जुताई, बुवाई से लेकर खाद-पानी की व्यवस्था में की गई जीतोड़ मेहनत का बेहतरीन परिणाम जब एक किसान देखता है तो उसका उत्साह कई गुना बढ़ जाता है। वह अपना सारा कष्ट भी लगभग भूल जाता है। कमोबेश यही स्थिति वर्तमान राजनीति की भी हो चली है।

हर नेता पांच साल तक सियासी जमीन तैयार करने के बाद वोटों की लहलहाती फसल देख उसे काटने के लिए चुनाव में बेचैन हो उठता है, वह भी बिना बोए। इस विधानसभा चुनाव में भी यही स्थिति सामने आ रही है। जहां अधिकांश के अरमान दावेदारी में ही सियासी आपदा की भेंट चढ़ चुके हैं।

बचे खुचे लोग ही वोटों की फसल पर अपना हक जता रहे हैं, मगर काटेगा कौन, यह सवाल फिलहाल बना हुआ है। यह समय विभिन्न दलों और उसके नेताओं के लिए किसी अग्निपरीक्षा से कम नहीं है, जिसमें सभी बड़ी सावधानी से फूंक-फूंक कर कदम रख रहे हैं।

इसी बीच प्राकृतिक आपदाएं कभी-कभार उसके सारे अरमानों को चूर कर देती हैं, फिर भी वह हिम्मत नहीं हारता। बस उम्मीद के सहारे जीवनर्पयत अपने उसी पारंपरिक कार्यो में लगा रहता है। इस बीच उसकी तमाम अग्नि परीक्षाएं भी होती हैं।

वर्तमान समय में दुनिया के सबसे बड़े लोकतांत्रिक देश भारत के पांच राज्यों की कुल 691 विधानसभा सीटों के लिए चुनावी दुंदुभी बज चुकी है। निर्वाचन आयोग और राजनैतिक दलों ने अलग-अलग रणनीति बनाकर कमर कस ली है। पांच साल तक शासन सत्ता का रसास्वादन करने वाले नेताओं का समय अब समाप्त हो चुका है।

बारी अब उस जनता की है, जिसने नेताओं की कार्यशैली को कसौटी पर कसने और उसके नतीजे का मूड बना लिया है। इसलिए यह चुनाव नेताओं के लिए किसी अग्निपरीक्षा से कम नहीं है।

सबसे बड़ी अग्निपरीक्षा प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की होगी, जिनके सम्मुख भाजपा का परचम लहराने का एक बड़ा लक्ष्य खड़ा है। खासतौर से उस उत्तर प्रदेश में, जहां बसपा और सपा के तिलिस्म में जनता उलझी रही है।

देश के जिन पांच राज्यों में विधानसभा के चुनाव हो रहे हैं, उनमें सर्वाधिक 403 सीटों वाले उत्तर प्रदेश में समाजवादी पार्टी सत्तारूढ़ रही है। जो अंतिम दौर में पारिवारिक अंतर्कलह से जूझते हुए स्वयं अस्तित्व के संकट में थी। ऐसे में बसपा और भाजपा की ताकत बढ़ना लाजमी है।

दूसरे नंबर पर 117 सीटों वाला पंजाब है। जहां भाजपा की मदद से अकाली दल सत्तारूढ़ है। तीसरे नंबर पर आता है 71 सीट वाला उत्तरांचल जो कांग्रेस के हाथ में है। 60 सीटों वाले मणिपुर में कांग्रेस और 40 सीटों वाले गोवा में भाजपा की सरकार रही है। इन सभी राज्यों में सात चरणों में मतदान होने हैं। जहां विभिन्न राजनीतिक दलों ने जन मन जीतने की कोशिश तेज कर दी है। अब जनता की कसौटी पर जो खरा उतरेगा, वोटों की फसल तो वही काटेगा। सत्ता भी उसी की प्रतीक्षा करेगी।

इस विधानसभा चुनाव में बसपा अध्यक्ष मायावती, उत्तर प्रदेश के वर्तमान मुख्यमंत्री और समाजवादी पार्टी (सपा) के राष्ट्रीय अध्यक्ष अखिलेश यादव, सपा के संरक्षक मुलायम सिंह यादव, कांग्रेस उपाध्यक्ष राहुल गांधी, भाजपा अध्यक्ष अमित शाह जैसे नेताओं की प्रतिष्ठा दांव पर है। इन सभी को वोटों की फसल काटने के लिए अपने कृत्य और सिद्धांतों को लेकर अग्निपरीक्षा के दौर से गुजरना होगा।

सर्वाधिक अग्निपरीक्षा प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की ही होगी। ऐसा इसलिए, क्योंकि वर्तमान समय में भाजपा का सारा दारोमदार उन्हीं पर है। उनके सामने इन पांच प्रदेशों में भाजपा का परचम लहराने की बहुत बड़ी जिम्मेदारी है। यदि वे उस में सफल होते हैं तभी वोटों की फसल काट पाना आसान होगा।

विदेशों में जमा कालाधन वापस लाने और आतंकवाद विरोधी नारे को लेकर केंद्र में पूर्ण बहुमत से पहुंची भाजपा ने बीते दिनों हरियाणा, महाराष्ट्र, झारखंड, बिहार, असम और केरल में संपन्न हुए विधानसभा चुनाव में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के नेतृत्व में जो प्रदर्शन किया, उसकी पुनरावृत्ति इस चुनाव में किसी चुनौती से कम नहीं है।

ऐसा इसलिए, क्योंकि विदेशों में जमा काला धन लाने के बजाए देश में छिपे कथित काला धन को बाहर करने के प्रयास में सरकार ने जिन्हें रुलाया है, क्या वे आसानी से उसके पाले में चले जाएंगे? ..और यह तो विधानसभा का चुनाव है। इसमें राष्ट्रीय और अंतर्राष्ट्रीय मुद्दे गौण हो जाते हैं। विकास और क्षेत्रीय मुद्दों के आधार पर इस चुनाव में जनता अपना प्रतिनिधि चुनती है।

दूसरी तरफ जिस कांग्रेस को कुछ दिनों पहले तक उप्र बेहाल नजर आ रहा था और उसके नेता सत्ताधारी दल को पानी पी पी कर गरिया रहे थे, आज वहीं दल प्यारा हो गया है और उसी की गोद में जा बैठे हैं। यही है सत्ता की चाह। वोटों की फसल काटने के लिए सियासत क्या-क्या नहीं करा लेती है।

उत्तर प्रदेश का सबसे बड़ा सियासी कुनबा भी इसका शिकार हुआ है। जहां परिवार की अंतरकलह महीनों तक मीडिया के लिए खुराक बनी रही। शायद इसीलिए मां-बेटी भी आमने सामने आई और अपना दल टूट गया। अब खुद को असली बताने की होड़ में लगी हुई है। रही बात बसपा की तो उसने भी वोटों की फसल काटने के प्रयास में कोई कसर नहीं छोड़ी है।

मुख्तार अंसारी की पार्टी कौमी एकता दल का बसपा में विलय भी इसी फसल की चाह में हुआ है। इसी चाह में दलबदल का खेल भी खूब खेला गया। लहलहाती फसल देकर उसे काटने की लालसा में तमाम ने अपना जमीर भी बेच डाला। भारतीय समाज पार्टी, पीस पार्टी, निषाद पार्टी, जैसे तमाम छोटे दल भी वोटों की फसल काटने के लिए बेचैन हैं वरन सिद्धांतों से समझौता कर बड़े दल से हाथ न मिलाते।

वास्तव में आज की सियासत की चाल के साथ उसका चरित्र भी बदल चुका है। जो दिखता है वह होता नहीं और जो होता है वह दिखता नहीं। 'कसमें, वादे, प्यार, वफा, यह सब बातें हैं, बातों का क्या' की तर्ज पर चल निकली सियासत आम नागरिकों का गला रेतने पर आमादा है। श्वेत लिबास में लिपटे लोगों के दिल अंदर से बहुत ही काले हैं।

ऐसे लोगों द्वारा ही राष्ट्रभक्ति की परिभाषा बदलने का प्रयास किया जा रहा है। जाति धर्म के नाम पर लोगों की भावनाओं से खेलना उनका शगल बन चुका है। ऐसे में बिना कुछ किए सब कुछ पाने की चाहत हर नेता में पनप चुकी है। वास्तव में सियासत समाज में फैली बुराइयों को दूर करने का बेहतरीन माध्यम है, जिसका कार्य बुराइयों से लड़ना और सुशासन स्थापित करना है।

इससे हटकर वर्तमान समय में पद और अर्थ पिपाशा ने इसकी परिभाषा ही बदल दी है, जो समाज और राष्ट्र के लिए घातक है। आज सियासत की सीढ़ी से राष्ट्रीयता के सूर्य को निगलने की कोशिश की जा रही है, जो किसी संक्रमण काल से कम नहीं है। (घनश्याम भारतीय)

(लेखक राजीव गांधी एक्सीलेंस अवार्ड प्राप्त पत्रकार हैं। ये लेखक के निजी विचार हैं)