सीमित साधनों और बजट की अभिषेक सक्‍सेना निर्देशित ‘फुल्‍लू’ आरंभिक चमक के बाद क्रिएटिविटी में भी सीमित रह गई है। नेक इरादे से बनाई गई ये फिल्‍म एकआयामी होकर रह जाती है। इस वजह से फिल्‍म का संदेश प्रभावी तरीके से व्‍यक्‍त नही हो पाता। महिलाओं के बीच सैनीटरी पैड की जरूरत पर जोर देती यह फिल्‍म एक दिलचस्‍प व्‍यक्ति के निजी प्रयासों तक मिटी रहती है। लेखक ने कहानी बढ़ाने के क्रम में तर्क और कारण पर अधिक गौर नहीं किया है। प्रसंगों में तारतम्‍य भी नहीं बना रहता।

कहानी

यह कहानी गांव के रहने वाले फुल्लू(शारिब अली हाशमी) की है जो अपनी मां और बहन के साथ गांव में रहता है। फुल्लू की एक खासियत है कि वह गांव की रहने वाली हर एक महिला के लिए जब भी शहर जाता है तो उनकी जरूरत का सामान जरूर लेकर आता है, फुल्लू निकम्मा है कोई काम वाम नहीं करता जिसे देखते हुए उसकी मां ने उसकी शादी बिगनी(ज्योती सेठी) से करा दी है लेकिन शादी के बाद भी फुल्लू के क्रियाकलापों में कोई बदलाव नहीं आता है वह हमेशा की तरह शहर आया जाया करता है लेकिन एक बार जब वह मेडिकल स्टोर पर जाकर के वहां की डॉक्टर साहिबा से महिलाओं की माहवारी के पैड के बारे में समझता है तो उसे आभास होता है कि उसके घर में रहने वाली महिलाएं यानी की मां बहन और पत्नी और साथ ही साथ उसके गांव की महिलाओं के लिए भी कम पैसों में पैड की सुविधा उपलब्ध होनी चाहिए। किसी कारणवश फुल्लू शहर जा कर के पैड बनाना सीखता है लेकिन जब यह सीख कर वापस गांव आता है तो उसके घरवाले ही उसकी इन बातों से खुश नहीं रहते हालांकि फुल्लू की बीवी को यकीन रहता है कि उसका पति एक ना एक दिन अपने मंसूबे में कामयाब होगा, कहानी में ट्विस्ट टर्न आते हैं और आखिरकार इसको अंजाम मिलता है जिसे जानने के लिए आपको फिल्म देखनी पड़ेगी।