के. रामचंद्रमूर्ति की कलम से ....

एक-दूसरे को आंख दिखाने वाले जब दो देश आपस में मिल सकते हैं और कोरियाई प्रायद्वीप में शांति की पहल कर सकते हैं, तो चीन, भारत और पाकिस्तान क्यों नहीं दशकों से चले आ रहे खूनी संघर्ष को समाप्त करने के लिए सार्थक प्रयास कर सकते हैं? सिंगापुर समिट में उत्तर कोरिया के तानाशाह किम जोंग उन और अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप को आपस में हाथ मिलाते देख कई वरिष्ठ भारतीयों और पाकिस्तानियों के दिमाग में यही प्रश्न उठा होगा।

ड्रेमोक्रेटिक रिपब्लिक ऑफ कोरिया (उत्तर कोरिया) और अमेरिकी नेताओं ने समिट में जिस समझौते पर हस्ताक्षर किया, उसकी परख बाद में होगी, लेकिन दोनों नेताओं के इस कदम ने एक इतिहास व्याख्या कर दी है। अमेरिकी राजनेताओं को इस समझौते में कमी लग सकती है और वह ट्रंप को एक 'शैतान' पर भरोसा करने के लिए दोषी ठहरा सकते हैं, क्योंकि उन्होंने ट्रंप को हमेशा नफरत और तिरस्कारपूर्ण निगाहों से देखा है।

वहीं उत्तर कोरिया के लोगों को यह लग रहा होगा कि किम ने गलती की है। क्योंकि परमाणु निरस्त्रीकरण के बाद ही उनके देश पर लगे प्रतिबंध संयुक्त राष्ट्र हटाएगा। वह यह भी महसूस कर रहे होंगे कि किम ने अमेरिका से इस बात का ठोस आश्वासन लिए बिना ही समझौते पर हस्ताक्षर कर दिया कि वह उसके पड़ोसी देश से अपनी सेनाएं हटा लेगा तथा जापान और दक्षिण कोरिया की परमाणु छतरी नहीं बना रहेगा।

यह किम ही हैं, जिन्होंने अमेरिका की तरफ सैन्य बलों के कम करने के आश्वासन पर ही परमाणु निरस्त्रीकरण के लिए तैयार हो गए। अब संयुक्त राष्ट्र के प्रतिबंधों के कारण उत्तरी कोरिया को गहरे संकट से ठीक होने में मदद करने के लिए दक्षिण कोरिया और जापान को आर्थिक मोर्चे पर किम की मदद करनी होगी। ट्रंप के लिए पूरी तरह से यह जीत की स्थिति है, क्योंकि उन्होंने इस समझौते में सिर्फ पाया ही है खोया कुछ नहीं है। अब आने वाला समय तय करेगा कि ऐतिहासिक सिंगापुर शिखर सम्मेलन कोरियाई लोगों को स्थायी शांति प्रदान करेगा या नहीं। अब जापान और दक्षिण कोरिया राहत की सांस ले सकते हैं, क्योंकि डू्म्सडे क्लॉक को कुछ सेंकड या मिनट के लिए बंद कर दिया गया है।

दुनिया में 'लिटिल रॉकेट मैन' के नाम से मशहूर उत्तर कोरिया के तानाशाह किम जोंग उन ने 28 नवंबर 2017 को एक नई चाल चली। उन्होंने अमेरिका को दिखाने के लिए हॉवसान्ग -15 इंटरकांटिनेंटल बैलिस्टिक मिसाइल का परीक्षण किया। इस मिसाइल परीक्षण से किम ने यह बता दिया कि पृथ्वी के सबसे शक्तिशाली देश सीमाएं अब उसकी जद में हैं।

परीक्षण के तीन सप्ताह बाद कोरियाई नव वर्ष के अवसर पर किम ने अपने लोगों के बीच यह ऐलान किया कि उन्होंने जो मिसाइल टेस्ट किया है, वह कोरियाई प्रायद्वीप की बाहरी खतरों से रक्षा के लिए है। परमाणु निशस्त्रीकरण की प्रतिज्ञा को दोहराते हुए उन्होंने कहा कि वह पूरे कोरियाई प्रायद्वीप को परमाणु हथियार मुक्त करना चाहते हैं। ऐसा कर उन्होंने अपने देश, अपने शासन और अपने परिवार को सुरक्षित कर लिया।

वहीं ट्रंप ने कुछ महीने पहले किम को 'पागल आदमी' की संज्ञा दी थी, जाहिर सी बात है कि अमेरिका किसी 'पागल आदमी' के हाथ में न्यूक्लियर हथियार नहीं देख सकता था।

किम ने एक अवसर दिया जिसे ट्रंप ने एक राजनयिक वार्ता के रूप में बदल दिया। हालांकि, राज्य सुरक्षा सचिव माइक पोम्पे ने कहा कि 'जब तक उत्तर कोरिया पूरी तरह से परमाणु निशस्त्रीकरण नहीं कर लेता है तब तक दोनों देशों के बीच कोई भी वार्ता हो पाना असंभव है।' जो आसान नहीं था।

ऐसी परिस्थिति में वाशिंगटन और प्योंगयांग के बीच एक व्यापक सौदे के लिए भी हस्ताक्षर किए जाने में वर्ष नहीं, तो महीनों लग ही जाते। अपने परिवार के तीसरी पीढ़ी के शासक किम इतने भी मूर्ख नहीं थे कि बिना जरूरी कदम उठाए अपने सभी न्यूक्लियर हथियारों को नष्ट कर अमेरिका से हाथ मिलाने पहुंच जाते।

यह स्वीकार्य करने पड़ेगा कि सिंगापुर समिट में बिना चीन की मध्यस्थता और किम के बिना चीन गए कोई भी बातचीत संभव नहीं थी। किम को ट्रंप के उस पत्र पर भी भरोसा नहीं था, जिसमें ट्रंप ने नॉर्थ कोरिया की सुरक्षा का दावा किया था। उन्हें चीन की तरफ से आश्वासन मिला होगा कि अगर अमेरिका नॉर्थ कोरिया पर हमला करता है तो वह उनकी मदद के लिए आएगा।

इस समिट में वास्तव में चीन ने एक शांति दूत की भूमिका निभाई। जिसने दो परमाणु संपन्न महाशक्तियों के बीच शांति की पहल की। यह संभव हो पाया क्योंकि ट्रंप मंदारिन (चीन की राष्ट्रीय भाषा) स्क्रिप्ट पर चल रहे थे।

क्या कश्मीर समस्या को हल करने के लिए चीन इसी तरह की एक पहल कर सकता है? क्या भारत इसके लिए चीन को इजाजत देगा? जब अमेरिका के साथ पिंग-पांग जैसा गेम खेल सकता है तो भारत क्यों नहीं?

भारत और अमेरिका दोनों का नजरिया चीन के प्रति दशकों से अविश्वासपूर्ण रहा है। भारत-चीन संबंधों के साथ-साथ यूएस-चीन संबंधों में फ्लैश प्वाइंट भी रहे हैं। ट्रंप का यह कदम उनकी छवि के बिल्कुल खिलाफ था, लेकिन इस मुद्दे को समाप्त करने के लिए चीन को शामिल कर उन्होंने अपनी चतुराई का परिचय दिया है।

पहले के किसी अन्य भारतीय नेता की तुलना में नरेंद्र मोदी चीनी राष्ट्रपति शी जिनपिंग से अधिक बार मिल रहे हैं। जिनपिंग जब भारत दौरे पर आए तो मोदी उन्हें अहमदाबाद ले गए, जहां चाइनीज नेता ने दुबारा भारत यात्रा पर आने का वादा किया। जिसे देखकर लगता है कि दोनों नेताओं के बीच आपसी सामंजस्य काफी अच्छा है।

कश्मीर मुद्दे पर भारत आज भी नेहरू की ही रणनीति पर चल रहा है, वह इस मसले में किसी तीसरे पक्ष को शामिल नहीं करना चाहता है। यह भी सही है कि कश्मीर मसले पर बात सिर्फ कश्मीर के लोगों और केंद्र सरकार के ही बीच होनी चाहिए। लेकिन नई दिल्ली को यह समझना होगा कि कश्मीरी अलगावादियों से बात करने के लिए पाकिस्तानी प्रतिनिधियों से भी बात करने के लिए तैयार होना होगा।

वाजपेई ने लाहौर बस यात्रा करके तत्कालिन पाकिस्तानी प्रधानमंत्री नवाज शरीफ से वार्ता कर एक ऐतिहासिक और शाहसिक कदम उठाया था। यदि जनरल परवेज मुशर्फ ने कारगिल पर कब्जा करने की गलती ना की होती तो वाजपेई और शरीफ का उठाया कदम कश्मीर में शांति बनाए रख पाने में संभव होता।

भारत और पाकिस्तान दोनों अपनी सीमाओं की सुरक्षा के लिए बॉर्डर पर भारी धन खर्च कर रहे हैं। यह धन दोनों देशों की जनता के कल्याण में खर्च किया जा सकता है।

मोदी देश वासियों को यह समझाने का प्रयास कर रहे हैं कि भारत में आतंकवाद को बढ़ावा देने के लिए चीन पाकिस्तान की मदद कर रहा है। लेकिन उन्हें अपने रुख में थोड़ी नरमी लानी पड़ेगी, क्योंकि चीन ही पाकिस्तान को आतंकवाद पर रोक लगाने और भारत के साथ दोस्तानापूर्ण व्यवहार करने के लिए राजी कर सकता है। भारत को यह स्वीकार करना चाहिए कि चीन उसका बड़ा भाई है, क्योंकि उसकी अर्थव्यवस्था भारत से पांच गुनी बड़ी है।

एक चर्चित धारणा है कि केंद्र की बीजेपी सरकार ही कश्मीर समस्या को हल कर सकती है। एक और धारण यह भी है कि भारत सरकार राष्ट्रवाद और देशभक्ति के नाम पर पाकिस्तान के साथ सीमा पर युद्ध जैसे माहौल पैदा करती है।

मोदी युद्ध के स्थान पर शांति बनाए रखे तो ही आने वाला चुनाव जीत सकते हैं, क्योंकि मोदी में निर्णय लेने की क्षमता है और उनकी भाषाशैली ऐसी है कि वह देश की जनता को शांति मूल्य बता सकते हैं।

इस लेख से बहुत से लोग असहमत हो सकते हैं और लेखक को देशद्रोही करार दे सकते हैं। लेकिन यह ही एक रास्ता है जिससे कश्मीर में शांति स्थापित हो सकती है। कश्मीर की मुख्यमंत्री महबूबा मुफ्ती सईद समेत वहां के नेता भी कश्मीर को लेकर भारत और पाकिस्तान के बीच चले आ रहे खूनी संघर्ष को समाप्त होता देख खुश होंगे।

(लेखक के. रामचंद्रमूर्ति साक्षी समूह के एडिटोरियल डायरेक्टर भी हैं..)