नई दिल्ली: सुप्रीम कोर्ट ने मजीठिया वेज बोर्ड को लेकर पत्रकारों और अखबार मालिकों के बीच विवाद में कर्मचारियों के हक में फैसला दिया है। सुप्रीम कोर्ट ने सभी प्रिंट मीडिया समूहों को मजीठिया वेज बोर्ड की सिफारिशों के मुताबिक वेतनमान तय करने का निर्देश दिया है। जस्टिस रंजन गोगोई की अध्यक्षता वाली बेंच मामले में सुनवाई की। मजे की बात ये कि संविदा (कॉन्ट्रैक्ट) पर कार्यरत कर्मचारियों से भी कोई भेदभाव नहीं करने का निर्देश दिया गया है।

इस मामले में 'इंडियन फेडरेशन ऑफ वर्किंग जर्नलिस्ट' एक पक्षकार है जिसने अखबार मालिकों के खिलाफ अवमानना याचिका दायर की थी। इससे पहले सुनवाई में SC ने 3 मई तक फैसला सुरक्षित रखा था।

सुप्रीम कोर्ट के आदेश के मुताबिक अखबार मालिकों को कर्मचारियों को 11 नवंबर 2011 से ही मजीठिया वेज बोर्ड द्वारा तय वेतन और भत्तों का भुगतान करना होगा। वहीं मार्च 2014 तक का बकाया वेतन-भत्ता चार किश्तों में एक साल के भीतर ही देना होगा।

बता दें कि मजीठिया वेज बोर्ड ने प्रिंट मीडिया में कार्यरत कर्मचारियों की सैलरी इजाफा से संबंधित सिफारिशें दी थी। जिस पर अखबार मालिकों ने वित्तीय बोझ का हवाला देकर मजीठिया बोर्ड के कहे के मुताबिक सैलरी देने से इनकार किया था। अखबार मालिकों ने तो यहां तक कहा कि आर्थिक बोझ के चलते कई अखबारों के बंद होने का खतरा है।

बता दें कि प्रिंट मीडिया से जुड़े पत्रकारों और गैर-पत्रकारों के वेतन भत्तों की समीक्षा करने के लिए कांग्रेस की तत्कालीन यूपीए सरकार ने 2007 में मजीठिया वेतन बोर्ड का गठन किया था। जिसने चार साल बाद अपनी रिपोर्ट सौंपी थी, जिसे केंद्रीय कैबिनेट ने स्वीकार भी कर लिया था। केंद्र सरकार ने इसे 11 नवंबर 2011 को अधिसूचित किया था।

केंद्र सरकार के तमाम प्रयासों के बावजूद अखबार मालिक नया वेतनमान देने से आनाकानी करते रहे। इसके बाद बोर्ड की सिफारिशों को अदालत में चुनौती दी गई। इससे पहले भी फरवरी 2014 में सुप्रीम कोर्ट ने वेज बोर्ड की सिफारिशों को लागू करने की हिदायत दी थी। अब देखना है कि वेज बोर्ड की सिफारिशों और सुप्रीम कोर्ट के ताजा फैसले के आलोग में पत्रकारों को कितना फायदा मिल पाता है।