दिवंगत वाईएस राजशेखर रेड्डी (वाईएसआर) की जयंती यानी एक विश्वास, एक भरोसे का जन्म दिवस है। यह सच है। इसमें कोई संदेह नहीं है। वाईएसआर के लिए हम सब एक परिवार हैं। यूं कहा जाएं तो और अच्छा होगा कि वे हमारे परिवार के मुखिया थे। इस बात को देखना और समझना हो तो आंध्रा के लोगों के घरों जाना होगा। जहां वाईएसआर की कोई न कोई एक निशानी देखने को मिल जाएगी। एक मां, एक बाप, एक भाई, एक बहन, एक दादा, एक दादी और एक दोस्त के दिल में हमें वाईएसआर बसें दिखाई देते हैं। हमारे इतने बड़े परिवार का नाम ही वाईएसआर है। हर व्यक्ति के दिल में वाईएसआर आज भी जीवित हैं।

विजयम्मा

वाईएसआर की अर्धांगिनी विजयम्मा उनके दोस्तों का हवाला देते हुए कहती हैं- वाईएसआर पहले से ही प्रैक्टिकल इंसान थे। लक्ष्य हासिल करना ही उनका मकसद होता था। राजनीति में उनकी गहरी दिलचस्पी और अच्छी पकड़ थी। वे हमेशा राज्य और राष्ट्रीय राजनीति पर चर्चा करते थे। उनका लक्ष्य एक अच्छा नेता बनना था। वाईएसआर जब लयोला कॉलेज में इंटर की पढ़ाई कर रहे थे, तभी से कृष्णा जिले के किसानों से उनकी फसलों के बारे में जानकारी लेते थे। उसी दौरान उन्होंने पूरे राज्य को हराबरा करने का संकल्प लिया था।

अंतर होता है

वाईएसआर हर दिन कैंप ऑफिस में लोगों से मिलते, उनका हालचाल पूछते और उनके ज्ञापन (अर्जी) लेते थे। एक दिन बेटी शर्मिला ने पिताजी से कहा- आप लोगों के बीच रहते हैं तो अच्छे दिखते हैं। जवाब में वाईएसआर ने कहा- हां बेटी, सच है। क्योंकि बाहर सैकड़ों लोग दूर-दराज से आकर इंतजार करते हैं। अंदर कुछ ही लोग मेरा इंतजार करते हैं। इन दोनों में बहुत अंतर होता है। बाहर से मिलने आये लोग अपनी-अपनी समस्याओं को लेकर आते हैं। अंदर के लोग खुद के काम के लिए आते हैं। पद पर बैठने के बाद नेता लोगों से दूर हो जाते हैं। मगर वाईएसआर पद पर बैठने के बाद लोगों के और करीब हो गए थे।

सेवा और सहायता

हर पार्टी के लोग वाईएसआर के पास लोगों की समस्याओं की सिफारिशें भेजा करते थे। मजे की बात यह होती थी कि उनको परेशान करने वालों की सिफारिशें सबसे अधिक होती थीं। यह देखकर पार्टी के नेता वाईएसआर से कहते थे कि- आप उनकी सिफारिशों को कैसे हल कर लेते हैं? जवाब में वाईएसआर कहते- हम परेशान करने वालों का काम नहीं कर रहे हैं। हम तो गरीबों के लिए काम कर रहे हैं। साथ ही कहते थे- जाने दो। लोगों की सेवा करना हमारा कर्तव्य है। परेशान करने वालों का अपना संस्कार हैं। उनका गुस्सा इन गरीबों पर निकालना नाइंसाफी है।

हाथ ऊपर न उठे

वाईएसआर कहते थे- मैं जब भी किसी गांव में जाकर माइक पकड़कर- इस गांव में जिनके पास मकान नहीं है। जिनको पेंशन नहीं मिल रहा है। सफेद राशन कार्ड नहीं है। हाथ उठाओ। कहा तो एक भी हाथ नहीं उठा। राजनीतिक भेदभाव भूलकर सभी का कल्याण करना ही मेरा कर्तव्य है।

समय का पालन

वाईएसआर समय का पालन करने में कटिबद्ध थे। कुछ जगहों पर तो वाईएसआर ज्यादा समय रहना पसंद करते थे। मुख्य रूप से गरीब, गूंगे और बहरे बच्चों के साथ अधिक समय बितना उन्हें पसंद था।

आपसी कलह (गुटबाजी)

रायलसीमा में आपसी कलह (गुटबाजी) की घटनाएं सबसे अधिक होती थीं। मगर वाईएसआर इस गुटबाजी से दूर रहते थे। वे कहते थे- गुटबाजी अच्छी नहीं होती। इस गुटबाजी में पीढ़ी की पीढ़ी खत्म हो जाती है। हम किसी की हानि करेंगे तो वे खामोश क्यों बैठेंगे?। वो भी वही करेंगे जो हमने उनके साथ किया है। ऐसे करने से ऐसा लगेगा कि हम हमारे बच्चे और बुजुर्गों के साथ धोखा किया है। यदि हम अच्छा करें तो सबका भला होगा। राजनीति में आने की शुरुआत में रायलसीमा में सबसे अधिक गुटबाजी होती थी। मुख्य रूप से कड़पा में गुटबाजी चरम पर थी। वाईएसआर गांवों में रात-रात पंचायत कर लोगों को गुटबाजी छोड़ने की सलाह दिया करते थे और इसके लिए खुद के पैसे भी खर्च करते थे। आखिर वाईएसआर को इसमें सफलता भी मिली।

वाईएस जगन

वाईएस जगन मोहन रेड्डी को भी लोगों की सेवा करने और लोगों से प्रशंसा पाने में काफी दिलचस्पी है। वाईएसआर, जगन की दिलचस्पी को गौर से देखते थे। इस तरह धीरे-धीरे जगन ने राजनीति में प्रवेश किया। वाईएसआर जगन से कहते थे- राजनीति में रहना हो तो धैर्य होना चाहिए। एकाग्रता होनी चाहिए। सब कुछ जाये पर वचन न जाने पाए। आश्वासन का पालन होना चाहिए। हम पर जो विश्वास करते हैं उनका साथ देना चाहिए। तब ही लोग आपका साथ देंगे और साथ रहेंगे। लोगों की मुश्किलों में साथ देना चाहिए। सभी से मिलते और बातें करते रहना चाहिए।

संकल्प

इसीलिए जगन कहते हैं- इंसान कितने दिन जीएगा यह मायने नहीं रखता। कैसे जीया यह काफी महत्वपूर्ण होता है। देखो माता- पिताजी को लोग कैसे याद करते हैं। मुझे भी पिताजी जैसे अच्छे काम करने की इच्छा है। लोगों के दिलों में बसना पसंद है।

शर्मिला

वाईएसआर बेटी शर्मिला से बहुत प्यार करते थे। यह देख शर्मिला के दोस्त कहते थे- आपके पिता को देखते हैं तो हमें जलन महसूस होती है। क्योंकि हमारे पिता भी हम से प्यार करते हैं। मगर इतना नहीं। शर्मिला कहती हैं- मेरे पिता के प्यार में मैं भगवान का प्यार महसूस करती हूं। आज मैं उस प्यार हर रोज वंचित हो रही हूं। मेरे जीवन में अब जान नहीं है (देअर इज नो लाइफ एनी मोर इन माई लाइफ)।