बसपा सुप्रीमो मायावती अपने राजनीतिक जीवन के सबसे कठिन दौर से गुजर रही हैं। पिछले 20 वर्षो में दलित एकजुटता से शुरू हुई उनकी राजनीति आगे बढ़ते हुए बहुजन गोलबंदी से होते हुए सर्वजन तक सफल ढंग से फैलती गई, किंतु अब इसमें ठहराव आ गया है। ‘सर्वजन’ को जोड़ने के उनके प्रयास अब ‘दलित आधारमत’ बचाने की जद्दोजहद तक सिमट गए हैं।

माना जा रहा है कि पिछले चुनावों में दलितों के एक वर्ग ने उनसे अलग होकर भाजपा को मत दिया। इसे विश्लेषित करने की जरूरत है कि ऐसा क्यों हुआ?

संबंधित खबरें..

मैं बसपा में हूं और बसपा में ही रहूंगा : रामवीर

ऐसे अपने संगठन को फिर मजबूत करने जा रही हैं मायावती, यह है नया एक्शन प्लान

कांशीराम एवं मायावती की राजनीति विभिन्न जातीय अस्मिताओं के महागठजोड़ पर टिकी रही है। विभिन्न दलित एवं पिछड़ी जातियों की जातीय अस्मिताओं को सम्मान एवं उन्हें राजनीतिक भागीदारी देना उनकी राजनीति का मूल रहा है। जातीय अस्मिता की चाह भारतीय समाज की जातियों की एक महती अपेक्षा रही है, किंतु पिछले दिनों दलित एवं पिछड़े समूहों में राज्य द्वारा प्रदत्त विकास के लाभ से अनेक सामाजिक स्तर सृजित हुए हैं।

इसे भी जरूर पढ़ें..

मायावती ने खोला राज..क्यों नहीं गई योगी के शपथ ग्रहण समारोह में..!

सोनिया, ममता की रजामंदी के बाद मायावती को लालू ने किया फोन और कहा...!

लालू की पहल और इस गणित से अगले साल राज्यसभा में जाएंगी बहन मायावती..!

विविध स्तर की इन दलित एवं पिछड़ी जातियों में भूमंडलीकरण एवं जनतांत्रिक राजनीति के एक्सपोजर ने अनेक ‘आकांक्षी समुदाय’ उभारे हैं। इन समूहों की विकास की आकांक्षा एवं राजनीतिक प्रतिनिधित्व की इच्छा में लगातार तब्दीली हो रही है।

नवीन टेक्नोलॅाजी, जनतांत्रिक राजनीति, विकास की चाह एवं धार्मिक स्पेस की प्राप्ति उनके ‘एस्पीरेशन’ का मूलाधार है। इस ‘एस्पीरेशन’ में भी मीडिया, राज्य और बाजार के प्रभाव से नए परिवर्तन हो रहे हैं। वहीं मायावती जी की भाषा आज भी मात्र जातीय एवं धार्मिक अस्मिताओं के गठजोड़ निर्मित करने तक ही सीमित है।

आज का दलित समाज लगातार बदल रहा है। उसमें नए परिवर्तन आ रहे हैं। पहले उसे ‘आधारभूत अस्मिता’ की जरूरत थी। आज अस्मिता की चाह के प्रारूप भी बदल रहे हैं और उनका विस्तार भी हो रहा है। अस्मिता की यह चाह विकास, बाजार एवं धर्म के गठजोड़ से नया शक्ल ले रही है। मायावती को भी इस बदलते दलित समाज की बदलती आकांक्षा को समझते हुए अपनी नई राजनीतिक भाषा विकसित करनी होगी। नेता जो बोलता है और जनता जो सोचती या चाहती है उसमें कहीं न कहीं साम्य पैदा करके ही एक सफल जनतांत्रिक गोलबंदी की राजनीति विकसित होती है।

दलित सामाजिक एवं जातीय समूहों में विकास के साथ बहुस्तरीयता तीव्र गति से विकसित होने लगी है। एक तरफ दलित समूहों में भी एक क्रीमी लेयर एवं मध्य वर्ग विकसित होने लगा है तो दूसरी तरफ आधारतल पर गरीब एवं कमजोर दलित समूहों का बड़ा वर्ग जनतंत्र के दरवाजे से आजादी के 70 साल बाद भी काफी दूर खड़ा है। मायावती को इन बहुस्तरीय दलित आकांक्षा के अंतर को समझते हुए अपनी नई राजनीतिक भाषा में जगह देनी होगी। मायावती जैसे अपनी राजनीति के प्रारंभिक दिनों में जनता के लिए सुलभ थीं वैसी ही सुलभता उन्हें अपने में फिर विकसित करनी होगी। उन्हें अपनी राजनीति को चुनावी रैलियों से निकाल कर कवि धूमिल के शब्दों में ‘संसद से सड़क तक’ फैलाना होगा।

राजनीति को मात्र चुनावी कार्य तक सीमित करने के स्थान पर उसे जनता के दुख दर्द दूर करने की लड़ाई से जोड़ना होगा। मायावती को यह समझना होगा कि जनतंत्र सिर्फ ‘राज-काज’ की राजनीति न होकर ‘भावनात्मक जनतंत्र’ भी है। राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ की दलित समूहों में बढ़ती पैठ ने बसपा जैसी राजनीतिक शक्तियों के सामने बड़ी चुनौती पैदा की है। विकास की चाहत, धार्मिक सम्मान और जातीय अस्मिता की चाह को हिंदू अस्मिता की चाह के साथ जोड़ने से दलितों का एक वर्ग भाजपा एवं आरएसएस केप्रयासों के प्रति आकर्षित हुआ है।

आरएसएस ने समरसता अभियानों से दलितों को अपने से जोड़ने का जो प्रयास किया है उसके तहत छुआछूत से मुक्ति और स्वाभिमान जागरण पर जोर दिया जाता है। दलित अस्मिता के इतिहास को हिंदू समाज के अभिन्न अंग के रूप में प्रस्तुत कर दलितों को संघ के अभियानों के प्रभाव में लाया जाता है। इसके अलावा भाजपा दलित जातियों में जो बसपा की राजनीति में प्रभावी नहीं हैं उन्हें अपने संगठन, पार्टी एवं चुनाव में जगह देकर अपने से जोड़ रही है। उत्तर प्रदेश में 40 से अधिक दलित जातियां हैं जिनकी बसपा की राजनीति में अहमियत नहीं दिखती। संघ और भाजपा ने ऐसे छोटे-छोटे दलित समूहों को अपने सामाजिक एवं राजनीतिक कार्यक्रमों से जोड़ा है। आने वाले दिनों में मायावती को इन छोटे-छोटे दलित सामाजिक समूहों की अपने पक्ष में गोलबंदी की प्रतिद्वंद्विता से गुजरना पड़ेगा।

इधर दलित सिविल सोसाइटी के अनेक छोटे-छोटे संगठन अंबेडकर के सिद्धांतों को आगे कर दलितों के बीच सक्रिय हुए हैं। भीम सेना जैसे संगठन आक्रामक दलित प्रतिरोध की राजनीति को अनेक सामाजिक एवं विकास परक कार्यक्रमों से जोड़कर दलितों के बीच प्रसारित कर रहे हैं। मायावती की दलित गोलबंदी की राजनीतिक भाषा ‘मध्यम प्रतिरोध’ के राजनीतिक भाव से बनी है। ‘सर्वसमाज’ की राजनीति के लिए यह जरुरी भी है, किंतु ऐसे दलित संगठन जिस प्रकार के आक्रोश एवं उग्रता की राजनीतिक भाषा गढ़ रहे हैं, उन्हें मायावती को अपनी राजनीतिक भाषा के माध्यम से या तो निरस्त करना होगा या फिर उन्हें अपनी राजनीतिक भाषा में समाहित करना होगा ।

मायावती के लिए समस्या सिर्फ दलित जनमत को अपने साथ जोड़े रखने की ही नहीं, वरन बहुजन समाज की अन्य जातियों के साथ अपने रिश्ते को भी फिर से परिभाषित करने की भी है। बसपा आंदोलन के प्रारंभिक दौर में कांशीराम की मौजूदगी में कुर्मी समाज का एक बड़ा हिस्सा भी उससे जुड़ा था। सोनेलाल पटेल जैसे अनेक कुर्मी नेता तब बसपा में ही थे। इसी तरह कोइरी, कुशवाहा, काछी, चौरसिया आदि अनेक ओबीसी जातियों का पढ़ा लिखा तबका बसपा के जरिये ही अपने आगे बढ़ने की राजनीति की झलक पाता था। ये समूह धीरे-धीरे बसपा आंदोलन से अलग होते गए। खतरा यह है कि बसपा धीरे-धीरे अपने दलित आधार में ही सिमट कर न रह जाए।

बसपा एक आंदोलन थी। आंदोलन से वह एक राजनीतिक दल बनी। खतरा यह है कि वह फिर से ‘दलित पार्टी’ में न बदल जाए। अगर ऐसा होता है तो यह भारतीय जनतांत्रिक राजनीति का दुर्भाग्य ही होगा। मायावती को इन खतरों को निरस्त करते हुए अपनी नई राजनीति का मार्ग तलाशना होगा। देखना है कि आने वाले दिनों में यह कैसे संभव होता है? मायावती को बदलते समाज एवं समय की गति के साथ अपने संगठन, अपनी राजनीतिक भाषा में परिवर्तन करना होगा, तभी शायद वह आगामी आम चुनाव में अपनी प्रभावी उपस्थिति साबित कर पाएंगी।

(लेखक गोविंद बल्लभ पंत सामाजिक विज्ञान संस्थान में समाज वैज्ञानिक हैं)