कांग्रेस के उपाध्यक्ष राहुल गांधी की चीन के राजदूत से मुलाकात निश्चय ही गहरे विवाद का विषय है। विवाद हुआ भी लेकिन श्री अमरनाथ यात्रियों पर आतंकवादी हमले के कारण यह उतना तूल नहीं पकड़ सका जितना पकड़ सकता था। वास्तव में राहुल गांधी के इस कदम पर देश के ज्यादातर विवेकशील लोग हतप्रभ हैं।

ऐसे समय जब दोनों देशों के बीच तनातनी ही नहीं है, चीन की ओर से 1962 की याद दिलाने से लेकर ज्यादा लाशें भारत की बिछेंगी जैसी बातें तक कही जा रही हैं, पूरे देश में चीन के खिलाफ गुस्सा है.... उसमें भारत का कोई विपक्षी नेता जाकर चीन के राजदूत से मिले तो देश हतप्रभ होगा ही। कांग्रेस देश की सबसे ज्यादा समय तक शासन करने वाली पार्टी है। उसे ऐसे मामलों की संवेदनशीलता का अहसास होना चाहिए।

राहुल गांधी के मिलने का मतलब कांग्रेस की सोच पर संदेह होना है। हालांकि कांग्रेस के कुछ नेताओं का इसके गहरे नकारात्मक संबंधों का अहसास था तभी तो उन्होंने आरंभ में इस मुलाकात से ही इन्कार किया लेकिन सच सामने आने के बाद ऐसे इन्कार का कोई अर्थ नहीं रह गया था।

आखिर राहुल गांधी चीनी राजदूत लुओ झाओहुई से मिलकर क्या जानना चाहते थे? कांग्रेस ने इस घटना पर पैदा होने वाले बवाल को कम करने के लिए कहा कि यह राजनयिकों से होने वाली सामान्य मुलाकात का हिस्सा था।

कांग्रेस के अनुसार राहुल गांधी ने भारत में भूटान के राजदूत और पूर्व राष्ट्रीय सुरक्षा सलाहकार शिवशंकर मेनन से भी मुलाकात की थी। पार्टी प्रवक्ता मनीष तिवारी ने कहा कि सार्वजनिक जीवन में कांग्रेस उपाध्यक्ष के नाते राहुल राजनयिकों से लेकर तमाम लोगों से मिलते-जुलते हैं। निस्संदेह मिलते-जुलते रहते हैं और आम मुलाकातों में कोई समस्या भी नहीं है। किसी ने शिवशंकर मेनन से मुलाकात पर प्रश्न नहीं उठाया है। वे वर्तमान सुरक्षा

सलाहकार अजीत डोभाल से मिलते तब भी प्रश्न नहीं उठता। किंतु वर्तमान समय में चीन के राजदूत से मुलाकात को किसी दृष्टि से सामान्य घटना नहीं माना जा सकता।

वर्तमान भारत चीन तनाव को 1962 के बाद का सबसे बड़ा तनाव माना जा रहा है। चीन भारत को रणनीतिक रुप से कमजोर करने के लिए चुंबी घाटी में स्थित भूटान के डोकलाम इलाके में जबरन सड़क बनाने पर अड़ा है। यह भूटान के जमीन को हड़पना है। भारत द्वारा इसका विरोध किया जाना स्वाभाविक है। भारत के जवानों ने उसको सड़क बनाने से रोक दिया तभी से वह आग बबूला है और अपने समाचार माध्यमों से जितनी धमकी दे सकता है दे चुका है। ऐसे में आप वहां के राजदूत से मिलकर क्या जानना चाहते थे? क्या चीन का राजदूत अपने देश की नीति से अलग कोई बात कहेगा? वैसे भी भारत में रहते हुए चीन के राजदूतों ने भारत विरोधी बयान देने से कभी परहेज नहीं किया है। अरुणाचल को उसके ज्यादातर राजदूत अपना क्षेत्र बता चुके हैं।

राहुल गांधी का जवाब देखिए। वे कहते हैं कि महत्वपूर्ण मुद्दों पर जानकारी लेना मेरा काम है। अगर सरकार चीनी राजदूत से मेरी मुलाकात को लेकर इतनी ही चिंतित है, तो उसे इस बात का जवाब भी देना चाहिए कि सीमा पर विवाद के रहते तीन मंत्री क्यों चीन की यात्रा पर गए? इस जवाब को क्या कहेंगे? सरकार की एक भूमिका होती है। तनाव के बावजूद यदि कोई कार्यक्रम पहले से तय है तो जब तक आर-पार की स्थिति नहीं बनती आम यात्राओं और कार्यक्रमों को रोकने का कोई कारण नहीं होना चाहिए।

भारत ने अपनी ओर से चीन को सड़क बनाने से रोक दिया और उसके बाद वह यह दिखाना चाहता है कि हम चीन से सामान्य संबंध बनाए रखे हुए हैं। इसलिए मंत्रियों की यात्राओं या फिर प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी का हैम्बर्ग में चीनी राष्ट्रपति शि जिनपिंग से अनौपचारिक मुलाकात को अन्यथा नहीं लिया जा सकता। इसका यह अर्थ नहीं कि कोई विपक्षी नेता चीनी राजदूत से मिले यह जानने के लिए कि मसला क्या है।

देश में सवाल उठा रहा है कि क्या राहुल को इन मामलों पर अपनी सरकार पर विश्वास नहीं है? क्या उन्हें लगता है कि सरकार के किसी मंत्री, अधिकारी से ज्यादा विश्वस्त चीन का राजदूत हो सकता है? राहुल गांधी और कांग्रेस को इसका जवाब देना होगा। उनको यह बताना चाहिए कि आखिर मुलाकात का निर्णय किन परिस्थितियों में और किनके सुझावों पर किया गया? वे इससे क्या लक्ष्य पाना चाहते थे? अंततः चीनी राजदूत से बातचीत में उन्हें क्या मिला?

कांग्रेस नेता की मुलाकात शायद मीडिया में आती भी नही। लेकिन चीनी दूतावास ने अपनी साइट पर राहुल से आठ जुलाई को अपने राजदूत के मिलने की जानकारी दी। उसके बाद तूफान खड़ा होना ही था। लोगों को यह समझ ही नहीं आ रहा था कि आखिर राहुल ने ऐसा क्यों किया। जिस माकपा को चीन का समर्थक माना जाता है उसने भी इस समय ऐसा करने से परहेज किया है। तो फिर राहुल ही क्यों? जब यह सवाल उठने लगा तो कांग्रेस मीडिया विभाग के प्रमुख रणदीप सुरजेवाला ने इस खबर को ही गलत करार दे दिया। यह राहुल के बचाव में बोला गया झूठ था। लेकिन प्रश्न था कि चीनी दूतावास गलत जानकारी अपनी साइट पर क्यों देगा?

हालांकि सुरजेवाला के बयान के बाद चीनी दूतावास ने भी अपनी वेबसाइट से इस सूचना को हटा लिया। तब तक यह खबर आग की तरह फैल गई थी। इसलिए बाद में पार्टी प्रवक्ता मनीष तिवारी ने मुलाकात की पुष्टि कर दी। जाहिर है, कांग्रेस के कुछ नेताओं को भी अहसास है कि राहुल गांधी का यह कदम सही नहीं था। इसलिए उन्होंने इसे आरंभ में नकारने की ही कोशिश की। हालांकि जब उन्होंने मुलाकात की तो सरकार की खुफिया विभाग के पास तो इसकी जानकारी आई ही होगी। कांग्रेस अगर इन्कार करती तो सरकार इस खबर को जारी कर सकती थी। इसलिए कांग्रेस के सामने इन्कार का कोई विकल्प बचा ही नहीं था।

जो खबरें हैं उनके अनुसार कांग्रेस अध्यक्ष सोनिया गांधी ने इसे कदम को गलत करार देकर राहुल से नाखुशी तक जाहिर की है। हालांकि यह सब पर्दे के अंदर ही होगा। कांग्रेस अब जो भी कहे या करे, लेकिन यह सवाल सबके मन में पैदा हो रहा है कि आखिर राहुल गांधी को सलाह कौन लोग दे रहे हैं? ऐसे समय जब पूरे देश में चीन को लेकर उबाल है, एक राजनीतिक पार्टी को किस तरह की भूमिका निभानी चाहिए अगर यह अहसास भी उनके सलाहकारों को नहीं है तो फिर वे कांग्रेस को कहां ले जाएंगे इसके बारे में केवल कल्पना ही की जा सकती है।

राहुल गांधी के चीन के राजदूत से मिलने का एक संदेश यह जा रहा है कि उनको उसकी बातों पर ज्यादा विश्वास है। हालांकि ऐसा होगा नहीं। कारण, कांग्रेस के नेता भी वर्तमान सच पर नजर तो रखे ही हुए हैं। किंतु आम संदेश तो यही गया है और यह कांग्रेस के हित में नहीं है। चूंकि राहुल गांधी सोनिया गांधी के बाद पार्टी के दूसरे सबसे बड़े नेता है और भविष्य के अध्यक्ष भी, इसलिए कांग्रेस यह भी नहीं कह सकती कि यह उनका निजी फैसला था जिससे पार्टी का कोई लेनादेना नहीं। ऐसे ही इस गलती को सार्वजनिक तौर पर भी नहीं स्वीकार कर सकती।

राहुल गांधी की जगह कोई अन्य नेता होता तो कांग्रेस को इससे अपने को अलग करने में एक मिनट भी समय नहीं लगता। जैसे मणिशंकर अय्यर की कश्मीर यात्रा एवं हुर्रियत नेताओं से मुलाकात या पाकिस्तान यात्रा के दौरान अच्छे संबंधों के लिए मोदी को हटाना पड़ेगा जैसे बयान को कांग्रेस ने उनकी निजी राय बता दिया। राहुल गांधी के मामले में कांग्रेस की छटपटाहट है कि करें तो क्या करें।

लेखक...अवधेश कुमार, पांडव नगर कॉम्प्लेक्स, दिल्ली