रेशमी ए.आर.

संस्कृत की ये लोकोक्ति पुरातन काल से चली आ रही है, 'यत्रे नरयस्तु पूजयते रमंते तत्र देवता...'। जिसका मतलब है जहां औरतों को मान सम्मान मिलता है वहां भगवान का वास होता है। भारत वो देवभूमि है जहां हमने औरतों को देवी का दर्जा दिया है और उनकी पूजा भी करते हैं।

वहीं हमारे देश में ही औरतों के खिलाफ व्यभिचार, हॉरर किलिंग और दहेज के नाम पर उनकी हत्याएं सहित अन्य जघन्य अपराध आए दिन होते हैं। ये अलग बात है कि आए दिन हिंसा की शिकार होने वाली औरतों से हम हिंसक होने की उम्मीद नहीं करते हैं। सामाजित धारणा है कि औरतों का जन्म ही धाय के रूप में हुआ है और उनका काम ही देखभाल करना और प्यार देना है। यहां तक कि औरतों के बारे में इसे वैश्विक धारणा कहें तो कुछ गलत नहीं होगा। इस सोच के विरुद्ध औरतों के व्यवहार को अप्राकृतिक माना जाता है।

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हाल के दिनों में पुरुषों के खिलाफ महिलाओं के हिंसक होने का मामला सामने आ रहा है। लगातार ऐसी खबरे आईं कि अमुक महिला ने प्रेमी के साथ मिलकर पति की हत्या कर दी। एक तरह से कहें तो अपराध के मामले में भी लैंगिक समानता की ओर महिलाएँ बढ़ रही हैं। कुछ महिलावादी इसे सामान्य सामाजित व्यवहार तक करार दे रहे हैं।

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आंकड़ों और सच्चाई पर गौर करें तो हम देखते हैं कि पुरुष अपराध को अंजाम देने के मामले में महिलाओं से कहीं आगे हैं। हम ये नहीं कहते कि महिलाएं गुनाह नहीं करती हैं। महिलाएं भी जघन्य कृत्यों को अंजाम देती हैं, लेकिन ये उनके नैसर्गिक सेवा-भाव वाली छवि के विपरीत माना जाता है। लिहाजा अगर किसी महिला ने जघन्य हत्या को अंजाम दिया हो तो उसे अजीब निगाहों से देखा जाता है।

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विशेषज्ञों की मानें तो महिलाएं कई बार अपनों के साथ इस कदर हिंसक हो जाती हैं कि जघन्य तरीके से उसके खात्मे तक चैन नहीं लेती हैं। कई ऐसे आपराधिक मामले सामने आए हैं जहां महिलाओं ने लीक से हटकर क्रूरतम तरीके से हत्या की घटना को अंजाम दिया है।

हाल में तेलंगाना के नागरकर्नूल की स्वाति ने पति की जघन्य तरीके से हत्या कर दी। पति सुधाकर रेड्डी की हत्या से ही स्वाति का मन हल्का नहीं हुआ, तो उसने मृत पति के चेहरे को एसिड से जला दिया। स्वाति ने प्रेमी राजेश के साथ मिलकर इस घटना को अंजाम दिया था।

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अगले ही दिन एक अन्य महिला ज्योति के बारे में ऐसी ही खबर आई। हैदराबाद की रहने वाली ज्योति ने अपने प्रेमी नरेश और उसके दोस्तों के साथ मिलकर पति नागराजू की हत्या कर दी।

मामला यहीं खत्म नहीं हुआ। अगली घटना तो और भी चौंकाने वाली थी। गुंटूर की महिला ने पहले तो पति को खूब शराब पिलाई, इस दौरान महिला पति से लाड़ भी जताती रही। जब पति मदहोश हो गया तो उसने खाने में जहर देकर उसे खिला दिया और उसकी हत्या कर दी। महिला का हत्या के पीछे मकसद अपने प्रेमी के साथ रहना बताया जाता है।

इन घटनाओं ने समाज को झकझोड़ कर रख दिया। ममतामयी देवियों ने ये क्या किया? बुद्धिजीवी भी विचार करने लगे कि जिन महिलाओं से हम बस स्नेह की उम्मीद करते हैं, उन्होंने ऐसे जघन्य कृत्य को अंजाम किस कदर दिया?

हालांकि इन विचारों के साथ हमें अन्य पहलू पर भी सोचना होगा। घरेलू हिंसा के नाम पर घरों की चारदीवारी में महिलाओं को हर रोज काफी कुछ सहना पड़ता है। पुरुषों की क्रूरता तो घर की चारदीवारी में छिपी रह जाती है। जिस पर कभी सामाजिक या खुले तौर पर विचार नहीं किया जाता है। महिलाओं की जो छवि बनाई जाती है उसके लिहाज से उनसे उम्मीद नहीं की जाती कि वे पुरुषों के खिलाफ आवाज बुलंद करें।

ये काफी मुश्किल है कि आप समाज में हिंसक महिलाओं की पहचान कर सकें। कई बार तो ऐसी महिलाओं ने जो तकलीफें सही हैं उससे लोग सहानुभूति करते हैं। महिला अपराधकर्मियों को अक्सर समाज में अपवाद के तौर पर ही देखा जाता है।

मनोवैज्ञानिकों की मानें तो महिलाओं में हिंसक प्रवृत्ति वास्तव में पुरुषों की वजह से ही पैदा होती है। ऊपर जिन तीन आपराधिक घटनाओं का जिक्र किया गया, उनमें एक समानता ये रही कि सभी महिलाओँ ने पति की हत्या की। वजह ये कि वे अपने प्रेमियों के साथ रह सकें।

एक कैनेडियन अध्ययन के मुताबिक ज्यादातर महिलाएं जिन्होंने अपने पतियों की हत्या की हैं वे घरेलु हिंसा की शिकार नहीं थीं। न ही उनमें कोई मनोवैज्ञानिक समस्या थी। जिन महिलाओं ने पति की हत्या जैसे कृत्य को अंजाम दिया वे भीतर से काफी मजबूत थीं, क्योंकि जो कमजोर होती हैं उन्हें ही चुपचाप सहने की आदत पड़ जाती है।

किसी महिला की हत्या की प्रवृत्ति को हम अक्सर खौफनाक मानते हैं। हालांकि कई बार इस तरह का व्यवहार आत्मरक्षा का या फिर मानसिक असंतुलन की वजह से भी देखने को मिलता है।

तो जब भी कोई महिला नारीत्व की धारणा के विरुद्ध किसी हत्या को अंजाम देती हैं, तो उनके खिलाफ कठोर कार्रवाई की ही अनुशंसा समाज की तरफ से की जाती है, उन्हें क्षमा या माफी का तो सवाल ही पैदा नहीं होता है।

अमूमन महिलाओं ने पुरुषों के द्वारा ही बनाए गए नियमों में ढलना स्वीकार कर लिया है। महिलाओं की भूमिका, उनके अधिकार और दायित्व ये सब तो आदमी ही तय करते रहे हैं। जिसे स्वीकार करते हुए अधिकांश महिलाओं ने इन्हीं नियमों की लक्ष्मण रेखा में अपने को कैद कर लिया है।

लाख टके का सवाल ये है कि हत्या करने वाली महिलाओं की मानसिकता कैसी होती है? क्यों वे इस तरह की जघन्य वारदात को अंजाम देती हैं? क्या उनके भीतर कोई सुसुप्त शक्ति है जो उन्हें इस गलत काम के लिए प्रेरित करती है? महिलाएं हमेशा नियंत्रण में रहना पसंद करती हैं। महिलाओं से ही क्यों उम्मीद की जाती है कि वे अपनी प्रवृत्ति के खिलाफ व्यवहार न करें।

महिला या पुरुष, कोई भी हो, हत्या जैसा आपराधिक कृत्य क्षमा के कतई योग्य नहीं है। यहां तक कि जघन्य हत्याओं का कोई विश्लेषण या स्पष्टीकरण नहीं हो सकता है।

महिलाओं के इस हिंसक व्यवहार को लेकर आपके क्या खयाल हैं? आप अपने विचार कमेंट सेक्शन में शेयर कर सकते हैं।