के. रामचंद्र मूर्ति की कलम से...

आज से लगभग 48 साल पहले कुछ ऐसा ही इंदिरा गांधी के साथ हुआ था जैसा आज शशिकला के साथ दोहराया जा रहा है। हालांकि कई मामलों में इस घटनाक्रम की तुलना उचित नहीं है, फिर भी दोनों की तुलना इस संदर्भ में की जा सकती हैं कि दोनों महिला राजनीतिज्ञ हैं।

इंदिरा गांधी कांग्रेस पार्टी की वास्तविक वारिश थीं, जबकि शशिकला पर राजनीतिक पार्टी पर कब्जा करने का लेबल लगा हुआ है। इंदिरा गांधी पारिवारिक विरासत के रूप में पार्टी पर कब्जा करना चाहती थी, जबकि शशिकला का ऐसा कोई गौरवशाली व्यक्तिगत राजनीतिक इतिहास नहीं रहा है।

जिस तरह से निजलिंगप्पा और उनके सिंडीकेट्स ने तत्कालीन प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी को 1969 में पार्टी से निकाल दिया था, ठीक उसी तरह शशिकला को पार्टी की महासचिव पद से तमिलनाडू में सत्तारूढ़ AIADMK ने पार्टी जनरल काउंसिल की बैठक के बाद बेदखल कर दिया है।

एक अर्थ में देखा जाए, तो यह तमिलनाडु की राजनीति का बड़ा तख्तापलट है। तत्कालीन समय में इंदिरा गांधी के पास अपनी शक्ति और करिश्मे के बल पर अपनी राजनीतिक पकड़ को पुन: पाने का जज्बा था, तो वहीं शशिकला बेंगलुरू की एक जेल में बंद हैं और उनके पास ऐसी कोई आकर्षक शक्ति है और न ही करिश्मा। उनके भतीजे टीटीवी दिनाकरण भले ही जेल से बाहर हैं, लेकिन वह शशिकला की राजनीतिक हस्ती को बचाने में असफल साबित हो रहे हैं। हालांकि वह अपनी तरफ से अपनी क्षमता के अनुरूप पूरा प्रयास कर रहे हैं।

ओ. पनीरसेल्वम और पलानीस्वामी दोनों एक होकर अपने बीच मतभेद पैदा करने वाले शशिकला और दिनाकरण की छुट्टी कर पार्टी में जश्न तो मना सकते हैं, लेकिन यह कितने दिनों तक होगा, यह अभी देखने वाली बात होगी। दिनाकरण ने पार्टी जनरल काउंसिल के प्रस्ताव कोखारिज कर दिया है, जिसके द्वारा उन्हें और शशिकला को पार्टी से बेदखल कर दिया गया था।

दिनाकरण ने दावा किया है कि शशिकला आज भी जब चाहे तब अपने पास मौजूद विधायकों की संख्या के बल पर सरकार को गिरा सकती हैं। पार्टी में टूट हुई तो राज्य में गवर्नर रूल लगेगा और राज्य को चुनाव की तरफ ले जायेगा।

1995 में एनटीआर ने वर्ष 2014 में मुलायम सिंह यादव के द्वारा सत्ता से हटने के बाद दोनों नेताओं के दलों में काफी उठा-पठक मची थी और पार्टी में गुटबाजी बढ़ी थी।

एनटीआर ने 1982 में टीडीपी बनाई और पार्टी गठन के 9 महीने के भीतर आंध्र प्रदेश में गैर कांग्रेस सरकार पहली बार बना डाली। उन्होंने फौरन अपने दामाद नारा चंद्रबाबू नायडू को अपने मंत्रिमंडल में शामिल करते हुए उनकी जोरदार राजनीतिक पारी शुरु करवाई। उस समय चंद्रबाबू नायडू कांग्रेस सरकार में मंत्री थे। फिर अगस्त 1984 में वित्तमंत्री नादेंडला भास्कर राव ने विद्रोह करते हुए तख्तापलट करने की कोशिश की, तो एनटीआर ने उसे नाकाम कर दिया और एक महीने के भीतर तत्कालीन राज्यपाल शंकर दयाल शर्मा से मुख्यमंत्री पद की शपथ ले ली थी।

एनटीआर के साथ एक और तख्तापलट

एनटीआर के अपने बेटे-बेटियों और दामाद चंद्रबाबू नायडू ने मिलकर एनटीआर को सत्ता से बाहर कर दिया। साथ ही उन्हें टीडीपी के अध्यक्ष पद से भी हटा दिया गया। इसके तुरंत बाद चंद्रबाबू नायडू ने सत्ता पर भी कब्जा कर लिया। हालांकि कहा जाता है कि वर्ष 1996 के लोकसभा चुनाव के वक्त यदि एनटीआर जीवित होते, तो आंध्र प्रदेश का राजनीतिक इतिहास कुछ और होता, क्योंकि अपने दामाद और परिवार के खिलाफ पूरे आंध्र प्रदेश में राजनीतिक अभियान छेड़ दिया था पर चुनाव से पहले ही उनका निधन हो गया।

मौजूदा समय में देखें तो मुलायम सिंह यादव और उनके पुत्र अखिलेश यादव का मामला दिखता है। मुलायम सिंह ने अखिलेश यादव को मुख्यमंत्री पद की कुर्सी सौंपी, लेकिन कुछ ही दिनों के बाद पारिवारिक खींचातानी और पिता-पुत्र में बढ़े असंतोष के चलते अखिलेश यादव ने पार्टी और संगठन पर पूरी तरह से अपना कब्जा जमाया।

हालांकि मुलायम सिंह ने 2014 में प्रधानमंत्री बनने के लालसा में 2012 में अखिलेश यादव को अपनी स्वेच्छा से मुख्यमंत्री बनाया था। मुलायम सिंह को उम्मीद थी कि गठबंधन सरकार में उन्हें प्रधानमंत्री बनने का मौका मिल सकता है, लेकिन दुर्भाग्य से 2014 के लोकसभा चुनाव में भाजपा ने जबर्दस्त बहुमत हासिल किया और उनका सपना टूट गया।

वहीं उत्तर प्रदेश में चुनाव आते-आते अखिलेश और उनके चाचा शिवपाल के बीच कुर्सी की लड़ाई इतनी तेज हुई कि पार्टी दो गुटों में विभाजित हुोती नजर आई। अखिलेश मौजूदा राजनीतिक हालत को देखकर कांग्रेस के साथ मिलकर चुनाव लड़ना चाहते थे, वहीं शिवपाल और मुलायम अकेले चुनाव में जाने के पक्ष में थे, लेकिन अखिलेश के आगे दोनों की एक नहीं चली और समाजवादी पार्टी कांग्रेस के साथ चुनाव लड़कर भी पार्टी की सबसे बड़ी हार की तरफ चली गई।

तमिलनाडु की राजनीति में देखें, तो स्टालिन 60 साल के हो चुके हैं और उनके पिता एम. करूणानिधि 90 साल की उम्र में भी पार्टी अध्यक्ष के रूप में काबिज हैं। हालांकि माना जा रहा है कि अगले मुख्यमंत्री के रूप में एम. करूणानिधि अपने बेटे स्टालिन को मुख्यमंत्री का चेहरा बना सकते हैं।

5 दिसंबर 2016 को तमिलनाडु की तत्कालीन मुख्यमंत्री जे. जयललिता के निधन के बाद राज्य में सनसनीखेज घटनाओं और राजनीतिक अस्थिरता का दौरा जारी रहा। मंगलवार को हुई AIADMK की जनरल काउंसिल की बैठक में जेल में बंद शशिकला को सभी पदों से हटाने के साथ-साथ दिनाकरण को भी पार्टी से छुट्टी कर दी गई और परिषद ने मुख्यमंत्री पलानीस्वामी और उपमुख्यमंत्री पन्नीरसेल्वम के दोनों धड़ों को विलय की मंजूरी दी। बैठक में पार्टी के महासचिव पद को हमेशा के लिये खत्म कर दिया गया और कहा गया कि तमिलनाडु की पूर्व मुख्यमंत्री जे. जयललिता हमेशा-हमेशा के लिये पार्टी की महासचिव रहेंगी।

वहीं दूसरी ओर. एम.के. स्टालिन के साथ दिनाकरण ने राज्यपाल से मुलाकात की और 119 विधायकों के समर्थन का दावा किया था। साथ ही पलानीस्वामी के इस्तेफे की मांग की थी और कहा था अगर वह इस्तीफा नहीं देते हैं तो सरकार गिराई जा सकती है। दिनाकरण का दावा है कि शशिकला व उनके खिलाफ पारित प्रस्ताव गलत है और उसे वह कोर्ट में चुनौती भी दे सकते हैं।

विपक्षी कर रहे हैं सरकार गिरने का इंतजार

तमिलनाडु में मुख्य विपक्षी दल DMK और कांग्रेस AIADMK की सरकार गिरने का कई महीनों से इंतजार कर हैं, ताकि जल्द से जल्द राज्य में चुनाव हो सके। डीएमके के कार्यवाहक अध्यक्ष स्टालिन सत्तारूढ़ पार्टी के दो दर्जन से अधिक विधायकों के अपने साथ होने का दावा कर रहे हैं और भाजपा की तर्ज पर राज्य में सत्तारूढ़ दल को तोड़कर सरकार में वापसी करना चाहते हैं। वहीं सीएम पलानीस्वामी और डिप्टी सीएम पन्नीरसेल्वम भारतीय जनता पार्टी और प्रधानमंत्री के संपर्क में आने के बाद अपनी सत्ता बचा पाने में सफल दिख रहे हैं।

यह भी माना जा रहा है कि इसमें राज्यपाल सीएस विद्यासागर राव की भी भूमिका महत्वपूर्ण है जो लगातार DMK व दिनाकरण के दावे को खारिज करते जा रहे हैं। अब गेंद दिनाकरण के पाले में है और उन्हें अपनी राजनीतिक पकड़ और कुशलता दिखाकर अधिक से अधिक विधायकों को अपने खेमे शामिल करना है ताकि वह उचित समय पर सरकार को झटका दे सके और विधानसभा अध्यक्ष को अपने पास मौजूद विधायकों की संख्या दिखा सकें।

के. रामचंद्र मूर्ति ( निदेशक, साक्षी समाचार समूह)
के. रामचंद्र मूर्ति ( निदेशक, साक्षी समाचार समूह)