रवि वल्लूरी

(लेखक , उत्तर मध्य रेलवे, इलाहाबाद में बतौर प्रिंसिपल चीफ ऑपरेशन्स कार्यरत हैं। ओरछा और बुंदेलखंड से जुड़ा इनका संस्मरण पेश है)

बुंदेलखंड: आधिकारिक शासकीय दौरे पर मुझे ललितपुर पावर जेनरेशन यूनिट (LPGU) देखने का मौका मिला। उत्तर प्रदेश के बुंदेलखंड प्रक्षेत्र में यह ताप विद्युत उत्पादन इकाई स्थित है। बुंदेलखंड का समृद्ध इतिहास और इसकी समृद्ध विरासत के चलते भारत ही नहीं बल्कि विदेशों से भी लोग आकर्षित होते हैं।

इस समृद्ध विरासत को जारी रखते हुए बजाज ग्रुप और BHEL के सहयोग से ललितपुर जिले में सुपर थर्मल पावर स्टेशन की स्थापना की गई। जिसकी कोयला की खपत और जरूरतों को नॉर्थ सेंट्रल रेलवे इलाहाबाद हेडक्वार्टर की तरफ से पूरा किया जाता रहा है।

ललितपुर पावर प्लांट
ललितपुर पावर प्लांट

हम ललितपुर पावर जेनरेशन यूनिट की बात कर रहे थे। ऐतिहासिक झांसी से सटे इस ऊर्जा उत्पादन इकाई से 1,980 मेगावाट ऊर्जा का उत्पादन होता है। कंपनी की तीन इकाइयों में प्रत्येक की इकाई 600 मेगावाट से अधिक की है। जो इलाके की ऊजा जरूरतों के साथ ही कुल ऊर्जा उत्पादन में अहम योगदान देता है।

करियर के दौर में मुझे कई ऊर्जा सयंत्रों को दखने का मौका मिला। इस अकेले ललितपुर संयंत्र में मैं कम्प्यूटर स्क्रीन पर कोयले को भट्टी में झोंकता हुआ देख पा रहा था। वहां के वातावरण का भान मैं कर पा रहा था। साथ ही गलन प्रक्षेत्र (मेल्टिंग जोन) के तापमान का सहज ही कम्प्यूटर स्क्रीन के जरिए अंदाजा लगा पा रहा था।

ललितपुर पावर प्लांट
ललितपुर पावर प्लांट

स्क्रीन पर आग के गोलों को देखना अपने आप में किसी कौतूहल से कम नहीं था। करोड़ों किलोमीटर दूर सितारों पर टनों ऊर्जा के दहकने का अहसास करा रही थी ललितपुर पावर प्लांट की भट्टी।

बुंदेलखंड का अनूठापन

ओरछा के इस इलाके में बहुत कम लोगों को पता होगा कि भगवान राम की खास अवस्था में यहां पूजा जाता है। जी हां, यहां अकेला मंदिर है जिसमें भगवान राम की मूर्ति को राजा के रूप में पूजा जाता है। मंदिर में दूर दराज से बड़ी संख्या में श्रद्धालु पहुंचते हैं। मंदिर में प्रतिस्थापित भगवान राम की मूर्ति के एक तरफ तलवार रखी है, जबकि दूसरी ओर उनका राजकीय चिह्न।

मजेदार बात ये है कि हर रोज किसी राजा की ही तरह भगवान राम को ‘गार्ड ऑफ ऑनर’ दिया जाता है। ये परंपरा बीते चार सौ सालों से जारी है। लोगों की मान्यता है कि इस इलाके में भगवान राम आज भी राज करते हैं। दिन भर में चार बार गार्ड ऑफ ऑनर देने के लिए यहां बकायदा पुलिसकर्मियों की तैनाती की गई है।

ओरछा का राम मंदिर
ओरछा का राम मंदिर

वहीं ओरछा किला का विहंगम क्षेत्र नगाड़ा आर्किटेक्चर का अद्भुत नमूना पेश करता है। इलाके में कई ऐतिहासिक इमारतें दिखती है, जिसमें शामिल है किले, राजमहल, मंदिर और अन्य भव्य इमारतें।

ओरछा का अद्भुत किला और इसके आसपास की भव्य इमारतें बुंदेला राजपूतों की सम्प्रभुता और वैभव को दर्शाता है। इस राजवंश की स्थापना सोलहवीं शताब्दी में राजा रुद्र प्रताप सिंह ने किया था। जिसके बाद इस वंश में एक से बढ़कर एक शूरवीर राजा पैदा हुए, जिन्होंने इलाके की समृद्धि में बड़ा योगदान दिया।

झांसी

झांसी की ओर रुख करने के बाद इलाके का पहला आकर्षण यहां का विशालकाय किला देखने को मिलता है। शाम घिरने के साथ धुंधलाती रौशनी कहीं न कहीं हमें झांसी के इतिहास की याद दिलाती है। किले की शान और इसकी भव्यता हमें वास्तविकता से कल्पना लोक की ओर ले जाती है।

किले में लाइट और साउंड के जरिए घंटे भर का कार्यक्रम हमें झांसी के इतिहास से परिचित कराता है। ओमपुरी की आवाज में किले के भीतर कई अहम स्थानों का हमें परिचय मिलता है जो झांसी की शौर्यपूर्ण गाथा का बखान करती है। भारत की प्रथम स्वतंत्रता संग्राम की गाथा इस किले में रची बसी है।

झांसी का किला
झांसी का किला

ओरछा राजा और बुंदेला राजपूत प्रमुख वीर सिंह जी देव बुंदेला ने सन् 1613 में झांसी के किले का निर्माण करवाया था। हालांकि समय के अंतराल के साथ सत्ता का हस्तांतरण होता रहा। समय के आखिरी पड़ाव के साथ राजा गंगाधर राव और उनकी पत्नी महारानी लक्ष्मीबाई के साथ इस किले का ऐतिहासिक नाता जुड़ गया।

अदम्य साहस और लोहे ही दमखम रखने वाली सात्विक महिला रानी लक्ष्मी बाई की गाथा इससे जुड़ी है। दंपति ने दुर्भाग्यवश अपने चार साल के लाडले और वंश का चिराग दामोदर राव को खो दिया। सत्ता को सुरक्षित रखने और वंश परंपरा को बढ़ाने के लिए दंपत्ति ने आनंद राव (दामोदर राव के चचेरे भाई) को गोद ले लिया। रानी लक्ष्मीबाई के पति गंगाधर राव की मौत के बाद अंग्रेजों ने चाल चली। अंग्रेजी गवर्नर जनरल लॉर्ड डलहौजी ने गोद लिए बच्चे को वंशानुगत शासन के लिए अमान्य करार दे दिया।

झांसी की रानी लक्ष्मीबाई
झांसी की रानी लक्ष्मीबाई

इसके बाद शुरू हुआ झांसी को अंग्रेजों और ईस्ट इंडिया कंपनी के चंगुल से मुक्त करने की कवायद। जिसकी अगुवा बनीं झांसी की रानी लक्ष्मीबाई, जिन्होंने साहसपूर्ण तरीके से न सिर्फ नेतृत्व किया बल्कि बहादुर शाह जफर सहित विभिन्न रजवाड़ों को इस लड़ाई का हिस्सा बनने के लिए प्रेरित किया।

रानी ने सन् 1857 में स्वतंत्रता की ल़ड़ाई का बिगुल फूंक दिया। इस महासंग्राम में 18 जून 1858 आते आते झांसी बुरी तरह घायल हो चुकी थी। रानी ने देश में आजादी की अलख जगा दी थी जिसके परिणामस्वरूप 15 अगस्त 1947 को देश को आजादी मिली। रानी झांसी की महानता और अदम्य साहस का सम्मान करते हुए नेताजी सुभाष चंद्र बोस ने भी अपनी इंडियन नेशनल आर्मी में लक्ष्मीबाई रेजिमेंट बनाया था।