हर साल आषाढ़ के शुक्ल पक्ष की पूर्णिमा को गुरुपूर्णिमा कहते हैं और इस दिन शिष्य अपने गुरुओं या फिर भक्त अपने ईष्ट देवों की पूजा करते हैं। इस दिन को व्यास पूर्णिमा भी कहा जाता है।

इस खास दिन के मौके पर पुरातन काल से ही गुरु की पूजा का विधान है। प्राचीन काल में जब गुरुकुल की व्यवस्था थी तभी से आज के दिन गुरुओं की पूजा का चलन शुरू हुआ। मान्यता है कि सबसे पहले ये परंपरा गुरु वेद व्यास के आश्रम से शुरू हुई, तभी इसे व्यास पूर्णिमा भी कहा जाता है।

इस दिन शिष्य गुरु का पूजन करके यथा शक्ति उन्हें दक्षिणा भी देता है। वेदों का ज्ञान देने वाले आदि गुरु वेद व्यास का आज के दिन विशेष पूजन होता है।

आज के दिन गुरु भी अपने शिष्यों की उज्जवल भविष्य की कामना करते हुए उन्हें आशीर्वाद देते हैं। कुछ विद्वानों का मत है कि आज के दिन न सिर्फ गुरुओं की पूजा होनी चाहिए। बल्कि अपने माता पिता को प्रथम गुरु मानकर उनका भी पूजन किया जाना चाहिए। यहां तक कि बड़े भाई बहन का पूजन करके भी आज के दिन उनसे आशीर्वाद लेना शुभ माना जाता है।

हालांकि आघुनिकता के इस दौर में गुरु पूर्णिमा की बजाय टीचर्स डे और मदर्स डे मनाने का चलन जोड़ पकड़ रहा है। जबकि पुरातन काल से चली आ रही भारतीय संस्कृति को लोग भूलते जा रहे हैं।

देश के कुछ ख्याति प्राप्त मंदिरों खासकर महाराष्ट्र के शिरडी साईं मंदिर व अन्य मंदिरों में आज श्रद्धालुओं की खासी भीड़ देखी जा रही है।