लोहड़ी का त्यौहार मूल रूप से पंजाबी सभ्यता व रीति-रिवाजों से जुड़ा त्यौहार है, जो अब धीरे-धीरे देश के कई राज्यों तक फैल चुका है। इस त्यौहार को पौष के अंतिम दिन यानि माघ संक्रांति से पहली रात को मनाया जाता है। मकर संक्रांति की पूर्वसंध्या पर इस त्यौहार का विशेष उल्लास उत्तर भारत के राज्यों में देखने को मिलता है।

'लोहड़ी' की उत्पत्ति

'लोहड़ी' शब्द अनेक शब्दों को मिलाकर बनता है, जिसमें ‘ल’ का अर्थ है लकड़ी, ‘ओह’ का अर्थ गोहा होता है जिसे सूखे उपले कहा जाता है और ‘ड़ी’ का अर्थ होता है रेवड़ी। लोहड़ी के पर्व को लेकर अनेक मान्यताएं प्रचलित हैं जो पंजाब की सभ्यता संस्कृति से जुड़ी हैं।

 त्यौहार मनाते लोग
त्यौहार मनाते लोग

आमतौर पर यह त्यौहार हर साल 13 जनवरी को मनाया जाता है। लोहड़ी के दिन खाने-पीने और नाच-गाने का विशेष महत्व है। इसी के साथ उल्लास पूर्वक इस त्यौहार का आनंद लिया जाता है।

ऐसे करते हैं तैयारी

लोहड़ी से 20-25 दिन पहले ही बालक एवं बालिकाएं 'लोहड़ी' के लोकगीत गाकर लकड़ी और उपले इकट्ठे करते हैं। संचित सामग्री से चौराहे या मुहल्ले के किसी खुले स्थान पर आग जलाई जाती है। मुहल्ले या गाँव भर के लोग अग्नि के चारों ओर आसन जमा लेते हैं। घर और व्यवसाय के कामकाज से निपटकर प्रत्येक परिवार अग्नि की परिक्रमा करता है। रेवड़ी (और कहीं कहीं मक्की के भुने दाने) अग्नि की भेंट किए जाते हैं तथा ये ही चीजें प्रसाद के रूप में सभी उपस्थित लोगों को बाँटी जाती हैं। घर लौटते समय 'लोहड़ी' में से दो चार दहकते कोयले, प्रसाद के रूप में, घर पर लाने की प्रथा भी है।

 त्यौहार पर यह है परम्परा
त्यौहार पर यह है परम्परा

यह भी है एक प्रथा

जिन परिवारों में लड़के का विवाह होता है अथवा जिन्हें पुत्र प्राप्ति होती है, उनसे पैसे लेकर मुहल्ले या गांव भर में बच्चे ही बराबर बराबर रेवड़ी बांटते हैं। लोहड़ी के दिन या उससे दो चार दिन पूर्व बालक बालिकाएं बाजारों में दुकानदारों तथा पथिकों से 'मोहमाया' या महामाई (लोहड़ी का ही दूसरा नाम) के पैसे माँगते हैं, इनसे लकड़ी एवं रेवड़ी खरीदकर सामूहिक लोहड़ी में प्रयुक्त करते हैं।

ऐसी हरकत भी करते हैं लड़के

शहरों के शरारती लड़के दूसरे मुहल्लों में जाकर 'लोहड़ी' से जलती हुई लकड़ी उठाकर अपने मुहल्ले की लोहड़ी में डाल देते हैं। यह 'लोहड़ी व्याहना' कहलाता है। कई बार छीना झपटी में सिर-फुटौवल भी हो जाती है। मँहगाई के कारण पर्याप्त लकड़ी और उपलों के अभाव में दुकानों के बाहर पड़ी लकड़ी की चीजें उठाकर जला देने की शरारतें भी चल पड़ी हैं।

ऐसे होता है नाच व गान
ऐसे होता है नाच व गान

लोहड़ी का त्यौहार पंजाबियों तथा हरयानी लोगों का प्रमुख त्यौहार माना जाता है। यह लोहड़ी का त्यौहार पंजाब, हरियाणा, दिल्ली, जम्मू कश्मीर और हिमाचल में धूमधाम तथा हर्षोल्लास के साथ मनाया जाता हैं।

लोहड़ी त्यौहार के उत्पत्ति के बारे में काफी मान्यताएं हैं जो की पंजाब के त्यौहार से जुड़ी हुई मानी जाती हैं। कई लोगों का मानना हैं कि यह त्यौहार जाड़े की ऋतु के आने का द्योतक के रूप में मनाया जाता हैं।

दुल्ला भट्टी हैं लोहड़ी के केन्द्र

लोहड़ी को दुल्ला भट्टी की एक कहानी से भी जोड़ा जाता हैं। लोहड़ी की सभी गानों को दुल्ला भट्टी से ही जुड़ा तथा यह भी कह सकते हैं कि लोहड़ी के गानों का केंद्र बिंदु दुल्ला भट्टी को ही बनाया जाता हैं।

दुल्ला भट्टी मुग़ल शासक अकबर के समय में पंजाब में रहता था। उसे पंजाब के नायक की उपाधि से सम्मानित किया गया था। उस समय संदल बार के जगह पर लड़कियों को गुलामी के लिए बल पूर्वक अमीर लोगों को बेच जाता था जिसे दुल्ला भट्टी ने एक योजना के तहत लड़कियों को न की मुक्त ही करवाया बल्कि उनकी शादी की हिन्दू लड़कों से करवाई और उनके शादी के सभी व्यवस्था भी करवाई। वह सभी पंजाबियों का नायक माना जाता था।

ऐसे दिखते हैं नए कपल
ऐसे दिखते हैं नए कपल

ऐसे मनाते हैं त्यौहार

लोहड़ी मनाने के लिए लकड़ियों की ढेरी पर सूखे उपले भी रखे जाते हैं। समूह के साथ लोहड़ी पूजन करने के बाद उसमें तिल, गुड़, रेवड़ी एवं मूंगफली का भोग लगाया जाता है। इस अवसर पर ढोल की थाप के साथ गिद्दा और भांगड़ा नृत्य जरूर करते हैं और महिला पुरुष एक साथ मिल मौज-मस्ती करते हैं।

चर्खा चढ़ाने की भी परम्परा

गोबर के उपलों की माला बनाकर मन्नत पूरी होने की खुशी में लोहड़ी के समय जलती हुई अग्नि में उन्हें भेंट किया जाता है। इसे 'चर्खा चढ़ाना' कहते हैं।

लोहड़ी एवं मकर संक्रांति एक-दूसरे से जुड़े रहने के कारण सांस्कृतिक उत्सव और धार्मिक पर्व का एक अद्भुत त्योहार है। लोहड़ी के दिन जहां शाम के वक्त लकड़ियों की ढेरी पर विशेष पूजा के साथ लोहड़ी जलाई जाती है, वहीं अगले दिन प्रात: मकर संक्रांति का स्नान करने के बाद उस आग से हाथ सेंकते हुए लोग अपने घरों को आते हैं । इस प्रकार लोहड़ी पर जलाई जाने वाली आग सूर्य के उत्तरायन होने के दिन का पहला विराट एवं सार्वजनिक यज्ञ कहलाता है।

लोहड़ी पर अनेक लोक-गीतों का प्रचलन

'सुंदर-मुंदरिए, तेरा की विचारा - दुल्ला भट्टी वाला...' शायद सबसे लोकप्रिय गीत है जो इस अवसर पर गाया जाता है। पूरा गीत इस प्रकार है:

सुंदर मुंदरिए - हो तेरा कौन विचारा-हो

दुल्ला भट्टी वाला-हो

दुल्ले ने धी ब्याही-हो

सेर शक्कर पाई-हो

कुडी दे बोझे पाई-हो

कुड़ी दा लाल पटाका-हो

कुड़ी दा शालू पाटा-हो

शालू कौन समेटे-हो

चाचा गाली देसे-हो

चाचे चूरी कुट्टी-हो

जिमींदारां लुट्टी-हो

जिमींदारा सदाए-हो

गिन-गिन पोले लाए-हो

इक पोला घिस गया जिमींदार वोट्टी लै के नस्स गया - हो!

यह गीत दुल्ला भट्टी वाले का यशोगान करता है, जिसने दो अनाथ कन्याओं, सुंदरी-मुंदरी' की जबरन होने वाली शादी को रुकवाकर व उनकी जान बचाकर उनकी यथासंभव जंगल में आग जलाकर और कन्यादान के रुप में केवल एक सेर शक्कर देकर शादी की थी।

बच्चों की टोलियां जिनमें अधिकतर लड़के होते हैं, उक्त गीत गाकर लोहड़ी माँगते हैं और यदि कोई लोहड़ी देने में आनाकानी करता है तो ये मसख़रे बच्चे उनकी इस तरह ठिठोली भी करते हैं:

'हुक्के उत्ते हुक्का ए घर भुक्का!'

लड़कियां निम्न गीत गाकर लोहड़ी मांगती हैं:

'पा नी माई पाथी तेरा पुत्त चढेगा हाथी हाथी

उत्ते जौं तेरे पुत्त पोत्रे नौ!

नौंवां दी कमाई तेरी झोली विच पाई

टेर नी माँ टेर नी

लाल चरखा फेर नी!

बुड्ढी साँस लैंदी है

उत्तों रात पैंदी है

अन्दर बट्टे ना खड्काओ

सान्नू दूरों ना डराओ!

चारक दाने खिल्लां दे

पाथी लैके हिल्लांगे

कोठे उत्ते मोर सान्नू

पाथी देके तोर!

इसके अतिरिक्त भी लड़कियां विभिन्न बधाई गाती हैं:

'कंडा कंडा नी लकडियो

कंडा सी

इस कंडे दे नाल कलीरा सी

जुग जीवे नी भाबो तेरा वीरा नी,

पा माई पा,

काले कुत्ते नू वी पा

काला कुत्ता दवे वदाइयाँ,

तेरियां जीवन मझियाँ गाईयाँ,

मझियाँ गाईयाँ दित्ता दुध,

तेरे जीवन सके पुत्त,

सक्के पुत्तां दी वदाई,

वोटी छम छम करदी आई।'

यदि अपेक्षाकृत लोहड़ी नहीं मिलती या कोई लोहड़ी नहीं देता तो लड़कियां भी अपनी नाराजगी गीत द्वारा इस प्रकार प्रदर्शित करती हैं:

'साड़े पैरां हेठ रोड, सानूं छेती-छेती तोर!'

'साड़े पैरां हेठ दहीं असीं मिलना वी नईं!'

'साड़े पैरां हेठ परात सानूं उत्तों पै गई रात!'

जैसे पंजाब में प्राय: बोलियां गाने का प्रचलन है उसी प्रकार लोहड़ी पर भी रिश्ते/रिश्तेदारों को निशाना बनाकर बोलियां कही जाती हैं जैसे मां, बाप, नाना, नानी इत्यादि से लोहड़ी लेने का निम्न लोहड़ी की बोलियां जैसे गीत गाए जाते हैं:

'कोठी हेठ चाकू गुड़ दऊ मुंडे दा बापू।'

अब तो 'पिताजी' को कुछ न कुछ देकर छुटकारा करवाना पड़ता है वरना लोहड़ी मांगने वाला गाली भी गा देता है: 'मेवा दित्ता सूक्खा पे मुंडे दा भूक्का!'

यदि मनवांछित लोहड़ी मिलती है तो मांगने वाले आभार भी जता देते हैं - 'कलमदान विच घयो जीवे मुंडे दा पियो!' इसी प्रकार अन्य रिश्तेदारों को भी लक्ष्य बनाकर निम्न प्रकार के गीत, बधाई गाई जाती है -

'कोठी उत्ते कां गुड़ दऊ मुंडे दी मां!'

इस प्रकार लोहड़ी मांगने के गीत, लक्ष्य करने को गीत, आभार जताने को गीत व यदि लोहड़ी नहीं मिलती तो अपयश हेतु गीत प्रचलित हैं।