, लेकिन कानून को अमल में लाने का तरीका ढीला है।

उन्होंने कहा, "अगर कानून को अमल में नहीं लाया जाता है तो यह बेकार है। पहली बात यह कि अधिकांश अशक्त व्यक्ति अपने अधिकारों को लेकर अनजान हैं। दूसरी बात यह कि अशक्तों की भलाई के लिए अधिकारों का उचित कार्यान्वयन नहीं होता है। निजी व सार्वजनिक क्षेत्र में अशक्तों के लिए आरक्षण है, लेकिन अशक्त व्यक्तिय बाहर बैठाकर रखा जाता है। उनको कोई काम नहीं दिया जाता है, जो बहुत ही खराब स्थिति है।"

दिव्यांशु ने कहा, "अशक्तों के प्रति लोगों का नजरिया बदल रहा है। जब यह बदलाव ज्यादा सार्थक होगा और मुख्यधारा के लोग अपने शैक्षणिक संस्थानों, कार्यस्थलों और सार्वजनिक स्थलों को हमारे लिए खोलेंगे तो हम व्यापक बदलाव देख पाएंगे।"