नई दिल्ली : संसद की दो समितियों ने आज फिल्म पद्मावती पर उपजे विवाद का परीक्षण किया। फिल्म के निर्देशक संजय लीला भंसाली आज इनमें से एक संसदीय समिति के समक्ष पेश हुए और उन्होंने इतिहास के साथ छेडछाड किए जाने के आरोपों को खारिज किया।

भंसाली ने कहा कि यह एक काल्पनिक फिल्म है और 500 साल पुरानी एक कविता पर आधारित है। यह पहली बार हुआ होगा कि सेंसर बोर्ड द्वारा एक फिल्म को स्वीकृति दिए जाने से पहले किसी संसदीय पैनल ने उसपर विचार-विमर्श किया हो।

भंसाली और सेंसर बोर्ड के अध्यक्ष प्रसून जोशी, सूचना प्रौद्योगिकी पर बनी संसद की स्थायी समिति के समक्ष पेश हुए। जोशी याचिकाओं पर विचार करने वाली संसदीय समिति के समक्ष भी पेश हुए।

बैठक में मौजूद एक सांसद ने बताया कि सूचना और प्रसारण मंत्रालय से जुडे मुद्दों पर विचार करने वाली आईटी पर बनी स्थायी समिति ने भंसाली को लिखित में जवाब देने के लिए दो हफ्ते का समय दिया है। इन दोनों समितियों की अध्यक्षता भाजपा के सांसद कर रहे थे।

आईटी पर बने पैनल के सदस्यों के साथ करीब तीन घंटे चली लंबी बातचीत के दौरान भंसाली ने कहा कि फिल्म काल्पनिक है और सूफी कवि मलिक मुहम्मद जायसी की कविता पद्मावत पर आधारित है जो वर्ष 1540 के आस-पास लिखी गई थी

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सांसद ने बताया कि भंसाली की यह प्रतिक्रिया समिति के कुछ सदस्यों द्वारा यह पूछे जाने के बाद आई कि इतिहास से घटनाओं और पात्रों का चित्रण करने वाली फिल्म को काल्पनिक कैसे कहा जा सकता है।

सांसद ने बताया कि एक अन्य सदस्य ने भंसाली से पूछा कि क्या यह इतिहास के साथ छेडछाड करना नहीं हैं। भंसाली ने कहा कि यह विवाद अफवाहों के कारण हुआ है। सूत्रों ने बताया कि सदस्यों ने भंसाली से पूछा कि फिल्म को मीडिया के कुछ वर्गों को क्यों दिखाया गया और जानना चाहा कि क्या ऐसा सेंसर बोर्ड को प्रभावित करने के लिए किया गया था।

एक सदस्य ने कहा, आपने कैसे मान लिया कि फिल्म एक दिसंबर को रिलीज हो जाएगी जबकि आपने 11 नवंबर को सीबीएफसी को आवेदन भेजा था? सिनेमैटोग्राफी अधिनियम के मुताबिक किसी फिल्म के लिए प्रमाणपत्र जारी करने से पहले सीबीएफसी 68 दिन ले सकती है।

सूत्रों ने बताया कि कुछ सदस्यों ने जानना चाहा कि क्या विवाद पैदा करना फिल्म के प्रचार का एक तरीका है। पैनल ने कहा कि सोशल मीडिया समेत मुख्यधारा की मीडिया जारी विवाद के कारण फिल्म को काफी तरजीह दे रही है।

सूत्रों ने बताया कि कुछ सदस्यों ने यह भी दावा किया कि भंसाली की फिल्म कुछ समुदायों को निशाना बनाने वाली प्रतीत होती है जिस कारण तनाव पैदा हुआ।

उन्होंने बताया कि पैनल ने भंसाली से पूछा कि क्या वह अपनी फिल्म में जौहर को बढावा देना चाहते हैं वह भी ऐसे समय में जब देश में सती प्रथा प्रतिबंधित है. जौहर राजस्थान की एक प्रथा थी जिसमें महिलाएं खुद को आग में झोंक देती थीं।

सेंसर बोर्ड अध्यक्ष प्रसून जोशी याचिकाओं की सुनवाई करने वाली संसदीय समिति के समक्ष पेश हुए और उन्होंने कहा कि फिल्म को अभी तक मंजूरी नहीं दी गई है और वह इसके लिए विशेषज्ञों से राय-मशविरा करेंगे।

केंद्रीय फिल्म प्रमाणन बोर्ड के अध्यक्ष जोशी ने पैनल को बताया कि उन्होंने अब तक फिल्म नहीं देखी है। बैठक में मौजूद एक सदस्य ने जोशी के हवाले से कहा कि फिल्म प्रमाणन की प्रक्रिया जारी है।

इसके बाद जोशी आईटी पर संसद की स्थायी समिति के समक्ष भी पेश हुए जिसकी अध्यक्षता भाजपा के अनुराग ठाकुर कर रहे थे। सदस्यों में आज भाजपा के वरिष्ठ नेता लालकृष्ण आडवाणी और कांग्रेस सांसद राज बब्बर मौजूद थे।

समिति की अध्यक्षता करने वाले वरिष्ठ भाजपा नेता भगत सिंह कोश्यारी के अलावा भाजपा के दो सांसद ओम बिडला और सी पी जोशी भी पैनल में मौजूद थे जिन्होंने इस मुद्दे पर याचिका पेश की थी।

विभिन्न राजपूत संगठनों और नेताओं ने राजपूत महारानी पद्मिनी और सुल्तान अलाउद्दीन खिलजी के बीच एक रोमांटिक दृश्य फिल्माकर फिल्म में इतिहास से छेडछाड करने का आरोप लगाया है लेकिन फिल्म निर्माता इस दावे को लगातार खारिज करते रहे हैं। इतिहासकारों की इस बारे में अलग-अलग राय है कि क्या पद्मिनी वास्तव में थीं।

दीपिका पादुकोण, शाहिद कपूर और रणवीर सिंह अभिनीत यह फिल्म पहले एक दिसंबर को रिलीज होनी थी लेकिन फिल्म निर्माताओं ने सीबीएफसी से सर्टिफिकेट ना मिलने तक फिल्म की रिलीज टाल दी। उन्होंने हाल ही में 3डी सर्टिफिकेट के लिए आवेदन किया था। इस साल की शुरआत में फिल्म के सेट को दो बार जयपुर और कोल्हापुर में तहस-नहस कर दिया गया था और फिल्म के निर्देशक भंसाली के साथ करणी सेना के सदस्यों ने बदसलूकी की थी।

करणी सेना और भाजपा के कुछ धडे फिल्म की कडी आलोचना कर रहे हैं। फिल्म पर कई भाजपा शासित राज्यों में पहले ही रोक लगाई जा चुकी है।