प्रज्ञा कश्यप

नई दिल्ली : महिलाओं से संबंधित मासिक धर्म समाज में गैर-महत्वपूर्ण मुद्दा है, जिस पर कोई बात नहीं करना चाहता, लेकिन अभिनेता शरीब हाशमी की फिल्म 'फुल्लू' ने इस मुद्दे पर लोगों का ध्यान आकर्षित करने की कोशिश की है। शरीब का कहना है कि उनकी फिल्म सहज शब्दों में गंभीर संदेश देती है।

भारतीय सिनेमा में शायद पहली बार कोई फिल्म मासिक धर्म और सैनिटरी नैपकिन जैसे विषय पर बनी है, जिसे सेंसर बोर्ड ने 'ए' प्रमाणपत्र दिया है, यानी इसे केवल व्यस्क दर्शक ही देख पाएंगे।

सेंसर बोर्ड के फैसले से शरीब को कितनी निराशा हुई है, इस पर उन्होंने आईएएनएस को फोन पर बताया, "मैं इस फैसले से बहुत निराश हुआ हूं। इस फिल्म का लक्ष्य किशोरों के बीच जागरूकता फैलाना था और अब वही इस फिल्म को नहीं देख पाएंगे। आजकल टेलीविजन पर सैनिटरी नैपकिन के ढेर विज्ञापन आते हैं, जिन्हें बच्चे से लेकर हर उम्र के लोग देखते हैं, ऐसे में इस फिल्म को 'ए' सर्टिफिकेट देना मेरी समझ से परे है।"

इस मुद्दे पर बनी फिल्म में अभिनय करने में असहजता महसूस हुई? यह पूछने पर उन्होंने कहा, "मुझे असहजता तो नहीं हुई, लेकिन मेरे अंदर इस विषय को लेकर जो झिझक थी, वह दूर हो गई। मैंने यह फिल्म इसी झिझक को दूर करने के लिए की। महिला हो या पुरुष, हमारे समाज में इस विषय पर सार्वजनिक तौर कोई बात नहीं करना चाहता, जबकि यह एक सामान्य प्राकृतिक प्रक्रिया है। मैं उम्मीद करता हूं कि फिल्म देखने के बाद लोगों की भी झिझक दूर होगी।"

अभिषेक सक्सेना निर्देशित फिल्म 'फुल्लू' शुक्रवार को रिलीज हुई। इसमें अभिनेता शरीब हाशमी के अलावा ज्योति सेठी मुख्य किरदार में हैं।

मासिक धर्म और सैनिटरी नैपकिन के उपयोग के बारे में महिलाओं के साथ पुरुषों को जानना कितना जरूरी है, इस पर उन्होंने कहा, "मुझे लगता है कि यह बहुत जरूरी है। पुरुषों को हमेशा ही इस विषय पर अंधेरे में रखा जाता है, क्यूंकि लोगों को लगता है कि इससे उनका कोई सारोकार नहीं है। वास्तव में ऐसा नहीं है। हमारे घर-परिवार, स्कूल-कॉलेज और दफ्तर, हर जगह महिलाएं होती हैं। ऐसे में अगर आप उनसे जुड़ी समस्या को जानते ही नहीं होंगे तो उनकी मदद कैसे कर पाएंगे।"

उन्होंने कहा, "फिल्म में एक संदेश है कि जो औरत के दर्द को नहीं समझता, भगवान उसे मर्द नहीं समझता। इसके जरिए हमने बताने की कोशिश की है कि पुरुषों को महिलाओं के जीवन के इस महत्वपूर्ण चरण के बारे में जागरूकता होनी चाहिए।"

आजकल समाज के कई अनछुए विषयों पर फिल्में बन रही हैं, लेकिन यह समाज को किस हद तक प्रभावित कर सकती हैं?, इस सवाल पर शरीब ने कहा, "ऐसी फिल्मों को उतने दर्शक नहीं मिलते हैं, जिनकी उन्हें दरकार होती है। वास्तव में इन फिल्मों में अधिकांश लोग ज्यादा रुचि नहीं दिखाते हैं, जबकि विषय केंद्रित फिल्में समाज पर गहरा असर डाल सकती हैं। मैं उम्मीद करता हूं कि हमारी फिल्म को ज्यादा से ज्यादा लोग देखेंगे और हम इस फिल्म के जरिए जो कहना चाहते हैं, उसे समझेंगे।"

आगामी फिल्म परियोजनाओं के बारे में पूछे जाने पर शरीब ने कहा, "मैं इस समय तीन से चार फिल्मों पर काम कर रहा हूं। इनमें से एक 'वोदका डायरीज' है, जिसके निर्देशक कुशाल श्रीवास्तव हैं। इसमें मेरे साथ के. के. मेनन, राइमा सेन और मंदिरा बेदी भी हैं। इसके अलावा मैं 'माइ क्लाइंट्स वाइफ' में काम कर रहा हूं।"