मशहूर लेखक चेतन भगत द्वारा निर्मित व अभिनेता अर्जुन कपूर व अभिनेत्री श्रद्धा कपूर अभिनीत फिल्म हॉफ गर्लफ्रेंड की कहानी इंग्लिश से जूझने वाले बिहार के सिमराव गांव के रहने वाले माधव की है। माधव बाद में आगे की पढ़ाई के लिये दिल्ली विश्वविद्यालय के मशहूर सेंट स्टीफन्स कॉलेज में दाखिला लेना चाहता है, लेकिन वहां के स्टूडेंट्स की फर्राटेदार अंग्रेजी देखकर कॉलेज में एडमिशन मिलने को लेकर उसमें एक तरह की दुविधा पैदा हो जाती है।

हालांकि बास्केटबॉल के स्पोर्ट्स कोटे में न सिर्फ उसका वहां ऐडमशिन हो जाता है बल्कि बास्केटबॉल की बदौलत ही उसकी वहां एक बेहद अमीर फैमिली से आने वाली और फर्राटेदार अंग्रेजी बोलने वाली रिया सोमानी (श्रद्धा कपूर) से भी दोस्ती हो जाती है। दोनों की कॉलेज लाइफ हंसते-खेलते आगे बढ़ती है और उसी दौरान दोनों के बीच प्यार होता और फिर तकरार भी। अगर आपने चेतन भगत की किताब हॉफ गर्लफ्रेंड पढ़ा है तो आप पहले से ही इस फिल्म की कहानी से रूबरू होंगे।

समीक्षा : हर मुश्किल की घड़ी में माधव अपनी मां की सिखाई सीख 'हार मत मानो, हार को हराना सीखो को याद करके उससे बच निकलता है। यह फिल्म एक ऐसे लड़के की कहानी है जो खुद को साबित करने के लिए इंग्लिश से जूझता रहता है, तो अपनी दोस्त से ज्यादा और गर्लफ्रेंड से कम हॉफ गर्लफ्रेंड को पाने की खातिर भी।

फिर चाहे मामला फर्राटेदार अंग्रेजी बोलने वाली गर्लफ्रेंड पटाने का हो या फिर अपनी मां के स्कूल के लिए विदेशी मदद हासिल करने की खातिर विदेशी मेहमानों के सामने स्पीच देने का। माधव अपनी जिंदगी में कभी हार नहीं मानता। ठेठ बिहारी लड़के के रोल में खुद को साबित करने के लिए अर्जुन ने काफी मेहनत की है और अपने रोल को अच्छे से निभाया है, लेकिन फिर भी लगता है कि कुछ कसर बाकी रह गई।

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एक बेहद अमीर फैमिली से ताल्लुक रखने वाली रिया सोमानी के रोल को श्रद्धा कपूर ने बखूबी निभाया है। हाई क्लास सोसायटी से आने वाली रिया को देहाती माधव में एक ऐसा साथी नजर आता है जिसके साथ वह अपनी टेंशन भरी फैमिली लाइफ से दूर सुकून के कुछ पल बिता सकती है। डायरेक्टर मोहित सूरी ने रिया के किरदार के माध्यम से आजकल की लड़कियों की सोच को पर्दे पर उतारा है जिन्होंने अपनी मां को शादी बचाने की खातिर सब कुछ सहन करते देखा है लेकिन वह खुद इसके लिए राजी नहीं हैं।

फिल्म आपको दिखाती है कि महिलाओं के उत्पीड़न के मामले में कोई क्लास पीछे नहीं है, फिर चाहे वह हाई क्लास हो, मिडिल क्लास हो या फिर लोअर क्लास। हर जगह औरतें बस अपनी शादी बचाने की लड़ाई लड़ रही हैं। फिल्म में मोहित सूरी ने दर्शकों को बांधने के लिए कुछ चेंज भी किए हैं।

फिल्म का पहला हाफ मजेदार है, वहीं सेकंड हाफ सीरियस हो जाता है। माधव के दोस्त शैलेश के रोल में विक्रांत मैसी की ऐक्टिंग आपको याद रह जाती है तो माधव की मां के छोटे मगर दमदार रोल में सीमा बिस्वास भी जंची हैं।

विष्णु राव की सिनिमटॉग्रफी खूबसूरत है। खासकर इंडिया गेट के ऊपर से दिल्ली का सीन दिल्लीवालों को जरूर पसंद आएगा। वहीं, डीयू और न्यू यॉर्क के अलावा पटना के सीन भी दर्शकों को खूबसूरत लगेंगे। कॉमनमैन के राइटर माने जाने वाले चेतन भगत इस फिल्म से बतौर प्रड्यूसर जुड़े हैं। चेतन की किताबें उन्हें चुनिंदा लोगों तक पहुंचाती हैं लेकिन उनकी किताबों पर बनीं फिल्में उन्हें आम लोगों तक पहुंचाती हैं।

हिंदी वर्सेज इंग्लिश से परेशान कॉलेज स्टूडेंट्स खुद को फिल्म से रिलेट कर पाएंगे। यही वजह है कि मॉर्निंग शोज में लड़के-लड़कियों की खासी भीड़ सिनेमा पहुंची हुई थी। फिल्म का संगीत पहले से ही यंगस्टर्स में काफी पॉप्युलर है। खासकर, 'मैं फिर भी तुझको चाहूंगा' और 'तू थोडी देर और ठहर जा' को लोग सिनेमा से बाहर निकल कर भी गुनगुनाते हैं।