के. रामचंद्रमूर्ति की कलम....

भारत के पूर्व राष्ट्रपति प्रणब मुखर्जी ने बीते गुरुवार को नागपुर में राष्ट्रीय स्वयं सेवक संघ के कार्यक्रम के दौरान एक सच्चे कांग्रेसी की तरह आपकी उनके संबोधन दिया। उनके पूरे संबोधन को देख कर यह लगा कि यह उन कांग्रेसियों को शर्मसार करने वाला था जो जो उनके नागपुर जाने पर अपनी छाती पीट रहे थे और तरह-तरह की आशंका जता रहे रहे थे। हालांकि उनके नागपुर जाने और आरएसएस के आमंत्रण को स्वीकार करने पर कांग्रेस आलाकमान ने कुछ भी नहीं कहा था, लेकिन आनंद शर्मा और चिदंबरम जैसे कांग्रेस के कुछ वरिष्ठ नेताओं ने अपना आपा खोते और जरूरत से ज्यादा आक्रमकता दिखायी थी। उनके खिलाफ की गई टिप्पणियों में इन नेताओं की बेसब्री और अहंकार को जाहिर किया।

एक तरफ तो कहा जाता है कि कांग्रेस पार्टी लिबरल है, तो ऐसी स्थिति में प्रणब मुखर्जी नागपुर जाने के फैसले का स्वागत करना चाहिए। भला उनके RSS की दफ्तर जाने से कौन सा पहाड़ टूट पड़ता है और अगर वह मोहन भागवत के साथ मंच साझा कर लेते तो उससे क्या हो जाता है। एक बार जब वह देश के राष्ट्रपति बन गए तो वह कांग्रेसी नहीं रह गए। वह एक हिंदू हैं और शायद इसीलिए RSS उन्हें अपने कार्यक्रम में बुलाया था। उनके द्वारा इस आमंत्रण को ठुकराया जाने का कोई कारण नहीं बनता था। केवल उनके द्वारा आमंत्रण स्वीकार कर लेने व इस कार्यक्रम में भाग लेने मात्र से ही उनकी विचारधारा नहीं बदल जाती और प्रणब मुखर्जी RSS की भाषा बोलना बोलने लगते। अब उनके संबोधन के बाद कांग्रेसी नेताओं के सुर बदल गए और वे ही कहने लगे कि उन्होंने RSS को आइना दिखा दिया।

कार्यक्रम में संबोधन के दौरान रविवार को भारत माता के सच्चे सपूत को जाने की बात भी गलत नहीं ठहराई ही जानी चाहिए। उन्होंने तो संबोधन के दौरान नेहरु और गांधी की भी तारीफ की। पूर्व राष्ट्रपति ने कहा कि हमें विभिन्नता का आदर करना चाहिए। राष्ट्र किसी धर्म या मत से बधा नहीं होता है। जरूरत इस बात की है कि हम गुस्से से शांति की ओर बढ़ें। अगर किसी देश में कई धर्म होते हैं तो देश टॉलरेंट रहता है। प्रणब मुखर्जी ने RSS को याद दिलाया कि इसी सहनशीनता में हमारे भारत देश की आत्मा निवास करती है।

न सिर्फ कांग्रेस के नेताओं ने ही बल्कि तमाम राइट विंग के नेताओं ने भी प्रणब मुखर्जी के नागपुर जाने और RSS के आमंत्रण को स्वीकार करने को लेकर सोनिया गांधी और कांग्रेस पर हमला किया। इतना ही नहीं, सोशल मीडिया पर भी तमाम तरह की खबरों की बाढ़ आ गई। कई मनगढ़ंत खबरें भी सोशल मीडिया पर चलने लगीं। सोशल मीडिया पर प्रणब मुखर्जी की किताब का हवाला देते हुए सोनिया गांधी के खिलाफ हिंदू होने की बात भी फैलाई गई। इतना ही नहीं, सोशल मीडिया पर तुम प्रणब मुखर्जी की प्रधानमंत्री बनने की चाहत को भी दर्शाया जाने लगा।

इसके साथ साथ इसके पीछे तर्क यह दिया जाने लगा कि अगर भारतीय जनता पार्टी की 200 से कम सीटें आती हैं तो ऐसी स्थिति में 2019 में मोदी को प्रधानमंत्री की कुर्सी पर से हटना पड़ेगा और किसी 'शानदार' आदमी को उनकी जगह लेनी पड़ेगी। ऐसी स्थिति में RSS द्वारा प्रणब मुखर्जी को आगे किया जा सकता है। हालांकि बाद में यह कयास भी केवल हवाबाजी वाले साबित हुए। प्रणब मुखर्जी ने अपने पूरे संबोधन के दौरान अपनी फिलासफी के हिसाब से बात की और कहा कि आरएसएस अस्पृश्य नहीं है। ऐसा पहले भी हुआ है कि RSS ने कांग्रेस के तमाम नेताओं को अपने कार्यक्रम में बुलाया है। आज के राजनीतिक हालात में भारतीय जनता पार्टी और कांग्रेस एक दूसरे को की टांग खींचने में व्यस्त हैं। आज इनटॉलेरेंस की बात ज्यादा जरूरी है। इसे बदलने की जरूरत है और यही प्रणब मुखर्जी के नागपुर के भाषण का सार था।

(लेखक के. रामचंद्रमूर्ति साक्षी समूह के एडिटोरियल डायरेक्टर भी हैं..)